मंगलवार, 12 सितंबर 2017

जाने कब खत्म होगा ,ये इंतज़ार......




 ये अमावस की अंधेरी रात
तिस पर अनवरत बरसती
           ये मुई बरसात...
और टपक रही मेरी झोपड़ी
          की घास-फूस......
भीगती सिकुड़ती मिट्टी की दीवारें 
जाने कब खत्म होगा  ये इन्तजार ?
            कब होगी सुबह.....?
   और मिट जायेगा ये घना अंधकार !
थम ही जायेगी किसी पल फिर यह बरसात
            तब चमकेंगी किरणें.......
    रवि की खिलखिलाती गुनगुनी सी ।
सूख भी जायेंगी धीरे-धीरे ये भीगी दीवारें
             गुनगुनायेंगी गीत.....
आशाओं के,मिट्टी की सौंधी खुशबू के साथ ।
   झूम उठेगी इसकी घास - फूस की छत
           बहेगी जब मधुर बयार.......
 फिर भूल कर सारे गम करेंंगे यूँ पूनम का इंतज़ार !
      जब रात्रि में भी चाँद की चाँदनी में
            साफ नजर आयेगी......
  मेरी झोपड़ी,  अपने अस्तित्व के साथ ........

          
                                         चित्र - "साभार गूगल से"

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