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एक चिट्ठी से कोर्ट मैरिज तक...

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                       चित्र, साभार गूगल से... ऑण्टी! आपका बेटा शिवा रोज मेरे पीछे मेरे स्कूल तक क्यों आता है? जबकि वो तो सरकारी स्कूल में पढ़ता है न,  और आपके पड़ोस में रहने वाली दीदीयाँ शिवा का नाम लेकर मुझे क्यों चिढ़ाती है ? आप शिवा को समझाना न ऑण्टी!  कि उधर से न आया करे। घर पर आयी मम्मी की सहेली से ग्यारह वर्षीय भोली सी सलोनी बोली तो दोनों सखियाँ ओहो! कहकर हँसने लगी...। कुछ दिनों बाद दीपावली के पर्व पर मम्मी ने सलोनी को शिवा के घर मिठाई देने भेजा। सभी बड़ों को अभिवादन कर वह शिवा से बोली"तुमने ऑण्टी की बात मानी और उसके बाद मेरे पीछे नहीं आये इसके लिए थैंक्यू! पंद्रह वर्षीय शिवा भी मुस्कुराते हुए हाथ आगे बढ़ाकर बोला,"फ्रेण्ड्स"? "फ्रेण्ड्स" कहकर सलोनी ने भी अपना हाथ आगे बढाया तो शिवा ने तुरन्त अपनी जेब से फोल्ड किया कागज उसके हाथ में थमाते हुए उसके कान में धीरे से कहा, "पढ़कर इसका जबाब जरूर देना, मैं इंतजार करूंगा"। "क्या है ये" सलोनी ने आश्चर्य से पूछा तो शिवा ने होंठों पर उंगली रखते हुए "श्श्श..." कहकर उसे...

क्षण-भंगुर जीवन

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"सान्ता ! ओ सान्ता ! तूने फिर चक्की खोल दी, अरे!इस महामारी में भी तू अपनी आदत से बाज नहीं आ रही ।कितने सारे लोग गेहूं पिसवाने आ रहे हैं,अगर किसी को बीमारी होगी तो तू तो मरेगी ही अपने साथ मुझे और मेरे बच्चों को भी मारेगी" । "चुप करो जी ! ऐसा कुछ नहीं होगा और देखो मैंने अच्छे से मुँह ढ़का है फिर भी नसीब में अभी मौत होगी तो वैसे भी आ जायेगी । चक्की बन्द कर देंगे तो खायेंगे क्या ? कोरोना से नहीं तो भूख से मर जायेंगे , तुम जाओ जी ! बैठो घर के अन्दर !  मुझे मेरा काम करने दो"! "हाँ ! हाँ ! मत मान मान मेरी मेरी बात । यहीं रह अपनी चक्की में ! तेरा खाना -पीना यहीं भेज दूँगा और हाँ ! सो भी यहीं जाना कहीं कोने में ! मैं तो चला । अपने बच्चों के साथ मजे से जीऊंगा ! तुझे मरना है न , तो मर"!  (बड़बड़ाते हुए अमरजीत वहाँ से चला गया)। (हुँह करके सान्ता भी मुँह घुमाकर अपने काम में व्यस्त हो गयी) दोपहर में बेटी दीपा ने आवाज लगायी "माँ ! बाबूजी !खाना तैयार है जल्दी आ जाओ तो सान्ता बोली "बेटा ! तुम खा लो और अपने बाबूजी को भी खिला देना, मैं बाद में खा लूँगी...

प्रवासी (मुक्तक)

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   मुक्तक---मेरा प्रथम प्रयास                       (1) हमें तो गर्व था खुद पे कि हम भारत के वासी हैं दुखी हैं आज जब जाना यहाँ तो हम प्रवासी हैं सियासत की सुनो जानो तो बस इक वोट भर हैं हम सिवा इसके नहीं कुछ भी बस अंत्यज उपवासी हैं                                  ( 2) महामारी के संकट में आज दर-दर भटकते हैं जो मंजिल थी चुनी खुद ही उसी में अब अटकते हैं मदद के नाम पर नेता सियासी खेल हैं रचते कहीं मोहरे कहीं प्यादे बने हम यूँ लटकते हैं                          (3) सहारे के दिखावे में जो भावुकता दिखाते हैं बड़े दानी बने मिलके जो तस्वीरें खिंचाते हैं सजे से बन्द डिब्बे यों मिले अक्सर हमें खाली किसी की बेबसी पर भी सियासत ही सजाते हैं         चित्र गूगल से साभार हार्दिक अभिनंदन आपका🙏 पढ़िए एक और रचना निम्न लिंक पर ●  पत्थरदिल मर्द बड़ा बे...

गीत- मधुप उनको भाने लगा...

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देखो इक भँवरा बागों में आकर मधुर गीत गाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा पेड़ों की डाली पे झूले झुलाये फूलों की खुशबू को वो गुनगुनाए प्रीत के गीत गाकर वो चालाक भँवरा पुष्पों को लुभाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा । नहीं प्रेम उसको वो मकरन्द चाहता इक बार लेकर कभी फिर न आता मासूम गुल को बहकाये ये जालिम स्वयं में फँसाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा । सभी फूल की दिल्लगी ले रहा ये वफा क्या ये जाने नहीं यहाँ आज कल और जाने कहाँ ये सदाएं भी माने नहीं पटे फूल सारे रंगे इसके रंग में मधुप उनको भाने लगा कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा । ना लौटा जो जाके तो गुल बिलबिलाके राह उसकी तकने लगे विरह पीर सहते , दलपुंज ढ़हते नयन अश्रु बहने लगे दिखी दूजि बगिया खिले फूल पर फिर बेवफा गुनगुनाने लगा । कभी पास आकर कभी दूर जाकर अदाएं दिखाने लगा ।      चित्र साभार गूगल से पढ़िए मानवीकरण पर आधारित एक और गीत              ◆  पुष्प और भ्रमर

गीत-- शीतल से चाँद का क्या होना

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                इस गरम मिजाजी दुनिया में शीतल से चाँद का क्या होना कुछ दिन ही सामना कर पाता फिर लुप्त कहीं छुप छुप रोना जस को तस सीख न पाया वो व्यवहार कटु न सह पाता क्रोध स्वयं पीकर अपना निशदिन ऐसे घटता जाता निर्लिप्त दुखी सा बैठ कहीं प्रभुत्व स्वयं का फिर खोना इस गरम मिजाजी दुनिया में शीतल से चाँद का क्या होना स्वामित्व दिखाने को जग में कड़वा बनना ही पड़ता है सूरज जब ताप उगलता है जग छाँव में तभी दुबकता है अति मीठे गुण में गन्ने सा कोल्हू में निचोड़ा नित जाना इस गरम मिजाजी दुनिया में शीतल से चाँद का क्या होना                          चित्र साभार गूगल से...

सम्भावित डर

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                चित्र गूगल से साभार पति की उलाहना से बचने के लिए सुमन ने ड्राइविंग तो सीख ली,  मगर भीड़ भरी सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए उसके हाथ-पाँव फूल जाते।आज बेटी को स्कूल से लाते समय उसे दूर चौराहे पर भीड़ दिखी तो उसने स्पीड स्लो कर दी। "मम्मा ! स्पीड क्यों स्लो कर दी आपने" ? बेटी  झुंझलाकर बोली तो सुमन बोली "बेटा !आगे की भीड़ देखो!वहाँ पहुँचकर क्या करुँगी, मुझे डर लग रहा है, छि!  मेरे बस का नहीं ये ड्राइविंग करना"। "अभी स्पीड ठीक करो मम्मा ! आगे की आगे देखेंगे। ये गाड़ियों के हॉर्न सुन रहे हैं आप? सब हमें ही हॉर्न दे रहे हैं मम्मा ! उसकी झुंझलाहट देखकर सुमन ने थोड़ी स्पीड तो बढ़ा दी पर सोचने लगी, बच्ची है न, आगे तक  नहीं सोचती। अरे ! पहले ही सोचना चाहिए न आगे तक, ताकि किसी मुसीबत में न फँसे । वह सोच ही रही थी कि उसी चौराहे पर पहुँच गयी जहाँ की भीड़ से डरकर उसने स्पीड कम की थी। परन्तु ये क्या! यहाँ तो सड़क एकदम खाली है! कोई भीड़ नहींं ! साथ में बैठी बेटी को अपने में मस्त देखकर वह सोची, चलो ठीक है इसे ध्यान नहीं, कोई ब...

नवगीत--- 'तन्हाई'

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 अद्य को समृद्ध करने हेतु अपने सुख थे त्यागे अब न अपने साथ कोई जो थे अपनी राह भागे स्वस्थ थे सुख ले न पाये , थी कहाँ परवाह तन की। भविष्य के सपने सजाते, ना सुनी यूँ चाह मन की। व्याधियां हँसने लगी हैं, सो रहे दिन रात जागे। अब न अपने साथ कोई, जो थे अपनी राह भागे। आज ऐसे यूँ अकेले, जिन्दगी के दिन हैं कटते । अल्लसुबह से रात बीते, यूँ अतीती पन्ने फटते। जागते से नेत्र बोले, स्वप्न झूठी बात लागे। अब न अपने साथ कोई, जो थे अपनी राह भागे।     चित्र गूगल से साभार

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