कासे कहूँ काव्य-संग्रह की समीक्षा
मन की महकी गलियों में,
बस दो पल हमें भी घर दो ना!
लो चंद मोती मेरी पलकों के,
मुस्कान अधर में भर लो ना!
प्यार और मनुहार से मुस्कान अर्पित करती कविता ‘अर्पण’ से लेकर ‘कासे कहूँ, हिया की बात’ तक विविध भावों और संवेदनाओं को समेटे इक्यावन कविताओं का संग्रह है—ब्लॉग जगत के स्थापित हस्ताक्षर, जाने-माने साहित्यकार और पेशे से इंजीनियर आदरणीय विश्वमोहन जी का द्वितीय काव्य-संग्रह ‘कासे कहूँ’।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी आ. विश्वमोहन जी की पुस्तक में अनेक भाषाविदों और प्रतिष्ठित साहित्यकारों के विचार भी शामिल हैं, जो संग्रह के प्रति उनकी साहित्यिक पहचान और रचनात्मक प्रयासों को सामने रखते हैं।
संग्रह की पहली कविता ‘सपनों का साज’ पाठक की रुचि जगाती है और उसे अन्य रचनाएँ पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
चटक चाँदनी की चमचम
चंदन का लेप लगाऊँ
हर लूँ हर व्यथा थारी
मन प्रांतर सहलाऊँ।
आ पथिक, पथ में पग-पग-
सपनों के साज सजाऊँ।
सहज-सरल भाषा, आँचलिकता की मिठास और शब्दों का सुंदर संयोजन इस कविता को आकर्षक बनाते हैं। संग्रह की कई रचनाओं में भावों की अभिव्यक्ति और अलंकारों का प्रयोग काव्य-सौंदर्य को बढ़ाता है।
नारी के प्रति संवेदना और सम्मान
आ. विश्वमोहन जी की अनेक कविताओं में नारी के प्रति संवेदना और सम्मान दिखाई देते हैं। ‘तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे’ कविता में नारी के श्रम, प्रतीक्षा और पीड़ा को अभिव्यक्ति मिली है।
प्राची से पश्चिम तक दिन भर
खड़ी खेत में घड़ियाँ गिनकर।
नयन मीत में टाँके रहती,
तपन प्यार का दिनभर सहती।
क्या गुजरी उस सूरजमुखी पर,
अँधियारे जब डाले पहरे।
तुम क्या जानो, पुरुष जो ठहरे!
‘जुलमी फागुन! पिया न आयो’ में विरह की अनुभूति है, तो ‘नर-नपुंसक’ में नारी पर होने वाले अत्याचार और शोषण के प्रति आक्रोश दिखाई देता है। कवि सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की विसंगतियों को भी अपनी कविता का विषय बनाते हैं।
राजनीति या राजधरम यह,
कायर नर की अराजकता है।
सरयू का पानी भी सूखा,
अवध न्याय का स्वाँग रचता है।
इसी कविता में महाभारत के प्रसंग के माध्यम से नारी के अपमान और अन्याय के सामने पुरुषों की निष्क्रियता पर प्रहार किया गया है।
हबस सभा ये हस्तिनापुर में,
निरवस्त्र फिर हुई नारी है।
अन्धा राजा, नर-नपुंसक,
निरलज ढीठ रीत जारी है!
नारी के प्रति कवि की दृष्टि केवल उसकी पीड़ा तक सीमित नहीं है। ‘नर-नारी’ और ‘परमब्रह्म माँ शक्ति-सीता’ जैसी रचनाओं में नारी की शक्ति और महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है।
मातृ-शक्ति, जनती-संतति,
चिर-चैतन्य, चिरंतन-संगति।
चिन्मय-आलोक, अक्षय-ऊर्जा,
सृष्टि सुलभ सुधारस सद्गति।
‘परमब्रह्म माँ शक्ति-सीता’ में कवि ने राम और सीता के चरित्रों को एक अलग दार्शनिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।
प्रतीक बिम्ब सब राम कथा में,
कौन है हारा और कौन जीता।
राम भटकता जीव मात्र है
परमब्रह्म माँ शक्ति-सीता।
इन रचनाओं में नारी की शक्ति, गरिमा और सम्मान के प्रति कवि का दृष्टिकोण स्पष्ट होता है।
सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर कटाक्ष
आ. विश्वमोहन जी का लेखन व्यक्तिगत संवेदनाओं तक सीमित नहीं है। वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था की विसंगतियों पर भी बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। समसामयिक घटनाओं, मीडिया और राजनीति से जुड़े विषयों पर उनकी व्यंग्यात्मक दृष्टि संग्रह की कई कविताओं में दिखाई देती है।
‘कासे कहूँ’ में नोटबंदी और आर्थिक व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कवि लिखते हैं—
कैसलेस, डिजिटल समाज,
मंदी....फिर...आर्थिक बुलंदी।
जन-धन आधार माइक्रो एटीएम
आर्थिक नाकेबन्दी! जय नोटबंदी!!
‘आह नाजिर!’ और ‘वाह नाजिर!’ जैसी रचनाओं में भी राजनीतिक विडंबनाओं पर व्यंग्य देखने को मिलता है।
जहाँ राजनीति का कीड़ा है
वहीं भयंकर पीड़ा है।
जय भारत जय भाग्य-विधाता,
जनगण मनधन खुल गया खाता।
‘पुरस्कार वापसी’ में कवि लेखकों और पत्रकारों के वैचारिक आग्रहों तथा साहित्यिक दायित्वों पर प्रश्न उठाते हैं।
कलमकार कुंठित-खंडित है
स्पंदनहीन हुआ दिल है।
वाद पंथ के पंक में लेखक,
विवेकहीन मूढ़ नाकाबिल है।।
दल-दलदल में हल कर अब,
मिट जाने का अंदेशा है।
साहित्य-सृजन अब मिशन नहीं,
पत्रकार-सा पेशा है।।
‘डेंगू’ कविता में चिकित्सा व्यवस्था के व्यावसायीकरण पर कटाक्ष किया गया है।
‘प्लेटलेट्स की पतवार फँसी ‘डेंगी’ में।’
चिकित्सा को सेवा के बजाय व्यापार बना देने की प्रवृत्ति पर कवि की नाराजगी इस रचना में दिखाई देती है।
कोरोना काल और लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की पीड़ा भी कवि की संवेदना का विषय बनी है। संकट के समय उन्हें जिस उपेक्षा और विवशता का सामना करना पड़ा, उसे व्यक्त करती पंक्तियाँ हैं—
छुप गये सारे सियार,
अपनी माँद में।
अगर पहले ही कोई कह देता
"आओ, रहो, ठहरो
अब तक तुमने खिलाया
अब हमारी भी थोड़ी खाओ"
इन पंक्तियों में संकट के समय सामाजिक संवेदनहीनता और प्रवासी मजदूरों की उपेक्षा का भाव उभरता है।
सामाजिक बुराइयाँ और मानवीय संवेदनाएँ
समाज में फैली बुराइयों, रूढ़ियों और दरकती मानवीय संवेदनाओं से कवि का मन व्यथित है। ‘गाँजे का दम’, ‘हाकिम की मनमानी’, ‘दारू की तलाशी’ और ‘खाकी की चानी’ जैसे शीर्षक व्यवस्था की विसंगतियों की ओर ध्यान खींचते हैं।
‘कुटिल कौम! कैसी फितरत!’ में राजनीति और हिंसा के अमानवीय रूप पर चोट की गई है।
सियासत की सड़ी सड़कों पर,
गिद्ध चील मंडराते हैं।
बच्चों की लाशों को जुल्मी,
नोंच-नोंच कर खाते हैं।
तमाम विसंगतियों और विडंबनाओं के बीच कवि आशा का दामन नहीं छोड़ते। ‘आशा का बीज’ में मानवीय करुणा और सहयोग की भावना को अभिव्यक्ति मिली है।
मरा मानव
पर जागी मानवता
दम भर छलका करुणा का अमृत
थामने को बढ़े आतुर हाथ,
और बाँटने को
आशा का नया बीजन।
समवेत स्वर।
सृजन! सृजन!! सृजन!!!
यह कविता विपरीत परिस्थितियों में भी मानवता के जीवित रहने और आशा के अंकुरित होने की संभावना को सामने रखती है।
रिश्तों और जीवन के विविध रंग
विलुप्त होती गौरैया हो या ‘भोर-भोरैया’, कवि की दृष्टि प्रकृति और जीवन के विविध रूपों तक पहुँचती है। रिश्तों से जुड़ी संवेदनाएँ भी संग्रह की कई रचनाओं में दिखाई देती हैं।
‘बाबूजी’ में मध्यमवर्गीय परिवार के पिता के संघर्ष, उनकी विवशताओं और बच्चों के भविष्य के लिए सँजोए सपनों का मार्मिक चित्रण मिलता है।
कफ और बलगम नतमस्तक!
अरमान तक घोंटने में माहिर,
जेब की छेद में अँगुली नचाते
पकता मोतियाबिंद, और पकाते
सपनों के धुँधले होने तक!
बाबूजी की आँखों में, रोशन अरमान
बच्चों के बनने का सपना!
इन पंक्तियों में आर्थिक अभावों के बीच बच्चों के भविष्य के लिए चिंतित पिता की विवशता और उनके सपनों को अभिव्यक्ति मिली है।
‘बापू’ में राष्ट्रपिता को संबोधित करती पंक्तियाँ भी ध्यान खींचती हैं—
उठ न बापू! जमना तट पर,
क्या करता रखवाली?
‘गरीबन के चूल्हा’, ‘पानी-पानी’, ‘बैक वाटर’, ‘बेटी बिदा’, ‘मृग मरीचिका’, ‘रिश्तों की बदबू’, ‘आस्तीन का साँप’, ‘पंथ-पंथ मौसेरे भाई’, ‘दुकान से दूर’, ‘साहित्यकार’, ‘भूचाल’, ‘फुटपाथ’ और ‘जनता जनार्दन की जय’ जैसी रचनाओं के शीर्षक ही पाठक की उत्सुकता जगाते हैं। इनके माध्यम से संग्रह में सामाजिक जीवन, रिश्तों और व्यवस्था से जुड़े विविध विषय सामने आते हैं।
आँचलिक भाषा और संग्रह का शीर्षक
संग्रह की एक विशेषता आँचलिक भाषा का प्रयोग है। लोकजीवन से जुड़े शब्द और बोलचाल की अभिव्यक्तियाँ कई रचनाओं को अलग पहचान देती हैं। ‘कासे कहूँ, हिया की बात’ की पंक्तियाँ इसका उदाहरण हैं—
भोर भिनसारे, कउआ उचरे,
छने-छने, मन भरमात।
जेठ दुपहरिया, आग लगाये,
चित चंचल, अचकात।
कासे कहूँ, हिया की बात!
अनेक विसंगतियों से व्यथित कवि का मन अपनी बात कहने के लिए जैसे किसी संवेदनशील श्रोता की तलाश करता है। यही भाव संग्रह के शीर्षक ‘कासे कहूँ’ को अर्थपूर्ण बनाता है।
संग्रह की विशेषताएँ और कुछ सुझाव
‘कासे कहूँ’ में विषयों की विविधता, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएँ और आँचलिक भाषा का प्रयोग उल्लेखनीय है। कवि कहीं नारी की पीड़ा को स्वर देते हैं, कहीं व्यवस्था पर व्यंग्य करते हैं, तो कहीं रिश्तों और मानवीय करुणा के माध्यम से जीवन के दूसरे पक्ष सामने लाते हैं।
समीक्षा के दृष्टिकोण से संग्रह में सुधार की दो संभावनाएँ भी दिखाई देती हैं—
- अनुक्रमणिका में कविताओं को उनकी विषयवस्तु के आधार पर अलग-अलग खंडों में बाँटकर क्रमबद्ध किया जाता, तो पाठकों के लिए अपनी रुचि के विषय की रचनाएँ ढूँढ़ना सुविधाजनक होता।
- आँचलिक भाषा के शब्दों के अर्थ पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर दिए गए हैं। यदि अपरिचित शब्दों के अर्थ संबंधित कविताओं के साथ भी उपलब्ध होते, तो पाठकों को रचनाओं का भाव समझने में अधिक सुविधा मिलती।
इन सुझावों के अतिरिक्त, संग्रह की कई रचनाओं में भाषा का प्रवाह, लय और शिल्प-सौंदर्य ध्यान आकर्षित करते हैं। आँचलिक शब्दों और सामाजिक विषयों का प्रयोग कवि की रचनात्मक रुचियों को सामने लाता है।
समग्र रूप से ‘कासे कहूँ’ आ.विश्वमोहन जी की विविध विषयों में रुचि और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी काव्य-दृष्टि का परिचय देती है। हिंदी कविता में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह संग्रह विचार और अनुभूति के कई धरातल प्रस्तुत करता है।
इस संग्रह के लिए आदरणीय विश्वमोहन जी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
पुस्तक परिचय
पुस्तक: कासे कहूँ
लेखक: विश्वमोहन
प्रकाशक: विश्वगाथा, सुरेन्द्रनगर, गुजरात – 363002
मूल्य: ₹150
पुस्तक प्राप्त करने के लिए:
https://www.amazon.in/Kase-kahu-Vishwamohan/dp/8194261090
✨धन्यवाद🙏
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आदरणीय विश्वमोहन जी की प्रतिभा से भला ब्लॉग जगत में कौन अपरिचित है? उनकी काव्य-रचनाओं का संग्रह निश्चय ही साहित्य-प्रेमियों के निमित्त एक संजोकर रखने योग्य धरोहर होगा। 'कासे कहूँ' की आपने समीक्षा ही नहीं की है, एक वातायन खोला है अपने पाठकों के लिए जिससे वे इस काव्य-कोष की एक विहंगम दृष्टि प्राप्त करें तथा इस सम्पूर्ण सृजन के आस्वादन हेतु आतुर हो जाएं। शुभकामनाएं विश्वमोहन जी को तथा आभार आपका सुधा जी।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आ.जितेन्द्र जी!
हटाएंसादर आभार।
ब्लॉग-जगत की उत्तम पाठिका, अत्यंत उदार टिप्पणीकार और लेखकों को अपने प्रोत्साहन का पीयूष-पान कराने वाली सधी समीक्षक सरस्वती-सुता सुधा जी का मेरी पुस्तक का सूक्ष्म विश्लेषण मेरे लिए परम सौभाग्य का विषय है। विशेष रूप से समीक्षा के उत्तर खंड में लिखे गए आलोचना के शब्द मेरे लिए 'सुधा' सदृश ही हैं। आपके ये आशीर्वचन हमारे भविष्य के लेखन-पथ को महत्वपूर्ण प्रकाश-स्तम्भ के समान सदैव आलोकित करते रहेंगे।
जवाब देंहटाएंहृदयतल से धन्यवाद आ.विश्वमोहन जी समीक्षा की सराहना कर उत्साहवर्धन हेतु.....ये आपका बड़प्पन है कि आलोचना को भी सकारात्मक लेते हैं परन्तु मैं नियमावली के तहत की हुई इस आलोचना के लिए संकुचित हूँ आप और आपका सृजन मेरे लिए हमेशा पथप्रदर्शक रहे हैं...ऐसे में आलोचना..छोटे मुँह बड़ी बात है.. क्षमाप्रार्थी 🙏🙏🙏🙏
हटाएंसादर आभार।
पुस्तक की सार्थकता और सफलता के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं💐
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार डबराल भाई!
हटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२५-१२ -२०२१) को
'रिश्तों के बन्धन'(चर्चा अंक -४२८९) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
तहेदिल से धन्यवाद प्रिय अनीता जी! मेरी रचना को चर्चा मंच पर चयन हेतु...
हटाएंसस्नेह आभार।
प्रिय सुधा जी, आदरणीय विश्वमोहन जी की सुंदर पुस्तक ' कांसे कहूं 'की सांगोपांग समीक्षा कर आपने अतुलनीय समीक्षात्मक प्रतिभा का परिचय दिया है | उनका लेखन ब्लॉग जगत में अपनी पहचान आप रखता है और उस विद्वतापूर्ण लेखन का अवलोकन और मूल्यांकन सहज कार्य नहीं है |'उनके पास भाषा का ज्ञान और संस्कार दोनों हैं | कांसे कहूँ ' मैंने भी महीनों पहले मंगवाई थी और एक समीक्षा भी लिखी थी पर कई अपरिहार्य कारणों से ब्लॉग पर ना डाल सकी | आपकी समीक्षा पढकर लगा ये बहुत जरूरी है कि हम जो पुस्तक पढ़ते हैं उस पर बेबाक राय प्रकट करना अनिवार्य है , जिसके लिए जैसे भी हो समय देना बहुत जरूरी है | आपने समीक्षा के जरिये पुस्तक के सभी पक्षों को बड़ी बेबाकी से रखा है |सभी विषयों पर लिखी गयी रचनाएँ मन को छूती भी है और कचोटती भी है | साहित्य -जगत में इस पुस्तक का उचित मूल्यांकन हो यही कामना है | आपको हार्दिक आभार इस प्रयास विशेष के लिए और विश्वमोहन जी को पुस्तक हेतु शुभकामनाएं| |
जवाब देंहटाएंहृदयतल से धन्यवाद प्रिय रेणु जी!उत्साहवर्धन हेतु...। बस यही संकोच कि समीक्षा विभिन्न मापदंडों पर खरी उतरेगी या नहीं ..आपकी सराहना पाकर चैन मिला...अत्यंत आभार आपका।
हटाएंबहुत विस्तृत और सारगर्भित समीक्षा ...
जवाब देंहटाएंविश्वमोहन जी का लेखन जितना स्तरीय है उसकी एक झलक इतनी कमाल है तो पुस्तक दिलचस्प होने वाली है ...
बहुत बहुत बधाई आपको और विश्वमोहन जी को ...
जी, नासवा जी ! वाकई विस्तृत तो है परन्तु आ.विश्वमोहन जी का लेखन है ही इतना लाजवाब कि क्या छोड़ें क्या लिखें कशमोकश में समीक्षा विस्तृत हो गयी...
हटाएंतहेदिल से धन्यवाद विस्तृत समीक्षा को समय देकर पढ़ने हेतु।
आपकी लेखनी से सृजित लाजवाब समीक्षा सुधा जी! बहुत बहुत आभार आपका आ. विश्व मोहन जी पुस्तक "कासे कहूँ" की गहन समीक्षा के माध्यम से पाठकों को पुस्तक से परिचित करवाने हेतु।आपको सुन्दर समीक्षा के लिए बहुत बहुत बधाई आ. विश्व मोहन जी को भी “कासे कहूँ” के प्रकाशन के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद मीना जी! उत्साहवर्धन हेतु।
हटाएंसस्नेह आभार।
पुस्तक के प्रति रुचि जगाती समीक्षा।
जवाब देंहटाएंहृदयतल से धन्यवाद एवं आभार नैनवाल जी!
हटाएंआदरणीय विश्व मोहन जी सर को पुस्तक 'कासे कहूँ' के प्रकाशन पर अनेकानेक बधाई एवं ढेरों शुभकामनाएँ।
जवाब देंहटाएंइनके लेखन की जितनी तारीफ़ की जाए कम ही होगी।
सुधा दी के शब्द पुस्तक के प्रति मोह उत्पन्न करती सराहनीय समीक्षा।
दोनों को हार्दिक बधाई।
सादर स्नेह
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार प्रिय अनीता जी!
हटाएंविश्व मोहन जी एक उच्च कोटि के रचनाकार हैं ये सभी ब्लागर और पाठक अच्छी तरह से जानते हैं,उन का भाषा सौष्ठव, शब्दों पर गहरी पकड़, अप्रचलित शब्दों के साथ सुंदर प्रवाह लिए अप्रतिम सृजन, अलंकारों का सांगोपांग प्रयोग, विशेष कर यमक की आलोकित चमक हर दृष्टि से पाठक को विस्मित करती है,
जवाब देंहटाएंवे निःसंदेह शब्दों के जादूगर, भावों के प्रणेता,कुशल शिल्पी है। मैं सदा से गूगल प्लस से उन्हें पढ़ती आई हूँ और उनकी प्रशंसक रही हूँ और आज भी हूँ।
आदरणीय विश्व मोहन जी को उनके इस संकलन के लिए अनंत बधाई एवं शुभकामनाएं।
पुस्तक समीक्षा के बारे में मैं सच निशब्द हूँ, सुधा जी ने सुंदर काव्य फूलों को यथोचित सम्मान देकर उन पर विस्तृत प्रकाश ही नहीं डाला बल्कि एक उत्तम समालोचक की दृष्टि से हर पहलू पर अपनी बेबाक टिप्पणी दी है, जो कि उन्हें एक उत्कृष्ट लेखिका के साथ उत्कृष्ट समालोचक भी बनाती है।
सुधा जी को इस श्र्लाघ्य समीक्षा के लिए साधुवाद एवं बधाई।
पुस्तक की समीक्षा सोने पर सुहागा है जो उस की चमक को द्विगुणित कर रही हैं।
पुनः लेखक और समिक्षिका जी को हृदय से बधाई।।
तहेदिल से धन्यवाद आ. कुसुम जी!आपकी अनमोल सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया पाकर अभिभूत हूँ ..सादर आभार आपका।
हटाएंवाह लाजबाव समीक्षा, विश्व मोहन जी को अनंत शुभकामनाएं
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार भारती जी!
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 27 दिसम्बर 2021 को साझा की गयी है....
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार यशोदा जी!
हटाएंमेरी रचना साझा करने हेतु।
समीक्षा बहुत बहुत सुन्दर और सराहनीय है ।जो काफी कुछ स्पष्ट कर देती है । पीआर अभी एसबी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया हूं । पूरी विवेचना बाद मैं करूंगा ।
जवाब देंहटाएंहृदयतल से धन्यवाद आ.आलोक जी!
हटाएंसादर आभार।
आदरणीय मैम,
जवाब देंहटाएंआपने विश्वमोहन जी के सृजन को सहजते हुए , उनके अनमोल एक - एक शब्दों के साथ पुर्ण न्याय किया है।
जितनी रोचक उनकी कविताएं है उतनी ही सराहने योग्य एवं सुन्दर आपकी समीक्षा भी है।
अपना स्नेह एवं अनुभव युही साझा करती रहें । आपसे बहुत कुछ सीखना है ।
धन्यवाद!
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आतिश जी!प्रोत्साहन हेतु।
हटाएंपुस्तक की गहन समीक्षा पढ़ने को मिली ।।समीक्षा के माध्यम से स्पष्ट हो रहा है कि पुस्तक उत्कृष्ट साहित्य का नमूना है । विश्व मोहन जी को जितना पढ़ा है उसके आधार पर कह सकती हूँ कि बेहतरीन समीक्षा की है । विश्व मोहन जी को पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ ।
जवाब देंहटाएंआपको सटीक समीक्षा के लिए साधुवाद ।
हृदयतल से धन्यवाद आ.संगीता जी! सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया से उत्साहद्विगुणित करने हेतु...
हटाएंसादर आभार।
बहुत अच्छी समीक्षा प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.कविता जी!
हटाएंलाजबाव समीक्षा, विश्व मोहन जी की रचनाए मन मोह लेती हैं विश्व मोहन जी को हार्दिक शुभकामनाएं🙏
जवाब देंहटाएंजवाब दें
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार अंकित जी !
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।
सुन्दर समीक्षा
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार मनोज जी!
हटाएंविश्व मोहन जी को जितनी बार पढ़ा है उतनी ही बार कुछ नया समझा व सीखा है।
जवाब देंहटाएंआपकी समीक्षा करने के अंदाज से इस बुक को पढ़ने का मन करने लगा है।
आभार।
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार रोहिताश जी!
हटाएंप्रोत्साहन हेतु।
विश्वमोहन जी ने अपनी उत्कृष्ठ रचनाओं से ब्लॉग जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। विश्व मोहन जी पुस्तक "कासे कहूँ" की गहन और सुंदर समिक्षा के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
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