भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक
परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक— व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव, दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर । क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान, राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

नव वर्ष मंगलमय हो🌹🙏🏻
जवाब देंहटाएंजी, अत्यंत आभार आपका 🙏
हटाएंनववर्ष मंगलमय हो
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार आपका ,🙏
हटाएंवाह्ह दी अति सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंसस्नेह प्रणाम।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
नववर्ष २०२६ मंगलमय हो।
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार प्रिय श्वेता ! रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
हटाएंयह कविता पढ़ते ही मन अपने आप हल्का और सकारात्मक हो जाता है। आप बीते पच्चीस को सहजता से विदा करते हैं और नए वर्ष छब्बीस का खुले दिल से स्वागत करते हैं। मुझे इसकी सबसे अच्छी बात यह लगी कि आप उम्मीद, शुभकामना और विश्वास को बहुत सरल शब्दों में रखते हैं। नए साल की शुबकामनाएं
जवाब देंहटाएंजी सादर आभार आपका🙏
हटाएंसुंदर | नववर्ष मंगलमय हो |
जवाब देंहटाएंजी, अत्यंत आभार आपका 🙏
हटाएंशुभकामना से सुसज्जित २०२६ !
जवाब देंहटाएंसुन्दर
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