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प्रभु फिर आइए | भक्तिभाव और विश्व शांति की प्रार्थना | मनहरण घनाक्षरी छंद

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परिचय कभी-कभी मन में उठते कुछ भाव शब्दों का रूप लेकर स्वयं ही रचना बन जाते हैं। ‘प्रभु फिर आइए’ भी ऐसे ही भावों से उपजी मेरी एक प्रार्थना है। संसार में बढ़ती अशांति और अधर्म को देखकर मन में यही इच्छा जागी कि प्रभु फिर आएँ और मानवता को सत्य, धर्म और प्रेम का मार्ग दिखाएँ। इन्हीं भावों को मैंने मनहरण घनाक्षरी छंद के माध्यम से शब्द देने का प्रयास किया है। जग के पालनहार, दीन करते गुहार, लेके अब अवतार, प्रभु फिर आइए । दैत्य वृत्ति बढ़ रही, कुत्सा सर चढ़ रही, प्रीत का मधुर राग, जग को सुनाइए । भ्रष्ट बुद्धि हुई क्रुद्ध, धरा झेल रही युद्ध, सृष्टि के उद्धार हेतु, चक्र तो उठाइए । कर्म की प्रधानता का, धर्म की महानता का, सत्य पुण्य नीति ज्ञान, सब को बताइये । दुष्ट का संहार कर, तेज का विस्तार कर, धुंध के विनाश हेतु, मार्ग तो सुझाइए । बने पुनः विश्व शान्ति, मिटे सभी मन भ्रांति, भक्त हो सुखी सदैव, कृपा बरसाइए । आओ न कृपानिधान, बाँसुरी की छेड़ तान, विधि के विधान अब, पुनः समझाइए  । धर्म की कराने जय, मेंटने संताप भय, दिव्य रुप धार कर, प्रभु फिर आइए । निष्कर्ष इस रचना को लि...

मैथड - जैसे को तैसा | एक सीख देती लघुकथा

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परिचय कई बार हम अपने व्यवहार में प्रेम और अपनापन रखते हुए भी यह समझ नहीं पाते कि सामने वाला हमारे साथ वैसा व्यवहार क्यों नहीं कर रहा। ऐसी ही एक उलझन माँ और बेटी के बीच हुए सहज संवाद का रूप लेती है। बेटी की मासूम-सी बात माँ को अपने ही व्यवहार पर सोचने के लिए मजबूर कर देती है।  " माँ ! क्या सोच रही हो" ? "कुछ नहीं बेटा ! बस यूँ ही"। "कैसे बस यूँ ही ? आपने ही तो कहा न माँ कि आप मेरी बैस्ट फ्रैंड हैं, और मैं अपनी हर बात आपसे शेयर करूँ" !  "हाँ कहा था,  तो" ?  "तो आप भी तो अपनी बातें मुझसे शेयर करो न ! मैं भी तो आपकी बैस्ट फ्रेंड हुई न !  हैं न माँ"!  "हाँ भई ! मेरी पक्की वाली सहेली है तू । बताऊँगी तुझे अपनी सारी बातें, पहले थोड़ा बड़ी तो हो जा" ! मुस्कुराते हुए माँ ने उसके गाल छुए। "मैं बड़ी हो गयी हूँ , माँ ! आप बोलो न अपनी बात मुझसे ! मुझे सब समझ आता है"। हाथों को आपस में बाँधकर बड़ी बड़ी आँखें झपकाते हुए वह माँ के ठीक सामने आकर बोली । "अच्छा ! इतनी जल्दी बड़ी हो गयी" ! (माँ ने हँसकर पुचकारते हुए कहा ) "हाँ म...

गणपति वंदना भगवान गणेश की भक्तिमय कविता

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 परिचय श्रीगणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले उनका स्मरण मन में श्रद्धा और विश्वास भर देता है। इसी भक्तिभाव से मैंने गणपति वंदना के रूप में अपने भाव शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है। जय जय जय गणराज गजानन गौरी सुत , शंकर नंदन । प्रथम पूज्य तुम मंगलकारी करते हम करबद्ध वंदन । मूस सवारी गजमुखधारी मस्तक सोहे रोली चंदन । भावसुमन अर्पित करते हम हर लो प्रभु जग के क्रंदन । सिद्धि विनायक हे गणनायक  विघ्नहरण मंगलकर्ता । एकदंत प्रभु दयावंत तुम करो दया संकटहर्ता । चौदह लोक त्रिभुवन के स्वामी रिद्धि सिद्धि दातार प्रभु  ! बुद्धि प्रदाता, देव एकाक्षर भरो बुद्धि भंडार प्रभु  ! शिव गिरिजा सुत लम्बोदर प्रभु कोटि-कोटि प्रणाम सदा । श्रीपति श्री अवनीश चतुर्भुज  विरजें मन के धाम सदा। निष्कर्ष विघ्नहर्ता गणपति से यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा सब पर बनी रहे और सभी के जीवन में सुख, शांति तथा सद्बुद्धि का प्रकाश बना रहे।

मिला कुण्डली ब्याहते ! विवाह और रिश्तों पर दोहे

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परिचय विवाह के बाद जब दो लोग एक-दूसरे के जीवन का हिस्सा बनते हैं, तो रिश्ते में प्रेम के साथ-साथ समझ और सामंजस्य की भी जरूरत होती है। इसी रिश्ते के अलग-अलग रंगों और मन के भावों को मैंने इन दोहों में शब्द देने का प्रयास किया है। मिला कुण्डली ब्याहते, ग्रह गुण मेल आधार । अजनबी दो एक बन, बसे नया घर - बार । निकले दिन हफ्ते गये,  गये मास फिर साल । कुछ के दिल मिल ही गये, कुछ का खस्ता हाल। दिल मिल महकी जिंदगी, घर आँगन गुलजार । जोड़ी जो बेमेल सी, जीवन उनका भार । कुछ इकतरफा प्रेम से, सींचे निज संसार । साथी से मिलता नहीं, इक कतरा भी प्यार । कुछ को बिछड़े प्रेम का, गहराया उन्माद । जीवन आगे बढ़ रहा, ठहरे यादों साथ। साथी में ढूँढ़े सदा, अपना वाला प्यार। गुण उसके दिखते नहीं, करते व्यर्थ प्रहार । अनदेखा कर आज को, बीती का कर ध्यान । सुख समृद्धि विहीन ये, जीवन नरक समान । निष्कर्ष रिश्तों में प्रेम और अपनापन बना रहे तो छोटी-छोटी बातें भी जीवन में मिठास घोल देती हैं। मेरी यही कामना है कि हर दांपत्य जीवन में आपसी समझ, विश्वास और प्रेम बना रहे। ✨धन्यवाद🙏 जीवन के विभिन्न अनुभवों और व्यवहार पर आधारित मेरे क...

जरा अलग सा अबकी मैंने राखी पर्व मनाया |रक्षाबंधन पर आत्मचिंतन की कविता

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परिचय रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का पावन पर्व है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती है और भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। लेकिन क्या अपनी रक्षा केवल बाहरी परिस्थितियों से ही करनी होती है? कभी-कभी मन के भीतर छिपे राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय, चिंता और नकारात्मक विचार भी हमारे लिए चुनौती बन जाते हैं। ‘जरा अलग-सा अबकी मैंने राखी पर्व मनाया’ एक अलग भावभूमि की कविता है, जिसमें स्वयं को रक्षा सूत्र बाँधने के माध्यम से अपने ही अंतर्मन को पहचानने और नकारात्मक भावों से अपनी रक्षा करने का संकल्प व्यक्त किया गया है।                    🌺   रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 🌺 जरा अलग सा अबकी मैने राखी पर्व मनाया । रोली अक्षत लेकर अपने माथे तिलक लगाया ।। एक हाथ से राखी लेकर दूजे पर जब बाँधी ! लगी पूछने खुद ही खुद से क्यों सीमाएं लाँघी ? भाई बहन का पर्व है राखी, क्यों अब इसे भुलाया ?  रक्षा सूत्र को ऐसे खुद से खुद को क्यों पहनाया ? दो मत दो रूपों में मैं थी अपने पर ही भारी ! मतभेदों की झड़ी लगी मुझ पे ही बारी-बारी। तिरछी...

मन में भरे उमंग, मनोहर पावन सावन - सावन पर कुण्डलिया छंद

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परिचय सावन का मौसम आते ही प्रकृति हरियाली, वर्षा और उमंग से भर उठती है। रिमझिम फुहारों और मनोहारी पवन के बीच मन भी आनंद से सराबोर हो जाता है। सावन की इसी सुंदर अनुभूति और शिवभक्ति को कुण्डलिया छंद के माध्यम से शब्द देने का एक छोटा-सा प्रयास है।   सावन बरसा जोर से, नाच उठा मनमोर । कागज की कश्ती बही , बाल मचाये शोर ।। बाल मचाये शोर, पींग झूले की भरते । रिमझिम बरसे मेघ, भीग अठखेली करते ।। कहे सुधा सुन मीत, कि पावस है मनभावन । मन में भरें उमंग, मनोहर पावन सावन ।। आया सावन मास अब, मन शिव में अनुरक्त । पूजन अर्चन जग करे, शिव शिव जपते भक्त ।। शिव शिव जपते भक्त, चल रहे काँवर टाँगे । करते शिव अभिषेक,  मन्नतें प्रभु से माँगे ।। चकित सुधा करजोरि, देखती शिव की माया । भक्ति भाव उल्लास ,  लिये अब सावन आया ।। निष्कर्ष सावन केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि प्रकृति और मन दोनों में उमंग जगाने वाला मौसम है। वर्षा की फुहारों और शिवभक्ति से जुड़ी यही सुंदर अनुभूति इस कुण्डलिया छंद में शब्दों के रूप में उतर आई है। ✨धन्यवाद🙏 सावन की इस मनोहारी अनुभूति के साथ शिवभक्ति का भाव भी मन को सहज ...

दुखती रगों को दबाते बहुत हैं — रिश्तों पर ग़ज़ल

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परिचय “रिश्तों में अपनापन सुख देता है, लेकिन कभी-कभी अपनों का व्यवहार मन को गहरी ठेस पहुँचा देता है। यह ग़ज़ल ऐसे ही रिश्तों और उन व्यवहारों को स्वर देती है, जहाँ किसी की सफलता से मुँह मोड़ा जाता है, असफलता को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है और तानों से मन आहत किया जाता है।” दुखती रगों को दबाते बहुत हैं, कुछ अपने, दुखों को बढ़ाते बहुत हैं । सुनकर सफलता मुँह फेरते जो, खबर हार की वो फैलाते बहुत हैं । अंधेरों में तन्हा डरा छोड़़ जाते, उजालों में वे साथ आते बहुत हैं । भूखे से बासी भी भोजन छुपाते, मनभर को छक-छक खिलाते बहुत हैं । बनी बात सुनने की फुर्सत नहीं है, बिगड़ी को फिर-फिर दोहराते बहुत हैं । पूछो तो कुछ भी नहीं जानते हैं , भटको तो ताने सुनाते बहुत हैं । बड़े प्यार से अपनी नफरत निभाते, समझते नहीं पर समझाते बहुत हैं । दिखाना है इनको मंज़िल जो पाके, इसी होड़ में कुछ, कमाते बहुत हैं । तानों से इनके आहत ना हों तो, अनजाने ही दृढ़ बनाते बहुत हैं । ✨धन्यवाद🙏 रिश्तों की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती एक और रचना पढ़िए —  ●  खून के हैं जो रिश्ते बदलते नहीं

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