स्वार्थ और मानवीय मूल्यों पर आधारित दो कुण्डलियाँ

 परिचय

मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख, प्रेम और संबंधों के साथ उसके कर्म और मूल्य भी जुड़े होते हैं। जब स्वार्थ और लोभ हावी होने लगते हैं, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रिश्तों और समाज पर भी दिखाई देता है। सच्चे संबंधों की पहचान भी तभी संभव है, जब मन में प्रेम, विश्वास और अपनत्व के लिए जगह हो।

प्रस्तुत दोनों कुण्डलियों में इन्हीं भावों को अलग-अलग रूप में अभिव्यक्त किया गया है। पहली कुण्डलिया लोभ और ईमान से जुड़े मानवीय व्यवहार की ओर संकेत करती है, जबकि दूसरी सच्चे प्रेम और मित्रता को स्वार्थ से परे देखने की बात कहती है।

                     स्वार्थ और मानवीय मूल्यों पर दो कुण्डलियाँ


दुखद हादसे देखकर

दुखद हादसे देखकर, मन में उठती पीर।

लोभ वृत्ति है बढ़ रही, मानव हुआ अधीर।।

मानव हुआ अधीर, कहीं कुछ भी करता है।

धर्म-मर्म सब भूल, पाप गठरी भरता है।।

कहे सुधा सुन मीत, मिलेंगे सुखद रास्ते,

मत तज निज ईमान, टलेंगे दुखद हादसे।। 



मिला न सच्चा मीत

कहते दुख में डूबकर, मिला न सच्चा मीत।

स्वारथ मन में है भरा, ढूँढ़ रहे हैं प्रीत।।

ढूँढ़ रहे हैं प्रीत, प्रेम की बात न जाने।

छल-छद्मों में डूब, प्रेम को सौदा माने।।

कहे सुधा सुन मीत, परख जो निज मन लेते,

बनते सच्चे मीत, मित्र हित बात हैं कहते।।


निष्कर्ष

जीवन में सुखद और सार्थक संबंधों के लिए प्रेम, विश्वास और ईमान जैसे मानवीय मूल्यों का होना आवश्यक है। स्वार्थ और लोभ से मनुष्य भले ही कुछ समय के लिए अपने हित साध ले, लेकिन सच्चे रिश्तों की नींव निस्वार्थ भाव और अच्छे आचरण पर ही टिकती है। 




✨धन्यवाद🙏

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