मन और लेखनी : मन की उथल-पुथल पर हिंदी कविता
परिचय
मन में भाव और विचार उमड़ते रहें, लेकिन जब वे शब्दों का रूप नहीं ले पाते, तब मन और लेखनी के बीच एक अनकही कशमकश जन्म लेती है। कभी लिखने की तीव्र इच्छा होती है, पर शब्द साथ नहीं देते। मन की इसी उथल-पुथल और अभिव्यक्ति के संघर्ष को स्वर देती है प्रस्तुत कविता ‘मन और लेखनी’।
लिखने का मन है,
लिखती नहीं लेखनी,
लिखना मन चाहता,
कोई जीवनी, कहानी।
शब्द आते नहीं, मन
बोझिल है, दुःखी लेखनी।
लिखने का मन है,
लिखती नहीं लेखनी।
मन मझधार में है,
लेखनी पार जाना चाहती,
मन में अपार ग़म हैं,
लेखनी सब भुलाना चाहती।
सारे दुखों को भूल,
अंत सुखी बनाना चाहती,
मन मझधार में है,
लेखनी पार जाना चाहती।
चंद लेख बंद रह गए,
यूँ ही किताबों में,
जैसे कुछ राज़ छिपे हों,
जीवन की यादों में।
वक्त-बेवक्त उफनतीं
लहरें मन-सागर में,
देखूँ, कब तक सँभलती हैं
ये यादें जीवन में।
आतुर है मन लिखने को,
सुख-दुख के अफ़साने,
निकृष्टता को छोड़ लेखनी
चल पड़ी सीख सिखाने
कड़वे अनुभव भी ढलकर,
जब सीख बन जाते हैं,
पीड़ा के स्वर भी तब
आशा के गीत सुनाते हैं।
निष्कर्ष
मन और लेखनी का संबंध केवल विचारों को शब्दों में ढालने तक सीमित नहीं है। जब मन भावों से भरा हो और लेखनी उन्हें अभिव्यक्त न कर पाए, तब यह दूरी स्वयं एक अनुभूति बन जाती है। ‘मन और लेखनी’ इसी अंतर्द्वंद्व को सरल और संवेदनशील ढंग से सामने रखती है।
✨धन्यवाद🙏
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आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 14 दिसम्बर 2022 को साझा की गयी है...
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द परआप भी आइएगा....धन्यवाद!
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आ.यशोदा जी !
जवाब देंहटाएंशब्द आते नहीं, मन
जवाब देंहटाएंबोझिल है दुःखी लेखनी ।
लिखने का मन है,
लिखती नहीं लेखनी ।
मन मझधार में है ,
लेखनी पार जाना चाहती,
इन दिनों मेरी लेखनी की भी यही दशा है।
कभी कभी शब्द को से जाते हैं, बहुत ही सुन्दर सृजन सुधा जी 🙏