आओ बच्चों ! अबकी बारी होली अलग मनाते हैं

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  आओ बच्चों ! अबकी बारी  होली अलग मनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । ऊँच नीच का भेद भुला हम टोली संग उन्हें भी लें मित्र बनाकर उनसे खेलें रंग गुलाल उन्हें भी दें  छुप-छुप कातर झाँक रहे जो साथ उन्हें भी मिलाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पिचकारी की बौछारों संग सब ओर उमंगें छायी हैं खुशियों के रंगों से रंगी यें प्रेम तरंगे भायी हैं। ढ़ोल मंजीरे की तानों संग  सबको साथ नचाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । आज रंगों में रंगकर बच्चों हो जायें सब एक समान भेदभाव को सहज मिटाता रंगो का यह मंगलगान मन की कड़वाहट को भूलें मिलकर खुशी मनाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । गुझिया मठरी चिप्स पकौड़े पीयें साथ मे ठंडाई होली पर्व सिखाता हमको सदा जीतती अच्छाई राग-द्वेष, मद-मत्सर छोड़े नेकी अब अपनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पढ़िए  एक और रचना इसी ब्लॉग पर ●  बच्चों के मन से

आओ बुढ़ापा जिएं ..



couple couple on a walk

वृद्धावस्था अभिशाप नहीं । यदि आर्थिक सक्षमता है तो मानसिक कमजोर नहीं बनना । सहानुभूति और दया का पात्र न बनकर, मनोबल रखते हुए आत्मविश्वास के साथ वृद्धावस्था को भी जिन्दादिली से जीने की कोशिश जो करते हैंं , वे वृृद्ध अनुकरणीय बन जाते है ।
मानसिक दुर्बलता से निकलने के लिए यदि कुछ ऐसा सोचें तो -



जी लिया बचपन , जी ली जवानी
      आओ बुढापा जिएं ।
यही तो समय है, स्वयं को निखारेंं
     जानेंं कि हम कौन हैं ?

    कभी नाम पहचान था
फिर हुआ काम पहचान अपनी
  आगे रिश्तों से जाने गये
 सांसारिकता में हम खो गये ।
ये तन तो है साधन जीवन सफर का
    ये पहचान किरदार है
इन्हीं में उलझकर क्या जीवन बिताना
जरा अब तो जाने ,कहाँँ हमको जाना ?
यही तो समय है स्वयं को पहचाने
        जाने कि हम कौन हैं ?

क्या याद बचपन को करना 
 क्या फिर जवानी पे मरना 
   यदि ये मोह माया रहेगी
तो फिर - फिर ये काया मिलेगी 
भवसागर की लहरों में आकर 
   क्या डूबना क्या उतरना  ?
जरा ध्यान प्रभु का करें हम,
आत्मज्ञान खुद को तो दें हम
यही तो समय है , स्वयं को निखारें 
जाने कि हम कौन हैं  ?

अभिशाप क्यों हम समझें इसे
     निरानन्द बस तन ही है
आनन्द उत्साह मन में भरें तो,
    जवाँ आज भी मन ये है।
अतीती स्मृतियों से बाहर निकलके
नयेपन को मन से स्वीकार कर के
  वक्त के संग बदलते चलें
सुगम से सफर की हो कामनाएं
यही तो समय है स्वयं को निखारें
        जाने कि हम कौन हैं ?

क्या रोना अब क्या पछताना ?
क्या क्या किया क्यों गिनाना
  हम वृक्ष ऊँचे सबसे बड़े
छाँव की आस फिर क्यों लगाना
  सबको क्षमा, प्यार देंगे अगर,
  ऊपर से वह छाँव देगा !
जीवन का अनुभव है साथ अपने
 क्या डरना कोई घाव देगा ?
मूल्यांकन स्वयं का करें वक्त रहते
    मुक्ति / मौक्ष को जान पायें
यही तो समय है स्वयं को निखारें
    जानें कि हम कौन हैंं  ?

कुछ ऐसा बुढ़ापा हम जीकर दिखायें
नहीं डर किसी को बुढ़ापे का आये ,
बदलें सोच उनकी जो बोझ कहते,
पुनः नवयुवाओं से सम्मान पायेंं ।
प्राचीन हिन्दत्व लौटा के लाये ।
यही तो समय है स्वयं को निखारें
     जानेंं कि हम कौन है ?
                     
                    चित्र: गूगल से साभार...

टिप्पणियाँ

  1. हार्दिक आभार एवं धन्यवाद यशोदा जी मेरी रचना को पाँच लिंको के आनंद जैसे प्रतिष्ठित मंच पर स्थान देने हेतु।

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!सुधा जी ,क्या बात है!ऐसा बुढापा जिएँ कि नहीं डर किसी को बुढापे का हो ....बहुत खूब ..👌👌

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुभा जी तहेदिल से धन्यवाद आपका रचना पसन्द कर उत्साहवर्धन हेतु।

      हटाएं
  3. वाह! आदरणीय सुधा दीदी जीवन को फिर पँख लगाए .
    बेहतरीन 👌

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद अनीता जी उत्साहवर्धन हेतु।

      हटाएं
  4. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (5-4-22) को "शुक्रिया प्रभु का....."(चर्चा अंक 4391) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी मेरी पुरानी रचना साझा करने हेतु ।

      हटाएं
  5. जीवन के संध्या काल को भार नहीं भोर बनकर अपनाने का सुंदर मंत्र देती रचना।
    बहुत प्यारी कविता।

    जवाब देंहटाएं
  6. अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ. कुसुम जी !

    जवाब देंहटाएं
  7. क्या रोना अब क्या पछताना ?
    क्या क्या किया क्यों गिनाना
    हम वृक्ष ऊँचे सबसे बड़े
    छाँव की आस फिर क्यों लगाना
    सबको क्षमा, प्यार देंगे अगर,
    ऊपर से वह छाँव देगा !
    जीवन का अनुभव है साथ अपने
    क्या डरना कोई घाव देगा ?
    मूल्यांकन स्वयं का करें वक्त रहते
    मुक्ति / मौक्ष को जान पायें
    यही तो समय है स्वयं को निखारें
    जानें कि हम कौन हैंं ?////
    बहुत ख़ूब प्रिय सुधा जी 👌👌👌अत्यंत मधुर और सरस अनुभूतियों को शब्द देती रचना के लिए निश्ब्द हूँ!!
    बुढापा असश्क्त ना हो तो उसके जैसा आनन्द संभवतः कहीं नही।ये मुक्ति का द्वार है जहाँ कोई भी इन्सान कुल मिलाकर हरेक वर्जना से मुक्त हो स्वतंत्र जी सकता है। जीवन के इस सांध्यकाल से डरने वाले यदि इसकी तैयारी समय पूर्व करें तो इसका भरपूर आनंद उठाया जा सकता है।बहुत प्रेरक पोस्ट जिसमें निहित भाव शायद मेरे भी है पर इन्हें लिख पाने में सक्षम नहीं मैं।सस्नेह बधाई आपको।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मेरे विचारों का समर्थन कर सराहनीय प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करने हेतु दिल से धन्यवाद जवं आभार रेणच जी ।

      हटाएं

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