सोमवार, 8 मई 2017

आस हैं और भी.....राह हैं और भी....


जब कभी अकेली सी लगी जिन्दगी,
 तन्हाई भी आकर जब सताने लगी 
 आस-पास चहुँ ओर नजरें जो गयी,
 एक नयी सोच मन मेरे आने लगी......
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
 भावना गीत बन गुनगनाने लगी ..........


 मंजिल दूर थी रात छायी घनी,
चाँद-तारों से उम्मीद करने लगी
बादलों ने भी तब ही ठिठोली की
चाँद-तारे छुपे आँख-मिचौली की
घुप्प अंधेरे में डर जब सताने लगा
राह सूझी नहीं मन घबराने लगा
टिमटिमाते हुए जुगनू ने कहा .......
आस बाकी अभी टूट जाओ नहीं
मुस्कुरा दो ! जरा रूठ जाओ नहीं
है बची रौशनी होसला तुम रखो !
दिख रही राह मंजिल तक तुम चलो !
आस हैंं और भी राह हैं औऱ भी,
एक नयी सोच तब मन में आने लगी......
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी..........


करवटें जब बदलने लगी जिन्दगी
धोखे और नफरत से हुए रूबरू
फिर डरे देख जीवन का ये पहलू
विश्वास भी डगमगाने लगा
शब्द जो कहे अर्थ उल्टे हुये
हर कोशिश नाकामी दिखाने लगी
खामोशी इस कदर फिर से छाने लगी
रुक गये हम जहाँ थे वहीं हारकर
तब जीने की चाहत भी जाने लगी
एक हवा प्रेम की सरसराते हुए........
बिखरी जुल्फों को यूँ सहलाने लगी
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
भावना गीत बन गुनगनाने लगी.........


है राहें औऱ भी नजरे तो उठा !
उम्मीदें बढा फिर चलें तो जरा !
वजह मुस्कुराने की हैं और भी,
जो नहीं उस पर रोना तो छोड़े जरा...
यही सीख जब  अपनाने लगी
एक नयी सोच तब मन में आने लगी
*देख ऐसी कला उस कलाकार की
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी.......





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