परित्यक्ता नहीं..परित्यक्त | पति की बेवफाई और सास ससुर का साथ - हिन्दी कहानी

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परिचय क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिए सब कुछ सहती रहे क्योंकि उसके पास मायके से विदा लेने बाद जाने के लिए कोई और ठिकाना नहीं है ? क्या प्रेम विवाह करने वाली स्त्री अपने ही रिश्तों में सबसे अधिक अकेली हो जाती है ? यह कहानी है सना की जिसे पति की बेवफाई ने तोड़ने की कोशिश की लेकिन उसके सास ससुर ने उसे परित्यक्ता नहीं बल्कि सम्मानित बेटी बनाकर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम कर दी पढ़िए रिश्तों विश्वासघात और स्वाभिमान की हृदयस्पर्शी हिंदी कहानी दिल्ली की हल्की ठंडी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्रॉइंग रूम के फर्श पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, लेकिन सना के मन में जैसे धूप का एक कतरा भी नहीं बचा था। पिछले कुछ महीनों से वह प्रतीक के व्यवहार में बदलाव साफ महसूस कर रही थी। देर रात तक मोबाइल पर मुस्कुराकर बातें करना, उसके आते ही स्क्रीन लॉक कर देना, छोटी-छोटी बातों पर झल्ला उठना—सब कुछ बदलता जा रहा था। "प्रतीक! आज बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग है... तुम भी चलोगे?" सना ने धीमे स्वर में पूछा। प्रतीक ने मोबाइल से नजर उठाए बिना कहा— "मुझसे क्यों पूछ रही हो? अपने काम खुद नहीं कर ...

क्रिकेट जैसे खेल अमीरों के चोंचले | मजदूर दिवस पर एक कड़वी सच्चाई”

 परिचय:

हर साल मजदूर दिवस (1 मई) पर हम मजदूरों की मेहनत को सलाम करते हैं, लेकिन क्या हम सच में उनके बच्चों के सपनों को भी समझ पाते हैं?

यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है, जिसके हाथों में क्रिकेट बैट होना चाहिए था, लेकिन किस्मत ने उसे ईंटें पकड़ने पर मजबूर कर दिया।


“child labour story image showing boy catching bricks instead of playing cricke




कन्स्ट्रक्शन एरिया में अकरम को देख शर्मा जी ने आवाज लगाई , "अरे अकरम ! बेटा आज तुम ग्राउण्ड में नहीं गये ? वहाँ तुम्हारी टीम हार रही है"।

"नमस्ते अंकल ! नहीं, मैं नहीं गया" । अकरम ने अनमने से जबाब दिया ।

तभी बीड़ी सुलगाते हुये कमर में लाल साफा बाँधे एक मजदूर  के सामने आया --"जी सेठ जी ! क्या काम पड़े अकरम से ? मैं उसका अब्बू हूँ" ।

शर्मा जी मुस्कुराते हुए बोले --

"अरे नहीं भई, काम कुछ नहीं... मैं इसे क्रिकेट खेलते देखता हूँ । बहुत अच्छा खेलता है ये ! क्या कैच पकड़ता है... बहुत बढ़िया !  क्रिकेट में आगे बढ़ाओ इसे। खूब खेलने दो। नाम रोशन करेगा ये ! 

 बड़ा सा कश भर बीड़ी को पत्थर पे बुझा वापस माचिस की डिबिया में रख,  कमर का साफा खोलकर सिर में बाँधते हुए मजदूर मुस्कुराकर बोला, "हाँ सेठ जी ! कैच तो बढ़िया पकड़े ये ! तभी तो आज से काम पर ले आया इसे ।  वो देखो ! फसक्लास ईंटा कैच कर रिया" ।

शर्मा जी ने ऊपर देखा -

पहले माले में खड़ा अकरम बेसमेन्ट से फैंकी ईंटें बड़े अच्छे से कैच कर रहा था, बिल्कुल क्रिकेट बॉल की तरह ।

 शर्मा जी का दिल भर आया , 

 "इतने छोटे बच्चे को काम पर लगा दिया !  खेलने कूदने की उमर में काम ? अरे ! ऐसे काम से क्या फायदा ?  खेलने दो उसे ! वैसे भी अभी तो बच्चा है ये" ।

मजदूर ने भारी आवाज मे जबाब दिया -

"बच्चा ना है ये, पूरे चौदह बरस का हो रिया । और ये किरकेट फिरकेट तो अमीरों के चोंचले होवें ... भूखा पेट रोटी माँगे, जे नाम से नहीं , काम से मिले है सेठ जी" !  कहते हुए वह ईंटों का ढ़ेर उठाकर आगे बढ़ गया ।

शर्मा जी भी अब कुछ कह नहीं पाये, बस देखते रह गए - एक होनहार फील्डर को, जो अब ज़िंदगी के मैदान में ईंटें कैच कर रहा था।

संदेश :

यह कहानी सिर्फ अकरम की नहीं, बल्कि उन लाखों बच्चों की है—जो अपने सपनों को छोड़कर परिवार की जिम्मेदारियों में दब जाते हैं।मजदूर दिवस पर सिर्फ मजदूरों को सलाम ही नहीं,बल्कि सोचें कि ऐसे बच्चों के सपनों को भी उड़ान देने के लिए क्या हम कुछ कर सकते हैं ।




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टिप्पणियाँ

  1. वाह! समाज के सच को दर्शाती अत्यंत सार्थक लघुकथा!!! बधाई और आभार!!!

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    1. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.विश्वमोहन जी !

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  2. सुधा दी, आज अकरम जैसे कई बच्चे है जिनकी प्रतिभा पेट की आग के आगे दम तोड़ देती है। सुंदर लघुकथा।

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    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार ज्योति जी !

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  3. सच बात है , जिनको दो वक्त की रोटी नहीं मिलती उनके लिए तो खेल अमीरों के चोंचले ही लगेंगे । सार्थक लघु कथा ।

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    1. जी, हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।

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  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (२७-०५-२०२२ ) को
    'विश्वास,अविश्वास के रंगों से गुदे अनगिनत पत्र'(चर्चा अंक-४४४३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार प्रिय अनीता जी मेरी रचना को मच प्रदान करने हेतु ।

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २७ मई २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी मेरी रचना को चयन करने हेतु ।

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  6. मर्म स्पर्शी लघु कथा सुधा जी सच बात है प्रतीभा तो दिखते दिखते दिखती है या नाम कमाती है पर भूखा पेट रोज रोटी मांगता है।
    गरीबों की प्रतिभा यूं ही घुट कर रह जाती है।
    यथार्थ पर प्रहार करती शानदार लघुकथा।

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    1. हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार कुसुम जी !

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  7. भूखे पेट भजन नहीं होता । यथार्थ का सटीक चित्रण करती लघुकथा ।

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    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार जिज्ञासा जी!

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  8. नई सोच..
    लाजवाब..
    आभार..
    सादर..

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  9. उम्दा कथानक शिल्प और भाषायी सौंदर्य बहुत सुन्दर...
    चार चाँद लगाने में शीर्षक पर श्रम खोज रहा है

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    1. हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आ.विभा जी !

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  10. बहुत खूब..बखूबी यथार्थ का चित्रण।

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  11. ऐसी कई प्रतिभाएँ आर्थिक रूप से कमजोर होने के चलते अपना मुकाम हासिल नहीं कर पाती हैं। यथार्थ का चित्रण करती लघु-कथा।

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  12. गरीबी प्रतिभाओं को रोटी के जुगाड़ में नष्ट कर देती हैं । हृदयस्पर्शी सृजन सुधा जी !

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  13. सही बात, जिसे रोटी के ही लाले हों वह क्या करे? सभ्यता के विकास में पेट भर रोटी का सबसे बड़ा योगदान है।

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  14. बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रिय सुधा जी।
    जब सवाल पेट की भूख शान्त करने का हो तो कोई भविष्य की अपार संभावनाएं नहीं देखता।उसे चाहिये त्वरित उदरपूर्ति का साधन।इसी क्रम में अकरम जैसी अनगिन प्रतिभाएँ परिवार के पालन पोषण के लिए अपने सपनों का संसार छोड़ देती हैं।मार्मिक कहानी जो समाज की विद्रूपता पर कड़ा प्रहार करती है

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    उत्तर
    1. जी, रेणु जी ! हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।

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  15. सच बात है क्रिकेट से जरूरी है रोटी
    वास्तविक सच से परिचित कराती
    अच्छी लाघुकथा

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  16. बच्चा ना है ये, पूरे चौदह बरस का हो रिया । और ये किरकेट फिरकेट तो अमीरों के चोंचले होवें । भूखा पेट रोटी माँगे, जे नाम से नहीं , काम से मिले है सेठ जी" !

    सच, खाली पेट तो भजन भी नहीं होता फिर भविष्य संवारने के सपने कैसे आयेगा। मर्मस्पर्शी लघुकथा आदरणीय सुधा जी 🙏

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    उत्तर
    1. जी, सही कहा आपने...
      हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।

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  17. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ. आलोक जी!

    जवाब देंहटाएं
  18. हकीकत से दो-चार करती अद्भुत कहानी सुधा जी, आपने ज़मीन दिखा दी ये कह कर कि और ये किरकेट फिरकेट तो अमीरों के चोंचले होवें । भूखा पेट रोटी माँगे, जे नाम से नहीं , काम से मिले है सेठ जी" !..वाह

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