मैं जो गई बाहर ( हिंदी कविता)
मैं जो गई बाहर, स्त्री मन की अनुभूति "यह एक भावनात्मक हिंदी कविता है जिसमें स्त्री के मन, घर से दूर जाने और जीवन में आए सूक्ष्म बदलावों को सुंदर रूप से व्यक्त किया गया है।" चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया । घर का आँगन, आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में, फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. ...

नव वर्ष मंगलमय हो🌹🙏🏻
जवाब देंहटाएंजी, अत्यंत आभार आपका 🙏
हटाएंनववर्ष मंगलमय हो
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार आपका ,🙏
हटाएंवाह्ह दी अति सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंसस्नेह प्रणाम।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
नववर्ष २०२६ मंगलमय हो।
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार प्रिय श्वेता ! रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
हटाएंयह कविता पढ़ते ही मन अपने आप हल्का और सकारात्मक हो जाता है। आप बीते पच्चीस को सहजता से विदा करते हैं और नए वर्ष छब्बीस का खुले दिल से स्वागत करते हैं। मुझे इसकी सबसे अच्छी बात यह लगी कि आप उम्मीद, शुभकामना और विश्वास को बहुत सरल शब्दों में रखते हैं। नए साल की शुबकामनाएं
जवाब देंहटाएंजी सादर आभार आपका🙏
हटाएंसुंदर | नववर्ष मंगलमय हो |
जवाब देंहटाएंजी, अत्यंत आभार आपका 🙏
हटाएंशुभकामना से सुसज्जित २०२६ !
जवाब देंहटाएंसुन्दर
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