मंगलवार, 27 जून 2017

लौट आये फिर कहीं प्यार...




सांझ होने को है......
रात आगे खडी,
बस भी करो अब शिकवे,
बात बाकी पडी........
सुनो तो जरा मन की.,
वह भी उदास है ।
ऐसा भी क्या है तड़पना
अपना जब पास है ।
ना कर सको प्रेम तो,
चाहे झगड़ फिर लो.......
नफरत की दीवार लाँघो,
चाहे उलझ फिर लो......
शायद सुलझ  भी जाएंं
खामोशियों के ये तार......
लौट आयेंं बचपन की यादें,
लौट आये फिर कहीं प्यार....?

खाई भी गहरी सी है,
तुम पाट डालो उसे.......
सांझ ढलने से पहले,
बाग बना लो उसे.........
नन्हींं नयी पौध से फिर,
महक जायेगा घर-बार .........
लौट आयें बचपन की यादें....
लौट आये फिर कहीं प्यार....?

अहम को बढाते रहोगे
स्वयं को भुलाते रहोगे....
वक्त हाथों से फिसले तभी,
कर न पाओगे तुम कुछ भी सार....
सांझ ढलते समझ आये भी,
बस सिर्फ पछताते रहोगे......
लौट आओ जमीं ताकती है,
वक्त कम है,राह झांकती है.....
रात तम में गिरोगे कहाँ तुम,
राह धुंधली हुई जा रही है......
दूरियां ज्यों बढाते रहोगे,
गिरकर उतने ही टुकड़े सहोगे....
टुकड़े- टुकड़े में ही जो सही ,
आने की तो डगर है यहीं ......
यही है इस जीवन का सार...
तुम भी समझो जमीं का ये प्यार......
लौट आओ वहींं से जहाँँ हो,
बन भी जाये पुनः परिवार......
लौट आयेंं बचपन की यादें,
लौट आये फिर कहीं प्यार......?
                                               चित्र साभार गूगल से......

                         



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