मंगलवार, 4 जुलाई 2017

"मन और लेखनी"




लिखने का मन है,......
लिखती नहीं लेखनी,
लिखना मन चाहता,
कोई जीवनी कहानी ।
शब्द आते नहीं, मन
बोझिल है दुःखी लेखनी ।
लिखने का मन है.......
लिखती नहीं लेखनी ।
मन मझधार में है .......
लेखनी पार जाना चाहती,
मन में अपार गम हैं....
लेखनी सब भुलाना चाहती ।
सारे दुखों  को भूल.......
अन्त सुखी बनाना चाहती,
मन मझधार में है.....
लेखनी पार जाना चाहती ।
चन्द लेख बन्द रह गये,
यूँ  ही  किताबों  में........
जैसे कुछ राज छुपे हों ,
जीवन की यादों में......
वक्त बेवक्त उफनती ,
लहरेंं "मन-सागर" में........
देखो ! कब तक सम्भलती
हैं, ये यादें जीवन में.........?
लेखनी समझे उलझन,
सम्भल के लिख भी पाये......
वो लेख ही क्या लिखना.....
जो "सुलझी-सीख" न दे पाये.......

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