सोमवार, 4 सितंबर 2017

आओ बुढ़ापा जिएं......




वृद्धावस्था अभिशाप नहीं.... यदि आर्थिक सक्षमता है तो मानसिक कमजोरी शोभा नहीं देती ..........सहानुभूति और दया का पात्र न बनकर, मनोबल रखते हुए आत्मविश्वास के साथ वृद्धावस्था को भी जिन्दादिली से जीने की कोशिश जो करते हैंं , वे वृृद्ध अनुकरणीय बन जाते है.....




जी लिया बचपन ,जी ली जवानी.....
      आओ बुढापा जिएं ।
यही तो समय है, स्वयं को निखारें.....
     जानेंं कि हम कौन हैं .......?

     तब नाम पहचान था.....
फिर हुआ काम पहचान अपनी
    आगे रिश्तों से जाने गये.....
 सांसारिकता में स्वयं खो गये ।
शरीर तो है साधन जीवन सफर का
      ये पहचान किरदार हैं.....
कहाँ से हैं आये ? कहाँँ हमको जाना.....?
      अपना सफर है जुदा......
यही तो समय है स्वयं को पहचाने
        जाने कि हम कौन हैं ........?

क्या याद बचपन को करना ,
 क्या फिर जवानी पे मरना ,
   यही मोह माया रहेगी.....
फिर - फिर ये काया मिलेगी ....
भवसागर की लहरों में आकर 
   क्या डूबना क्या उतरना......?
हाँ क्या डूबना...क्या उतरना....... 
जरा ध्यान प्रभु का करें हम,
तनिक ज्ञान खुद को भी दें अब.....
यही तो समय है , स्वयं को निखारें 
जाने कि हम कौन हैं.........?

अभिशाप क्यों हम समझें इसे ...
     निरानन्द तन ही तो है.......
आनन्द उत्साह मन में भरे तो,
    जवाँ आज भी मन ये है.......
 हाँ ! जवाँ आज भी मन तो है.......
अतीती स्मृतियों से निकलेंं अगर
     अपना भी नया आज है.....
जिन्दादिली से जिएं जो अगर
     बुढापा नया साज है.......
नयेपन को मन से स्वीकार कर लें,
     सीखे हुनर कुछ नये....
समय बीत जाये कब और कहाँ ?
      पता भी न हमको चले....
बचे गर समय तो अध्यात्म अपनायें.....
शायद कहीं कुछ हम जान पायें
सफर को अपना सुगम हम बनायें
यही तो समय है स्वयं को निखारें
        जाने कि हम कौन हैं ?.....

क्या रोना... क्या पछताना ?
क्या क्या किया क्यों गिनाना.......
    हम वृक्ष ऊँचे सबसे बड़े.......
छाँव की आस फिर क्यों लगाना
  सबको क्षमा, प्यार देंगे अगर,
    ऊपर से वह छाँव देगा.....
जीवन का अनुभव है साथ अपने
      क्या डरना कोई घाव देगा........?
मन को अब मजबूत अपना बनाएंं
      मूल्यांकन स्वयं का करें......।
अनुभव की सम्पदा हम बाँट जायेंं...
     अध्यात्म अपना इतना बढ़ायें......
मुक्ति / मौक्ष क्या है ! "ये हम जान पाये"
  यही तो समय है स्वयं को निखारें
         जानें कि हम कौन हैं.....?

कुछ ऐसा बुढ़ापा हम जीकर दिखायें
नहीं डर किसी को बुढ़ापे का आये....
बदलें सोच उनकी जो बोझ कहते,
पुनः नवयुवाओं से सम्मान पायेंं ।
प्राचीन हिन्दत्व लौटा के लायें......
यही तो समय है स्वयं को निखारें
     जानेंं कि हम कौन हैं.......?
                                              चित्र: गूगल से साभार...

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