संदेश

हाइबन

चित्र
                               【1】 एक विधवा वन से लकड़ियां काटकर उन्हें घर -घर बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करती थी अचानक वन विभाग से लकड़ी काटने पर सख्त मनाही होने से वह जंगल से लकड़ियां नहीं ला पायी तो घर में भुखमरी की नौबत आ गयी उससे ये सब सहा न गया तो वह रात के अंधेरे में जंगल से लकड़ियां चुराने निकल पड़ी, उसने लकड़ियां काटकर गट्ठर तैयार किया और उठाने ही वाली थी कि तभी भयंकर चिंघाड़ सुनकर उसके हाथ पैर ठंडे पड़ गये देखा तो उसके ठीक सामने चीता खड़ा था , काटो तो खून नहीं वाली हालत थी उसकी डर से...बचने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था उसे...अनायास ही उसने दोनो हाथ जोड़ दिये और जैसी थी वैसी ही जड़ हो गयी, उसने बताया चीता उसके और करीब आया इतना करीब कि अब उसे उसका पीछे का हिस्सा ही दिखाई दे रहा था और वह अपलक स्थिर हाथ जोड़े खड़ी थी उसे लगा कि चीते ने उसे सूंघा और क्षण भर बाद वह मुड़ गया और वहां से चला गया। इसी खौफनाक दृश्य पर निर्मित्त् हाइबन ...... लकड़ी गट्ठा~ करबद्ध महिला चीता सम्मुख             ...

जन्म 'एक और गरीब का

चित्र
                                                                  खिल ही  जाते हैं गरीब की बगिया में भी मौसमानकूल कुछ फूल चाहे अनचाहे, सिसकते सुबकते कुछ अलसाये से । जिनके स्पर्श से जाग उठती है , उनकी अभावग्रस्त मरियल सी आत्मा । आशा की बुझती चिनगारी को फूँकनी से फूँक मार-मारकर, जलाते हैं हिम्मत की लौ । पीठ पर चिपके पेट और कंकाल सी देह को उठाकर धोती के चिथड़े से कमर कसकर सींचने लगते हैं ये अपनी बगिया । सिसकियाँ फिर किलकारियों में बदलती हैं ! और मुस्कराने लगती है इनकी कुटिया !              फिर इन्हीं का सहारा लिए  बढने लगती है    इनकी भी वंशबेल। हर माँ-बाप की तरह ये भी बुनते हैंं, चन्द रंगीन सपने ! और फिर अपनी औकात से बढ़कर, केंचुए सा खिंचकर तैयार करते हैं, अपने नौनिहाल के सुनहरे भविष्य का बस्ता ! उसे शिक्षित और स्वावलंबी बनाने हेतु भेजते हैं अपनी ही तरह  घिसते-पिटते सरक...

दर्द होंठों में दबाकर....

चित्र
उम्र भर संघर्ष करके रोटियाँ अब कुछ कमाई झोपड़ी मे खाट ताने नींद नैनों जब समायी नींद उचटी स्वप्न भय से क्षीण काया जब बिलखती दर्द होठों में दबाकर भींच मुट्ठी रूह तड़पती... शिथिल देह सूखा गला जब घूँट जल को है तरसता हस्त कंपित जब उठा वो सामने मटका भी हँसता ब्याधियाँ तन बैठकर फिर आज बिस्तर हैं पकड़ती दर्द होंठों में दबाकर भींच मुट्ठी रुह तड़पती ये मिला संघर्ष करके मौत ताने मारती है असह्य सी इस पीर से अब जिन्दगी भी हारती है खत्म होती देख लिप्सा रोटियाँ भी हैं सुबकती दर्द होंठों में दबाकर भींच मुट्ठी रुह तड़पती                           चित्र साभार गूगल से.... ऐसे ही एक और रचना वृद्धावस्था पर  " वृद्धावस्था   "

अपनों को परखकर....

चित्र
 अपनों को परखकर यूँ परायापन दिखाते हो  पराए बन वो जाते हैं तो आंसू फिर बहाते हो न झुकते हो न रुकते क्यों बातें तुम बनाते हो  उन्हें नीचा दिखाने को खुद इतना गिर क्यों जाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... मिले रिश्ते जो किस्मत से निभाना है धरम अपना जीत लो प्रेम से मन को यही सच्चा करम अपना तुम्हारे साथ में वो हैं तो हक अपना जताते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो। अपनों को परखकर ...... कोई रिश्ता जुड़ा तुमसे निभालो आखिरी दम तक सुन लो उसके भी मन की, सुना लो नाक में दम तक बातें घर की बाहर कर, तमाशा क्यों बनाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... ये घर की है तुम्हारी जो, उसे घर में ही रहने दो कमी दूजे की ढूँढ़े हो, कमी अपनी भी देखो तो बही थी प्रेम गंगा जो, उसे अब क्यों सुखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर.... चले घर त्याग करके जो, तो जाने दो न रोको तुम जहाँ खुश हैं रहें जाकर, न जाके उनको टोको तुम क्यों जाने वालों को घर की राह फिर फिर दिखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर ...

कभी ले हरी नाम अरी रसना!

चित्र
फूटे घट सा है ये जीवन भरते-भरते भी खाली है कभी ले हरि नाम अरी रसना ! अब साँझ भी होने वाली है..... जब से हुई भोर और आँख खुली जीवन, घट भरते ही बीता कितना भी किया सब गर्द गया खुद को पाया रीता-रीता धन-दौलत जो भी कमाई है सब यहीं छूटने वाली है। कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है...... इस नश्वर जग में नश्वर सब रिश्ते-नाते भी मतलब के दिन-रैन जिया सब देख लिया अन्तर्मन को अब तो मथ लें... मुरलीधर माधव नैन बसा छवि जिनकी बहुत निराली है कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है......                            चित्र, photopin.comसे...

हायकु

चित्र
1. जेष्ठ मध्याह्न~ नल पे बैठ काग पीता सलिल 2. रसोईघर~ फूलगोभी के मध्य भुजंग शिशु 3. धान रोपाई~ चहबच्चा में तैरे मृत बालक 4. शरद भोर~ चूनर ओढे़ बालक कन्या पंक्ति में 5. श्वान चीत्कार~ सड़क पे बिखरा रुधिर माँस 6. शरद भोर~ बादलों में निर्मित बिल्ली छवि

अधजली मोमबत्तियां

चित्र
 सुबह के नौ या दस बजे होंगे ,पूरी सोसायटी में दीपोत्सव की चहल पहल है ।  पटाखों पर लगे प्रतिबंध के बावजूद भी जगह जगह बिखरे बम-पटाखों के अवशेष साक्ष्य हैं इस बात के कि कितने जोर-शोर से मनाई गयी यहाँ दीपावली । आज सफाई कर्मी भी घर-घर से दीपावली बख्शीश लेते हुए पूरी लगन से ऐसे सफाई में लगे हैं मानो पटाखों के सबूत मिटा रहे हों... स्कूल की छुट्टी के कारण सोसायटी के बच्चे पार्क में धमा-चौकड़ी मचा रहे हैं । कुछ बच्चे ढ़िस्क्यांऊ-ढ़िस्क्यांऊ करते हुये खिलौना गन से पटाखे छुड़ा रहे हैं ,तो कुछ अपने-अपने मन पसंद खेलों में व्यस्त हैं ।  एक ऐसी टोली भी है यहाँ बच्चों की,जो अब अपने को बच्चा नहीं मानते; बारह - तेरह साल के ये बच्चे हर वक्त अपने को बड़ा साबित करने के लिए बेताब रहते हैं । ये सभी बैंच के इर्द-गिर्द अपने अनोखे अंदाज में खड़े होकर बीती रात पटाखों के साथ की गयी कारस्तानियां बारी -बारी से बयां कर रहे हैं ।  जब रोहन ने हाथ का इशारा करते हुए पूरे जोश में बताया कि उसका रॉकेट सामने वाली बिल्डिंग की छत से टकराते - टकराते बचा तो उसके इशारे के साथ ही सबकी नजरें सामने वाली छत तक जाकर वापस...

फ़ॉलोअर

लेबल

कविता -हास्यव्यंग1 कहानी18 कह़ानी1 कहानीकविता1 कांवड़1 काव्य रचना1 काव्य-संग्रह1 किसान1 कुण्डलिया छंद5 कुण्डलिया छन्द3 कृत्रिम बुद्धिमत्ता1 कोरोना काल1 गजल9 ग़ज़ल1 गढ़वाली कविता एवं उसका हिन्दी रूपांतरण1 गढ़वाली गीत1 गणपति वंदना1 गणेश भक्ति1 गर्मी पर कविता1 गर्मी पर बाल कविता1 गीत17 गीतात्मक कविता1 गुरु महिमा कविता1 गुरु महिमा पर दोहा मुक्तक1 गृहस्थ जीवन1 घरेलू हिंसा1 चिड़िया1 चौपाई | पावस पर कविता | बरसात पर कविता | सावन | शिव भक्ति1 छंद1 छंद कविता1 जल संरक्षण पर कविता1 जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग1 जीवन की समझ सकारात्मक सोच1 जीवन की सीख1 जीवन दर्शन4 जैसे को तैसा1 डिजिटल जुड़ाव1 तकनीक1 त्याग1 देशभक्ति1 दोहा मुक्तक2 दोहा-मुक्तक1 दोहे7 ध्यान1 नवगीत15 नारी सम्मान1 नारी सशक्तिकरण1 पकौड़े1 परिवार1 पाँच लिंकों का आनंद स्थापना दिवस1 पारिवारिक कहानी3 पारिवारिक रिश्ते1 पारिवारिक लघुकथा1 पारिवारिक संवेदना1 पावस पर कविता1 पुस्तक समीक्षा2 प्रकृति3 प्रकृति कविता3 प्राणायाम1 प्रार्थना5 प्रेणादायक आलेख1 प्रेम कविता1 प्रेरक लघुकथा1 प्रेरणादायक कहानी1 प्रेरणादायक हिंदी कविता2 बच्चों की परवरिश1 बरसात पर कविता2 बारिश पर गीत1 बाल कविता3 बाल मन1 बुज़ुर्ग1 भक्ति कविता5 भक्ति रचना1 भगवान गणेश1 भगवान शिव3 भारतीय संस्कृति1 भावनात्मक1 भावनात्मक रचना1 मन1 मन और लेखनी1 मन के भाव1 मनहरण घनाक्षरी3 मनहरण घनाक्षरी छंद4 ममता1 महादेव1 महिला सशक्तिकरण1 महिला सशक्तिकरण पर प्रेरणादायक कहानी।1 माँ1 माँ का त्याग1 माँ का प्रेम1 माँ की ममता1 माँ-बेटी1 माता पिता1 माता-पिता1 मातृ प्रेम1 मानवीय संवेदना1 मानवीय संवेदनाएँ1 मानवीय स्वभाव1 मुक्तक4 मुहावरे पर आधारित लघुकथा1 मोबाइल की लत तकनीक डिजिटल जीवन1 योग1 रक्षाबंधन1 राम भक्ति4 रिश्ते6 रोला छंद2 लघु कथा4 लघु कहानी5 लघुकथा20 लघुकथा | व्यंग्य | समाज | कोरोना काल | मानवीय संवेदना1 लेख6 वर्षा ऋतु3 वसंत पर कविता1 विवाह1 विश्वमोहन1 व्यंग कविता1 व्यंग लेख1 व्यंग्य1 शरद ऋतु2 शराब की लत1 शिक्षक दिवस1 शिक्षा -परीक्षा1 शिक्षा-परीक्षा1 शिव भक्ति4 शिव महिमा1 शुभकामना कविता1 श्रीराम2 संघर्ष1 संत1 संवेदनाएँ1 संस्मरण2 संस्मरणात्मक लेख1 सकारात्मक सोच2 सच्ची घटना1 सद्गुरु1 समय1 समीक्षा1 सामाजिक कहानी1 सामाजिक व्यंग्य1 सामाजिक सरोकार1 सामाजिक सोच1 सावन3 सावन पर कविता1 साहित्य1 सृजनशीलता1 सैनिक1 स्वास्थ्य1 हाइबन1 हायकु3 हास्यव्यंग कविता1 हास्यव्यंग लघुकथाएं1 हिंदी कविता10 हिंदी कहानी1 हिंदी दोहे1 हिंदी भावनात्मक कहानी1 हिंदी लघुकथा प्रेरक लघुकथा रिश्ते मनमुटाव संवाद जीवन दर्शन1 हिंदी लघुकथा माँ का त्याग प्रेरक लघुकथा प्रेरणादायक कहानी1 हिंदी लेख1 हिंदी साहित्य2
ज़्यादा दिखाएं