सोमवार, 21 अगस्त 2017

" धरती माँ की चेतावनी "






     मानव तू संतान मेरी  
मेरी ममता का उपहास न कर ।
  सृष्टि - मोह वश मैंं चुप सहती,
अबला समझ अट्टहास न कर ।
 
    सृष्टि की श्रेष्ठ रचना तू !
  तुझ पर मैने नाज़ किया ।
   कल्पवृक्ष और कामधेनु से ,
अनमोल रत्नों का उपहार दिया ।

 क्षुधा मिटाने अन्न उपजाने,
   तूने वक्ष चीर डाला मेरा ।
 ममतामयी - माँ  बनकर  मैने,
    अन्न दे , साथ दिया तेरा ।
 
  तरक्की के नाम पर तूने ,
खण्ड -खण्ड किया मुझको ।
    नैसर्गिकी छीन ली मेरी ,
 फिर भी माफ किया तुझको ।

 पर्यावरण प्रदूषित करके तू ,
    ज्ञान बढाये जाता है ।
 अंतरिक्ष तक जाकर तू ,
     विज्ञान बढाये जाता है ।

वृक्षों को काटकर तू अपनी
   इमारत ऊँची करता है ।
प्राण वायु दूषित कर अब ,
खुद मास्क पहनकर चलता है ।

गौमाता को आहार बना तू,
  दानव जैसा बन बैठा ।
चल रहा विध्वंस की राह पर तू ,
  सर्वनाशी बनकर ऐंठा ।

दानव बनकर जब जब तूने ,
मानवता का धर्म भुलाया ।
आकर सृष्टि संरक्षण में मैंने,
फिर फिर तेरा दर्प मिटाया ।

अभी वक्त है संभल ले मानव !
खिलवाड़ न कर तू पर्यावरण से ।
संतुलन बना प्रकृति का आगे,
बाहर निकल दर्प के आवरण से ।

चेतावनी समझ मौसम को कुदरत की !
वरना तेरी प्रगति ही तुझ पर भारी होगी ।
    अब तुझ पर ही तेरे विनाश की ,
        हर इक जिम्मेदारी होगी........।


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