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बहुत समय से बोझिल मन को इस दीवाली खोला |दीपावली पर भावपूर्ण हिंदी गीत

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परिचय  दीपावली केवल घर को दीपों से सजाने का पर्व नहीं, बल्कि मन के भीतर जमा अंधकार और बोझ को दूर करने का अवसर भी है। “बहुत समय से बोझिल मन को इस दीवाली खोला”  गीत इसी आत्ममंथन की यात्रा है, जिसमें अपेक्षाओं और निराशाओं को छोड़कर आत्मबल, संतोष और सकारात्मक सोच अपनाने का संदेश दिया गया है। बहुत समय से बोझिल मन को  इस दीवाली खोला भारी भरकम भरा था उसमें  उम्मीदों का झोला कुछ अपने से कुछ अपनों से  उम्मीदें थी पाली कुछ थी अधूरी, कुछ अनदेखी  कुछ टूटी कुछ खाली बड़े जतन से एक एक को , मैंने आज टटोला बहुत समय से बोझिल मन को इस दीवाली खोला दीप जला करके आवाहन,  माँ लक्ष्मी से बोली मनबक्से में झाँकों तो माँ ! भरी दुखों की झोली क्या न किया सबके हित,  फिर भी क्या है मैने पाया क्यों जीवन में है मंडराता ,  ना-उम्मीदी का साया ? गुमसुम सी गम की गठरी में, हुआ अचानक रोला बहुत समय से बोझिल मन को इस दीवाली खोला प्रकट हुई माँ दिव्य रूप धर,  स्नेहवचन फिर बोली ये कैसा परहित बोलो,  जिसमें उम्मीदी घोली अनपेक्षित मन भाव लिए जो , भला सभी का करते सुख, समृद्धि, सौहा...

माटी मेरे गाँव की : भावुक गढ़वाली गीत | पहाड़ की यादें

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क्या आपको भी अपने गाँव की मिट्टी की खुशबू और बचपन की यादें बार-बार अपनी ओर खींचती हैं ? प्रस्तुत है एक भावपूर्ण गढ़वाली गीत “ माटी मेरे गाँव की” , जिसमें पहाड़ की बदलती तस्वीर, पुरानी यादें और गाँव का स्नेहिल अपनापन झलकता है। यह गीत उन प्रवासियों को रैबार (संदेश) देकर पुकारता है, जो रोज़गार या परिस्थितियों के कारण गाँव छोड़कर दूर बस गए और फिर लौट नहीं पाए। साथ ही, यह गाँव की उन बेटियों को भी स्नेह से याद करता है, जो ससुराल और शहर की व्यस्तताओं में अपने मायके—अपने गाँव—तक अब कम ही पहुँच पाती हैं। छ्वाया फूटे सौण - भादों , धार नदियों संग आई  माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी बोली मुझसे खुद लगीं बा  हो सके तो गाँव आ जा बीसीयों बीते मिले आ अब तो ये सूरत दिखा जा मटण्या पाणी, सौंधी खुशबू समलौण्या दुलार लायी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी वो पहाड़ी धार वाली बोली द्या अब ना गिरेगी बाट चौड़े पक्के वाले  माट में अब ना सनेगी गाड़ी मोटर पों-पों करती अब तो हर इक ख्वाल आयी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी म्याल ना लिपने पड़ेंगे चमचमाती फर्श बोली कूड़ी में लेंटर पड़...

सब क्या सोचेंगे , ये भी मैं ही सोचूँ ? | लघुकथा

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 परिचय परीक्षा का समय आते ही घरों में पढ़ाई, अंक और भविष्य को लेकर चर्चाएँ बढ़ जाती हैं। ऐसे में बच्चों पर केवल पढ़ाई का ही नहीं, बल्कि "लोग क्या कहेंगे" जैसी चिंताओं का भी दबाव पड़ने लगता है। प्रस्तुत लघुकथा एक मासूम बच्ची के सहज उत्तर के माध्यम से हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम अनजाने में बच्चों के कंधों पर आवश्यकता से अधिक बोझ तो नहीं डाल रहे।                      मोना!... ओ मोना!" आवाज़ देते हुए माँ उसके स्टडी रूम में पहुँची। कमरे का दृश्य देखकर उनका माथा ठनक गया। सामने खुली किताब रखी थी और उसके ऊपर पूरा डॉल हाउस सजा हुआ था। मोना अपनी गुड़िया को सजाने में इतनी तल्लीन थी कि उसे न माँ की आवाज़ सुनाई दी, न उनके आने की आहट। कल उसकी परीक्षा थी और आज भी वह खेल में मग्न थी। गुस्से में माँ ने उसकी बाँह पकड़कर हल्का-सा झिंझोड़ा। मोना एकदम चौंक गई। सामने माँ को देखकर उसने आँखें बंद कर गहरी साँस ली और बोली— "ओह! मम्मी, आप हो! मुझे लगा पापा आ गए।"  "अच्छा"अच्छा! पापा का डर और मम्मी की कोई परवाह नहीं?" माँ की आवाज़ गुस्से...

ज्ञान के भण्डार गुरुवर

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 ख्याति लब्ध पत्रिका 'अनुभूति' के 'अपनी पाठशाला' विशेषांक में मेरी रचना 'ज्ञान के भण्डार गुरुवर ' प्रकाशित करने हेतु आ.पूर्णिमा वर्मन दीदी का हार्दिक आभार । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । डगमगाती नाव जीवन,  खे रहे गुरु के सहारे । गुरु की पारस दृष्टि से ही ,  मन ये कुंदन सा निखरता । कोरा कागज सा ये जीवन,  गुरु की गुरुता से महकता । देवसम गुरुदेव को हम,  दण्डवत कर, पग-पखारें  । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । गुरु कृपा से ही तो हमने , नव ग्रहों का सार जाना । भू के अंतस को भी समझा,  व्योम का विस्तार जाना । अनगिनत महिमा गुरु की,  पा कृपा, जीवन सँवारें । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । तन में मन और मन से तन,  के गूढ़ को बस गुरु ही जाने । बुद्धि के बल मन को साधें,  चित्त चेतन के सयाने । अथक श्रम से रोपते , अध्यात्म शिष्योद्यान सारे। ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । पढ़िए पत्रिका 'अनुभूति' में प्रकाशित मेरी एक और रचना ●  बने पकौड़े गरम-गरम

जीवन की राहों में आखिर असली प्रतिस्पर्धा किससे है ? | प्रेरणादायक लेख

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जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धा किससे है? बचपन से परीक्षाओं में अव्वल रहने वाले लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि वे जीवन की हर प्रतिस्पर्धा में सफल होंगे। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धी कौन? बचपन से परीक्षाओं में उत्तीर्ण और कक्षा में उत्तीर्ण रहने वाले लोगों को अपनी बुद्धिमानी पर कभी कोई संदेह नहीं रहता । उन्हें विश्वास हो जाता है कि जीवन की हर परीक्षा भी वे अपनी बुद्धि के बल पास कर ही लेंगे ।  लेकिन अक्सर वे नहीं जानते कि जीवन की  परीक्षाएं कुछ अलग होती हैं — यहाँ प्रतिस्पर्धी अपने ही होते हैं। अपनों से प्रतिस्पर्धा का सच  यह सच सामने आता भी है, तो वे सोचते हैं — "अपनों से प्रतिस्पर्धा में भला क्या डर!" हार भी अपनी और जीत भी अपनी । आगे बढ़ने की कीमत: अकेलापन इसीअपनत्व और स्नेह के भाव के साथ वे आगे बढ़ते हैं। लेकिन जैसे ही वे दूसरों से दो कदम आगे निकलते हैं, वे खुद को अकेला पाते हैं। क्यों खींचते हैं लोग पीछे? क्योंकि अपनों के साथ होने वाली ऐसी प्रतिस्पर्धाएं अक्सर आगे बढ़ने की होती ही नहीं, ये प्रतिस्पर्धाएं तो किसी को आगे बढ़ने से...

पावस के कजरारे बादल | वर्षा ऋतु पर हिंदी कविता

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परिचय प्रकृति का प्रत्येक रूप मेरे मन को गहराई से स्पर्श करता है, परंतु वर्षा ऋतु का आगमन एक अलग ही अनुभूति जगाता है। कजरारे बादलों का उमड़ना-घुमड़ना, तपती धरती पर अमृत-सी वर्षा बरसाना और कभी अपने असंतुलित रूप से बाढ़ तथा सूखे जैसी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देना—इन सभी भावों ने इस कविता को जन्म दिया। "पावस के कजरारे बादल" केवल वर्षा का चित्रण नहीं, बल्कि बादलों से की गई एक विनम्र प्रार्थना है कि वे समभाव से बरसें, जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहे और प्रत्येक जीव के जीवन में हरियाली, आनंद और नवजीवन का संचार हो।        पावस के कजरारे बादल, जमकर बरसे कारे बादल , उमस धरा की मिटा न पाए, बरस बरस कर हारे बादल । घिरी घटा गहराये बादल, भर भर के जल लाये बादल, तीव्र ताप से तपी धरा पर, मधुर सुधा बरसाये बादल । सूरज से घबराए बादल, चढ़ी धूप छितराए बादल, उमड़-घुमड़ पहुँचे गिरि-कानन, घन घट फट पछताए बादल । भली नहीं अतिवृष्टि बादल, करे याचना सृष्टि बादल, कहीं बाढ़ कहीं सूखा क्यों ? समता की रख दृष्टि बादल ! छोड़ भी दो मनमानी बादल, बहुत हुई नादानी बादल, बरसो ऐसा कि सब बोलें, पावस भली सुहान...

हरते सबके कष्ट सदाशिव भोले शंकर

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                         【1】 शंकर भोलेनाथ शिव , नंदीश्वर, भगवान । बाघम्बर भैरव शिवा, शम्भू कृपा निधान । शम्भू कृपा निधान, उमापति बम बम भोले । अवढर दानी नाथ, सभी की किस्मत खोले । जपते नमः शिवाय, भक्त सावन में घर घर  । हरते सबके कष्ट, सदाशिव भोले शंकर  ।।                            【2】 शिवशंकर कैलाशपति , महिमा अपरम्पार । शशिशेखर विरुपाक्ष शिव,जग के पालनहार । जग के पालनहार,  दीन के हैं रखवारे । बम बम भोले घोष, भक्त करते जयकारे । भजे सुधा कर जोरि, नमामि जै गिरिजेश्वर । करो सृष्टि उद्धार, कृपानिधि जै शिवशंकर ।। पढ़िए सावन और शिव भक्ति पर आधारित अन्य कुण्डलिया छंद निम्न लिंक पर । ●  मन में भरे उमंग, मनोहर पावन सावन

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