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जीवन, दर्शन और प्रकृति की सहज रागिनी — ‘माटी तेरा मोह न छूटा’

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                           पुस्तक: माटी तेरा मोह न छूटा कवयित्री: जिज्ञासा सिंह विधा: गीत-संग्रह भूमिका एवं आभार जब कोई प्रिय मित्र अपनी आत्मानुभूति को शब्दों में पिरोकर आपको भेंट करता है, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं होती, बल्कि उसके मन के अंतरंग कोनों की एक आत्मीय यात्रा होती है। मेरी स्नेही सखी जिज्ञासा सिंह ने अपना काव्य-संग्रह ‘माटी तेरा मोह न छूटा’ सप्रेम भेंट किया। इस आत्मीय उपहार के लिए मैं उनकी हृदय से आभारी हूँ। एक सखी के रूप में उनकी इस साहित्यिक उपलब्धि पर मुझे अपार हर्ष और गर्व है, वहीं एक पाठक और काव्य-अनुरागी के रूप में इस संग्रह ने मुझे भीतर तक स्पंदित किया। पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे मन में जो भाव और विचार उभरे, उन्हीं को इस समीक्षा के माध्यम से पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास है। सृजन-प्रक्रिया और भावात्मक पृष्ठभूमि संग्रह का आरंभ अपनी पूजनीय माँ को समर्पित ‘आत्मकथ्य’ से होता है, जिसके पश्चात ‘सरस्वती-वंदना’ के माध्यम से कवयित्री अपनी काव्य-यात्रा को वाणी और विद्या की अधिष्ठात्री देवी के चरणों...

सावन में भगवान शिव की महिमा पर रोला छंद

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 परिचय सावन आते ही मन भोलेनाथ की भक्ति में रम जाता है। चारों ओर बम-बम भोले की गूँज और शिव जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। इसी भक्ति-भाव से प्रेरित होकर मैंने भगवान शिव की महिमा का गुणगान करते हुए ये रोला छंद लिखे हैं। महादेव सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें।                    देवों के तुम देव,  सदाशिव औघड़दानी । तीन लोक में नाथ, नहीं है तुम सा दानी ।। जग हित कर विष पान, नीलकंठ कहलाए । त्रिपुरारी त्रिनेत्र, भाल में चंद्र सजाए ।। नीलकंठ  है नाम, आपका हे अविनाशी । हरते हर दुख दर्द,  उमापति तुम कैलाशी ।। आया सावन मास , भजन भोले  के गाते । काँवड लेकर साथ, भक्त जल गंग चढ़ाते ।। शिव ही आदि अनंत, जगत के तारण हारे । पूजन करते भक्त , गूँजते जय-जयकारे ।। करके जलाभिषेक, भक्तजन शीष नवाते । चहुँदिश बम-बम नाद, भक्त शिव महिमा गाते ।। शरणागत की लाज, रखें भोले भण्डारी । देवों के तुम देव,  प्रभो दाता त्रिपुरारी ।। पकड़ो अब तुम हाथ, हरो प्रभु अवगुण मेरे । कृपा करो हे नाथ, शरण मैं आई तेरे ।। निष्कर्ष भगवान शिव करुणा, त्याग और कल्...

शिव महिमा पर दोहे और दोहा-मुक्तक

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परिचय सावन मास में शिवभक्ति का विशेष महत्व माना जाता है। इसी भक्ति-भाव से प्रेरित होकर प्रस्तुत शिव महिमा पर दोहे और दोहा-मुक्तक  लिखे हैं। इन रचनाओं में भोलेनाथ के दिव्य स्वरूप, नीलकंठ रूप, भक्तवत्सलता और उनकी अपरंपार महिमा को शब्द देने का विनम्र प्रयास किया गया है।                           1.  महादेव शिव सत्य हैं, बाघम्बर बागीश ।     लिंगराज हरि हर स्वयं, उमानाथ जगदीश ।। 2. भाँग धतूरा बिल्वपत्र, अर्घ्य करें शिवभक्त ।     पूजन वंदन साधना, हो शिव में अनुरक्त ।। 3. देवों के भी देव शिव, करते बेड़ा पार ।     आशुतोष भगवान की, महिमा अपरंपार ।। 4 . मस्तक चंद्र विराजते, गल भुजंग की माल ।     कर त्रिशूल डमरू सजे, कटि बाघम्बर छाल ।। 5 .  भस्म विभूषित देह है, शिव सुंदर सोमेश ।      स्वयं हलाहल पान कर, हरते भव के क्लेश ।। दोहा मुक्तक - 1.  शिव शंकर भगवान को, पूजें सावन मास ।     शिवभक्तों के वास्ते, दिन सावन के खास ।।     बम-बम भोलेनाथ क...

मुहावरों पर आधारित दोहे

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परिचय जीवन में छोटी-छोटी बातें कब बड़ा रूप ले लेती हैं, पता ही नहीं चलता। कभी हम बीती बातों को कुरेदते हैं, कभी भाग्य को दोष देते हैं और कभी अपनों के विश्वासघात से आहत होते हैं। इन्हीं जीवन-अनुभवों और आसपास की परिस्थितियों को मैंने कुछ प्रचलित मुहावरों के सहारे दोहों में पिरोने का प्रयास किया है।                       आग बबूला हो रहे, छोटी-छोटी बात । तिल का ताड़ बना रहे , बिगड़ रहे हालात ।। मुर्दे गड़े उखाड़कर, कुछ ना आता हाथ ।  बीती ताहि बिसार दे, तभी बनेगी बात ।। सोते घोड़े बेचकर , किस्मत देते दोष ।  बैठे रोटी ना मिली, रहे भाग्य को कोस ।। अंधे की लाठी था जो, उसका ऐसा हाल । नौ दो ग्यारह हो गया, लेकर घर का माल ।। बाल न बाँका कर सके, मिलके शत्रु हजार ।  जिस पर कृपा ईश की, उसका  बेड़ा पार ।। निष्कर्ष मुहावरों में जीवन का गहरा अनुभव छिपा होता है। मैंने इन्हीं अनुभवों को दोहों में ढालकर अपनी बात कहने का प्रयास किया है। आशा है, ये दोहे आपको भी कुछ सोचने को विवश करेंगे और जीवन की छोटी-बड़ी सीख याद दिलाएँगे। ✨धन्यवाद🙏 यह भ...

माता-पिता और गुरु की महिमा | प्रेरणादायक हिंदी दोहा - मुक्तक

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परिचय भारतीय संस्कृति में माता-पिता प्रथम गुरु और सद्गुरु जीवन के सच्चे पथप्रदर्शक माने गए हैं। माता-पिता जहाँ संस्कारों की नींव रखते हैं, वहीं गुरु ज्ञान का प्रकाश फैलाकर जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। प्रस्तुत दोहा-मुक्तकों में गुरु, माता-पिता और सद्गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता तथा उनके अमूल्य योगदान का विनम्र भाव से वर्णन किया गया है।               माता-पिता और गुरु महिमा पर दोहा-मुक्तक  प्रथम गुरु माता-पिता, अपने पालन हार । जीवन की शिक्षा सहित, देते हैं संस्कार ।। चरणों में इनके सदा, नतमस्तक हो शीष, मातु-पिता की सीख बिन, जीवन हो दुस्वार ।। गुरु दिखलाते हैं दिशा, गुरु ही देते ज्ञान । गुरुवर के आशीष से, मिलता जग में मान।। जगती अंतःचेतना, मिटे सभी भ्रमजाल, पग रज मस्तक पे लगा, गुरु का कर सम्मान ।। ध्यान लगा कर सीख लें, गुरु से सम्यक ज्ञान । उनके ही आशीष से, मिलता है सम्मान । ज्योति जगाते चित्त में, करें तिमिर का नाश, चरण कमल वंदन करें, गुरु हैं ईश समान ।। सद्रुरु के आशीष से, मिलती सम्यक दृष्टि । खुलते चक्षु विवेक के,  प्रभुमय लगती ...

मोबाइल फोन: सुविधा या लत? | मोबाइल के फायदे और नुकसान | हिंदी लेख

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 परिचय आधुनिक युग में विज्ञान का एक अद्भुत और महत्त्वपूर्ण उपहार मोबाइल फोन है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को विश्राम करने तक यह हमारे जीवन का लगभग अभिन्न साथी बन चुका है। जहाँ एक ओर इसने हमारे अनेक कार्यों को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसका अत्यधिक उपयोग कई नई समस्याओं का कारण भी बन रहा है। प्रस्तुत लेख में मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसकी लत से होने वाले दुष्प्रभावों पर चर्चा की गई है।                                आज मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया को मानो हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। कुछ दशक पहले जिन कार्यों के लिए घंटों या कई दिनों का समय लगता था, वे आज कुछ ही क्षणों में पूरे हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीकी सुविधा है जिसने मनुष्य के जीवन को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किसी से तुरंत संपर्क करना हो, पढ़ाई करनी हो, बैंकिंग का कार्य हो या मनोरंजन—अनेक कार्य अब एक ही मोबाइल फोन से सहजता से पूरे हो जाते हैं। यही कारण है कि आज यह बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर...

जल संरक्षण पर कविता | पानी का करो संचय | मनहरण घनाक्षरी

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परिचय जल ही जीवन का आधार है, फिर भी बढ़ती जनसंख्या, जल का अपव्यय, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे समय में जल संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हम सभी की जिम्मेदारी है। प्रस्तुत मनहरण घनाक्षरी "पानी का करो संचय" जल बचाने, वर्षा जल संचयन, नदियों की स्वच्छता, वृक्षारोपण और प्रकृति के संतुलन का प्रेरक संदेश देती है। आइए, इस कविता के माध्यम से जल की प्रत्येक बूंद का महत्व समझें और उसे सहेजने का संकल्प लें ।        पानी बचाने का संदेश देती कविता |मनहरण घनाक्षरी पानी का करो संचय मत करो अपव्यय जल से ही जीवन है जल को बचाइये । खेती - बाड़ी घर बार जल ही जीवन सार प्रभु का है वरदान सबको बताइये। बहता है अविरल नदियों में कल-कल नदियों को स्वच्छ कर मधुता बढ़ाइये जल है सभी की जान प्रकृति हितैषी मान  बूँद बूँद संचय की मुहिम चलाइये जल तो है अनमोल नल नहीं व्यर्थ खोल इसका महत्व जान व्यर्थ ना बहाइये सुनो जल की जुबानी  चुक रहा सब पानी कर लो जतन शीघ्र समय ना गंवाइये अतिवृष्टि अनावृष्टि बिगड़ी समस्त सृष्टि वन से है संतुलन वृक्ष भी लगाइये ग्रीष्...

तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

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अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित  तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है।  भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।  है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित विचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

परित्यक्ता नहीं..परित्यक्त | पति की बेवफाई और सास ससुर का साथ - पारिवारिक कहानी

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📖 कहानी का परिचय (Introduction) रिश्तों का विश्वासघात और स्वाभिमान की एक अनोखी दास्तान क्या एक पत्नी को सिर्फ इसलिए पति के अत्याचार और बेवफाई सहते रहना चाहिए क्योंकि मायके से विदा होने के बाद उसका कोई और ठिकाना नहीं होता? यह दिल को छू लेने वाली भावुक हिंदी कहानी (Emotional Hindi Story) है दिल्ली में रहने वाली 'सना' की। सना ने प्रतीक से प्रेम विवाह किया था, लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद प्रतीक के व्यवहार में बेवफाई और अजनबीपन झलकने लगता है।लेकिन यह कहानी सिर्फ एक लाचार पत्नी के रोने की नहीं है, बल्कि समाज के सामने एक नई मिसाल पेश करने की है। जब प्रतीक अपनी पत्नी को धोखा देता है, तब समाज के नियमों के विपरीत जाकर सना के सास-ससुर अपनी बहू का साथ देते हैं। वे उसे 'परित्यक्ता' नहीं बनने देते, बल्कि अपनी बेटी बनाकर एक नया जीवन और स्वाभिमान देते हैं। यह पारिवारिक कहानी समाज को रिश्तों के बदलते स्वरूप का एक बहुत बड़ा संदेश देती है। दिल्ली की हल्की ठंडी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्रॉइंग रूम के फर्श पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, लेकिन सना के मन में जैसे धूप का एक कतरा भी नहीं ...

मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

खामोशी जो सब कह गई | अनकही भावनाओं की भावुक हिंदी कहानी

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​प्रस्तावना (Introduction) ​ "शब्दों की एक सीमा होती है, पर संवेदनाएँ असीम हैं।" ​ अक्सर हमें लगता है कि मन की उलझनों को शब्दों के धागे में पिरोकर बाहर निकाल देने से हृदय का बोझ कम हो जाएगा। हम सोचते हैं कि कह देने से मन खाली हो जाएगा। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होता है ?  कभी-कभी शब्द उस गुबार को केवल हवा देते हैं, और पीछे छूट जाती है एक भारी खामोशी । ​यह कहानी है एक ऐसी ही संध्या की, जहाँ डूबते सूरज की लाली और बादलों की विरल परतों के बीच एक स्त्री अपने अंतर्मन की गठरी खोलती है। वह बोलती तो है, पर पाती है कि आँसू फिर भी थम नहीं रहे। यह रचना 'कह देने' और 'महसूस करने' के बीच के उस सूक्ष्म अंतर को उकेरती है, जहाँ अंततः उसे समझ आता है कि पूर्णता शब्दों में नहीं, बल्कि स्वयं की खामोशी और वर्तमान स्थिति को स्वीकार करने में है । संध्या की धुंधलाती बेला वह छत के कोने में खामोश खड़ी थी। उसकी निगाहें दूर क्षितिज में कहीं खोई हुई थीं, मानो अपनी उमड़ती भावनाओं का कोई सिरा खोज रही हो। आकाश पर बादलों की विरल परतें, दिनभर के अनकहे भावों को समेटे धीरे-धीरे तैर रही थीं। डूबते सूरज...

बच्चों को समझाने का सही तरीका – सासू माँ की सीख देने वाली कहानी

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क्या आपका बच्चा भी जिद करता है? जानिए एक छोटी सी कहानी से बड़ा parenting मंत्र…   बच्चों को डांटने के बजाय प्यार और धैर्य से समझाना क्यों जरूरी है? पढ़िए सासू माँ की सीख देती यह प्रेरणादायक हिंदी कहानी। आरव की जिद और निधि की परेशानी माँजी, आरव बहुत जिद्दी है...।  मैंने उसे कितना समझाया, पर वो माना ही नहीं… और आपने तो पल भर में मना लिया। कैसे माँजी? आप कैसे मना लेती हैं उसे? उसे क्या, आप तो सभी बच्चों को मना लेती हैं… आश्चर्य भरी मुस्कान के साथ निधि अपनी सासू माँ से पूछ ही रही थी कि तभी प्रीति (देवरानी) ने किचन से आवाज लगाई— किचन में छोटी सी सीख “दीदी, ज़रा ये दूध पतीली में डाल दीजिए न…  मुझसे गिर जाता है। पैकेट से डालते वक्त दूध उछल कर बाहर गिर जाता है।” सिखाने का तरीका निधि किचन में गई और दूध पतीली में डालते हुए बोली— “अरे ! ऐसे कैसे गिर जाता है तुमसे दूध? देखो, धीरे-धीरे डालो… पतली धार में। अगर एकदम से ज्यादा दूध डालोगी, वो भी खाली पतीले में, तो उछलेगा ही न।” सासू माँ दूर से सब सुनकर मुस्कुरा रही थीं। थोड़ी देर बाद निधि चाय लेकर आई और सासू माँ को देते हुए फिर बोली— “अब ...

मैं जो गई बाहर ( हिंदी कविता)

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मैं जो गई बाहर, स्त्री मन की अनुभूति  "यह एक भावनात्मक हिंदी कविता है जिसमें स्त्री के मन, घर से दूर जाने और जीवन में आए सूक्ष्म बदलावों को सुंदर रूप से व्यक्त किया गया है।" चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया  मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी  । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया  । घर का आँगन,  आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में,  फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया  मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब  वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. ...

छटाँक भर का | भावनात्मक हिंदी कहानी

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  यह एक भावनात्मक हिंदी कहानी है जो माता-पिता और बच्चे के रिश्ते की गहराई को दर्शाती है। "छटाँक भर का" कहानी माता-पिता की वृद्धावस्था को देखकर बेटे के मन की चिंता, भय और उनके प्रति असीम प्रेम को दर्शाती है । छटाँक भर का – एक भावनात्मक हिंदी कहानी "ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है " ! एयरपोर्ट से बाहर निकलते बेटे के मुँह से ऐसे शब्द सुनते ही शर्मा जी और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । बेटे से मिलने का उत्साह जैसे कुछ ठंडा सा पड़ गया ।   सोचने लगे कहाँ तो हमें लगा कि इतने समय बाद हमें देखकर बेटा खुश होगा पर ये तो भगवान को ही कोसने लगा है" । तभी बेटा आकर दोनों के पैर छूकर गले मिला और फटाफट सामान को गाड़ी में रखवा कर तीनों जब बैठ गए तब पापा ने चुटकी लेते हुए कहा , " क्यों रे ! किसका इंतजार था तुझे ? कौन आयेगा तुझे लेने यहाँ..?.. हैं ?... अच्छा आज तो वेलेंटाइन डे हुआ न तुम लोगों का ! कहीं कोई दोस्त तो नहीं आयी है लेने ! हैं ?..  बता दे "? बेटा चिढ़ते हुए - "मम्मी ! देख लो पापा को ! कुछ भी बोल देते हैं" । "सही तो कह रहे तेरे पापा" -...

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज | बसंत कविता

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यह कविता वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के प्रेममय रूप को दर्शाती है, जहाँ ऋतुराज अपने साथ सुगंध, संगीत और नवजीवन लेकर आते हैं।" प्रीत की बरखा लिए लो आ गए ऋतुराज प्रीत की मधुर अनुभूति बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गई, श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गई । भ्रमर - दल देखो हुए हैं, प्रेम के मोहताज, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिल-डुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है, अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है ।  टिप-टिप मधुर संगीत सी, भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़, प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । ✨धन्यवाद🙏 ऐसे ही एक और रचना निम्न लिंक पर ●  बसंत की पदचाप #वसंत_ऋतु #हिंदी_कविता #प्रेम_कविता #NaturePoetry #SpringSeason #HindiPoetry

मंगलमय नववर्ष हो

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  नववर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं बीत गया पच्चीस अब, बिसरें बीती बात । मंगलमय नववर्ष हो, सुखमय हो दिन रात। शुभता का संदेश ले,  आएगा  छब्बीस । दुर्दिन होंगे दूर अब , सुख की हो बरसात ।। स्वागत आगत का करें , अभिनंदन कर जोर । सबको दे शुभकामना , आये स्वर्णिम भोर । घर आँगन खुशियाँ भरे, विपदा भागे दूर, सुख समृद्धि घर में बसे, खुशहाली चहुँओर ।। हार्दिक शुभकामनाओं के साथ एक और रचना निम्न लिंक पर ●  और एक साल बीत गया

करते रहो प्रयास | प्रेरणादायक दोहे और सकारात्मक सोच

परिचय जीवन में सफलता का रास्ता हमेशा सरल नहीं होता। कई बार असफलता, ठोकर और बाधाएँ मन को निराश कर देती हैं, लेकिन निरंतर प्रयास और धैर्य ही आगे बढ़ने की राह बनाए रखते हैं। इन्हीं भावों को सरल शब्दों में व्यक्त करते हुए मैंने ये प्रेरणादायक दोहे लिखे हैं। 1. करते करते ही सदा, होता है अभ्यास ।     नित नूतन संकल्प से, करते रहो प्रयास।। 2. मन से कभी न हारना, करते रहो प्रयास ।   सपने होंगे पूर्ण सब, रखना मन में आस ।। 3. ठोकर से डरना नहीं, गिरकर उठते वीर ।   करते रहो प्रयास नित, रखना मन मे धीर ।। 4. पथबाधा को देखकर, होना नहीं उदास ।    सच्ची निष्ठा से सदा, करते रहो प्रयास ।। 5. प्रभु सुमिरन करके सदा, करते रहो प्रयास ।    सच्चे मन कोशिश करो, मंजिल आती पास ।। निष्कर्ष इन दोहों के माध्यम से मन में यही कहने का प्रयास किया है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, प्रयास की डोर हाथ से नहीं छूटनी चाहिए। धैर्य और निरंतर कर्म के साथ आगे बढ़ते रहने में ही जीवन की राह को बेहतर बनाने की उम्मीद छिपी रहती है। हार्दिक अभिनंदन🙏 पढ़िए एक और रचना निम्न लिंक पर उत्तराखंड में मध...

धन्य-धन्य कोदंड (कुण्डलिया छंद)

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💐 विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं💐 पुरुषोत्तम श्रीराम का, धनुष हुआ कोदंड । शर निकले जब चाप से, करते रोर प्रचंड ।। करते रोर प्रचंड, शत्रुदल थर थर काँपे। सुनकर के टंकार, विकल हो बल को भाँपे ।। कहे सुधा कर जोरि, कर्म निष्काम नरोत्तम । सर्वशक्तिमय राम,  मर्यादा पुरुषोत्तम ।। अति गर्वित कोदंड है,  सज काँधे श्रीराम । हुआ अलौकिक बाँस भी, करता शत्रु तमाम ।। करता शत्रु तमाम, साथ प्रभुजी का पाया । कर भीषण टंकार, सिंधु का दर्प घटाया ।। धन्य धन्य कोदंड, धारते जिसे अवधपति । धन्य दण्डकारण्य, सदा से हो गर्वित अति । सादर अभिनंदन 🙏🙏 पढ़िए प्रभु श्रीराम पर एक और रचना मनहरण घनाक्षरी छंद में ●  आज प्राण प्रतिष्ठा का दिन है

शारदीय नवरात्र का ,आया पावन पर्व (दोहे)

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  1. शारदीय नवरात्र का, आया पावन पर्व ।        नवदुर्गा नौरूप की, गाते महिमा सर्व ।। 2. नौ दिन के नवरात्र का , करते जो उपवास ।        नवदुर्गा माता सदा , पूरण करती आस ।। 3. जगराते में हैं सजे, माता के दरबार ।      गूँज रही दरबार में, माँ की जय जयकार ।। 4. माता के नवरूप का, पूजन करते लोग ।      सप्तसती के पाठ से, बनें सुखद संयोग ।। 5. संकटहरणी माँ सदा, करती संकट दूर ।      घर घर खुशहाली रहे, धन दौलत भरपूर ।। 6. शारदीय नवरात्र की, महिमा अपरम्पार ।    विधिवत पूजन कर सदा, मिलती खुशी अपार ।। हार्दिक अभिनंदन आपका🙏 पढ़िए एक और रचना कुण्डलिया छंद में ●  व्रती रह पूजन करते

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