बुधवार, 2 अगस्त 2017

*कुदरत की मार*



देखो ! अब का मनभावन सावन,
 कैसे  अस्त-व्यस्त  है जीवन !
कहीं पड़ रही उमस भरी गर्मी, 
कहींं मौसम की ज्यादा ही नर्मी.....

कहीं भरा है पानी - पानी,
कहीं बाढ़ देख हुई हैरानी !
कहीं घर में भर आया पानी ,
घर छोड़ी फिर मुनिया रानी.......

भीगी सारी किताबें उसकी,
भीग  गया  जब  बस्ता...
कैम्पस में दिन काट रहे,
खाने को मिले न खस्ता....

घर पर बछिया छोटी सी
बाँधी थी वह  खूँटी  से...
वहीं बंधी गौरा(गाय) प्यारी....
दूध निकाले थी महतारी

कैसी होगी बछिया बेचारी,
क्या सोची होगी गौरा प्यारी....?
छोड़ा उनको खुद आ भागे !!
उन सबका वहाँ कौन है आगे...?

सूखी थी जब नदी गर्मी में
तब कचड़ा फैंके थे नदी में....?
रास्ता जब नदी का रोका......
पानी ने घर आकर टोका !

मौसम को बुरा कहते अब सब,
सावन को "निरा" कहते हैंं सब ।
मत भूलो अपनी ही करनी है ,
फिर ये सब खुद ही तो भरनी है......

राजस्थान हुआ बाढ़ से बेहाल,
गुजरात  का भी है  बुरा हाल....
पहाड़ों पर हो रहा भूस्खलन.....
कहीं बादल फटने का है चलन ।

"विज्ञान" खड़ा मुँह ताक रहा !
"प्रगति" भी सिर धुनकर रोती है !
कुदरत "विध्वंस" पर आयी है
"बोलो अब करोगे क्या ???
ललकार के हमसे कहती है......

देख ली पर्यावरण की विनाश-लीला !!
सम्भल सकें तो सम्भलना है.......
अब "पर्यावरण - सुरक्षा"  का...
हर मानव को व्रत करना है ......
                                                 चित्र गूगल से साभार.....
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