मैं जो गई बाहर
चार दिन..
बस चार दिन,
मैं जो गई बाहर,
कितना कुछ बदल गया !
हाँ, बदल सा गया
मेरा घर !
घर की दीवारें ।
इन दीवारों में
पहले सी ऊष्मा तो ना रही
रही तो बस ये निस्तब्धता
अनचीन्ही सी ।
चार दिन..
बस चार दिन,
मैं जो गई बाहर,
कितना कुछ बदल गया ।
घर का आँगन,
आँगन मे रखे गमले,
गमलों में उगे पौधे -
रोज पानी मिलने पर भी
इनकी पत्तियों में, फूलों में
वो मुस्कान तो ना रही,
जो पहले रहती थी ।
चार दिन ..
बस चार दिन,
मैं जो गई बाहर,
जैसे सब कुछ बदल गया ।
हाँ, बदल सा गया
मेरा मन भी ।
मन के भाव,
भावों की ये नदी अब
वैसे शांत तो नहीं बह रही
जैसे पहले बहती थी ।
ये भावों की नदी जाने क्यों
जैसे बेचैन सी भाग रही है,
किसी अनजान से ,
सागर की ओर ।
और भावनाओं की सरगम भी -
वैसे तो ना रही,
जैसे पहले रहती थी ।
चार दिन ..
बस चार दिन,
मेरे दूर जाते ही..
समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया ।
सचमुच.. बहुत कुछ बदल गया ।
हाँ ! नवीन स्फूर्ति आई ।
पर ये स्फूर्ति भी तो
जैसे वसंत की असमय आँधी —
जो पुष्पों को महकाती कम,
और बिखेरती अधिक है।
और स्थिरता -
वह तो मानो
शरद की निस्तब्ध चाँदनी थी
जो इन चार दिनों की
बादलों भरी रातों में
कहीं विलीन सी हो गई ।
दुनिया की चकाचौंध से
चुंधियाई ये आँखें
बरबस बंद होकर प्रतीक्षा कर रही हैं
मन के लौट आने की
पहले की तरह स्वयं में सिमट
अंर्तमुखी हो जाने की ।
और मन ..
मन भी कहाँ रमा इन सब में..
वह भी सहमा सा बैठा है
जैसे घोंसले से दूर
भटका सा कोई पंछी,
जिसे आकाश की व्यापकता नहीं,
अपने तिनकों की सुरक्षा भाती है।
हाँ , मन लौटना चाहता है
अंतरतम की गहरी गली में..
जहाँ मिले उसे
अपना संतुलन,
अपनी गहराई,
अपना मौन और
असीम शांति के साथ वही स्थिरता
जिसमें बड़े सुकून से
धीरे-धीरे जन्म लेगी
फिर से...
उसकी अनुभूतियों की
वही कोमल धारा ।
उसकी अपनी कविता !
चार दिन..
बस चार दिन,
मैं जो गई बाहर,
कितना कुछ बदल गया !

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