भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

मंगलमय नववर्ष हो

 नववर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

Happy new year


बीत गया पच्चीस अब, बिसरें बीती बात ।

मंगलमय नववर्ष हो, सुखमय हो दिन रात।

शुभता का संदेश ले,  आएगा  छब्बीस ।

दुर्दिन होंगे दूर अब , सुख की हो बरसात ।।


स्वागत आगत का करें , अभिनंदन कर जोर ।

सबको दे शुभकामना , आये स्वर्णिम भोर ।

घर आँगन खुशियाँ भरे, विपदा भागे दूर,

सुख समृद्धि घर में बसे, खुशहाली चहुँओर ।।



हार्दिक शुभकामनाओं के साथ एक और रचना निम्न लिंक पर

● और एक साल बीत गया


टिप्पणियाँ

  1. वाह्ह दी अति सुंदर सृजन।
    सस्नेह प्रणाम।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    नववर्ष २०२६ मंगलमय हो।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार प्रिय श्वेता ! रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।

      हटाएं
  2. यह कविता पढ़ते ही मन अपने आप हल्का और सकारात्मक हो जाता है। आप बीते पच्चीस को सहजता से विदा करते हैं और नए वर्ष छब्बीस का खुले दिल से स्वागत करते हैं। मुझे इसकी सबसे अच्छी बात यह लगी कि आप उम्मीद, शुभकामना और विश्वास को बहुत सरल शब्दों में रखते हैं। नए साल की शुबकामनाएं

    जवाब देंहटाएं

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