मैं जो गई बाहर
चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया । घर का आँगन, आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में, फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. बहुत कुछ बदल गया । हाँ ! नवीन स्फूर्ति आई । पर ये स्फूर्ति भी तो जैसे वसंत की असमय आँधी — जो पुष्पों को महकाती कम, और बिखेरती अधिक है। और स्थिरता - वह तो मानो शरद की निस्तब्ध चाँद...

जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (११ -०१ -२०२०) को "शब्द-सृजन"- ३ (चर्चा अंक - ३५७७) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
-अनीता सैनी
सहृदय धन्यवाद अनीता जी मेरी रचना साझा करने के लिए...
जवाब देंहटाएंसस्नेह आभार...।
है राहें औऱ भी नजरे तो उठा !
जवाब देंहटाएंउम्मीदें बढा फिर चलें तो जरा !
वजह मुस्कुराने की हैं और भी
बहुत खूब...., सादर नमन
सहृदय धन्यवाद, कामिनी जी !
हटाएंसस्नेह आभार।
एक हवा प्रेम की सरसराते हुए........
जवाब देंहटाएंबिखरी जुल्फों को यूँ सहलाने लगी
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
भावना गीत बन गुनगनाने लगी.........
बेहतरीन रचना सखी
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार सखी।
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना सोमवार 17 अक्टूबर 2022 को
जवाब देंहटाएंपांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
संगीता स्वरूप
है राहें औऱ भी नजरे तो उठा !
जवाब देंहटाएंउम्मीदें बढा फिर चलें तो जरा !
वजह मुस्कुराने की हैं और भी,
सकारात्मक भावों का संचार करती अत्यंत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।
जिंदगी कोई न कोई मार्ग चुन मुस्कराती रहे ।
जवाब देंहटाएंसकारात्मक भाव से सजी सुंदर रचना।
वजह मुस्कुराने की हैं और भी,
जवाब देंहटाएंजो नहीं उस पर रोना तो छोड़े जरा...
बहुत खूब…👌👌
देख ऐसी कला उस कलाकार की,
जवाब देंहटाएंभावना गीत बन गुनगनाने लगी ।
मन में आस और विश्वास भरती बेहद प्रेरक और सुंदर लेखन सुधा जी।
सस्नेह।
वजह मुस्कुराने की हैं और भी,
जवाब देंहटाएंजो नहीं उस पर रोना तो छोड़े जरा...
सकारात्मक सोच दर्शाती बहुत सुंदर रचना,सुधा दी।
बेहतरीन रचना ,पॉजिटिव सोच को बताती
जवाब देंहटाएंआशा का एक दीप जीवन को आलोकित कर देता है, बस वो दीप जलाए रखना ही जीवन का सुधा तत्व है।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सृजन सुधा जी।
सकारात्मक सोच का दर्पण।
कविता के द्वितीय छन्द ने तो खूबसूरती की इन्तहा ही कर दी है। सच में बहुत सुन्दर लिख गई हैं आप! जुगनू के सन्दर्भ ने कविता की सुंदरता को पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया है। इस सुन्दर रचना के लिए बधाई सुधा जी!
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