संदेश

नभ तेरे हिय की जाने कौन

चित्र
  नभ ! तेरे हिय की जाने कौन ? ये अकुलाहट पहचाने कौन ? नभ ! तेरे हिय की जाने कौन ? उमड़ घुमड़ करते ये मेघा बूँद बन जब न बरखते हैं स्याह वरण हो जाता तू  जब तक ये भाव नहीं झरते हैं भाव बदली की उमड़-घुमड़ मन का उद्वेलन जाने कौन ? ये अकुलाहट पहचाने कौन ? तृषित धरा तुझे जब ताके कातर खग मृग तृण वन झांके आधिक्य भाव उद्वेलित मन... रवि भी रूठा, बढती है तपन घन-गर्जन तेरा मन मंथन वृष्टि दृगजल हैं,  माने कौन ये अकुलाहट पहचाने कौन ? कहने को दूर धरा से तू पर नाता रोज निभाता है सूरज चंदा तारे लाकर चुनरी धानी तू सजाता है धरा तेरी है धरा का तू ये अर्चित बंधन माने कौन ये अकुलाहट पहचाने कौन ? ऊष्मित धरणी श्वेदित कण-कण आलोड़ित नभ हर्षित तृण-तृण अरुणिम क्षितिज ज्यों आकुंठन ये अमर आत्मिक अनुबंधन सम्बंध अलौकिक माने कौन ये अकुलाहट पहचाने कौन ? नभ तेरे हिय की जाने कौन...?

नोबची

चित्र
"ये क्या है मम्मा ! आजकल आप हमसे भी ज्यादा समय अपने पौधों को देते हो"...? शिकायती लहजे में पलक और पल्लवी ने माँ से सवाल किया। "हाँ बेटा !  ये पौधे हैं ही इतने प्यारे...अगर तुम भी इन पर जरा सा ध्यान दोगे न , तो मोबाइल टीवी छोड़कर मेरी तरह इन्हीं के साथ समय बिताना पसन्द करोगे,  आओ मैं तुम्हें इनसे मिलवाती हूँ"....माँ उनका ध्यान खींचते हुए बोली। दोनों  पास आये तो माँ ने उन्हें गमले में उगे पौधे की तरफ इशारा करते हुए कहा  "देखो !  ये है नोबची" नोबची ! ये कैसा नाम है ?...दोनों ने आँख मुँह सिकोड़ते हुए एक साथ पूछा। "हाँ ! नोबची,  और जानते हो इसे नोबची क्यों कहते है" ? "क्यों कहते हैं" ?   उन्होंने पूछा तो माँ बोली, "बेटा ! क्योंकि ठीक नौ बजे सुबह ये पौधा अपने फूल खिलाता है"। हैं !!.नौ बजे !!...हमें भी देखना है।  (दोनों बड़े आश्चर्यचकित एवं उत्साहित थे) और अगली सुबह समय से पहले ही दोनों बच्चे नोबची पर नजर गड़ाए खड़े हो गये। बस नौ बजने ही वाले है दीदी !  हाँ  पलक ! और देख  नोबची भी खिलने लगा है !!!... नोबची की खिलखिलाहट के साथ अपनी बेटियों...

पावन दाम्पत्य निभाने दो

चित्र
  अब नहीं प्रेम तो जाने दो जैसा जी चाहे जी लो तुम कर्तव्य मुझे तो निभाने दो अब नहीं प्रेम तो जाने दो हमराही बन के जीवन में चलना था साथ यहाँ मिलके काँटों में खिले कुछ पुष्पों को चुनना था साथ यहाँ मिलके राहों में बिखरे काँटों को साथी मुझको तो उठाने दो... अब नहीं प्रेम तो जाने दो... ये फूल जो अपनी बगिया में  प्रभु के आशीष से पाये हैं नन्हें प्यारे मासूम बहुत दोनों के मन को भाये हैं दोनों की जरुरत है इनको इनका दायित्व निभाने दो अब नहीं प्रेम तो जाने दो.... चंद दिनों के साथ में साथी कुछ पल तो खुशी के बिताये हैं आज की मेरी इन कमियों में वो दिन भी तुमने भुलायें हैं यादों को सहेज लूँ निज दिल में अनबन के पल बिसराने दों अब नहीं प्रेम तो जाने दो.... छोटी - छोटी उलझन में यूँ परिवार छोड़ना उचित नहीं अनबन को सर माथे रखकर घर-बार तोड़ना उचित नहीं इक - दूजे के पूरक बनकर पावन दाम्पत्य निभाने दो अब नहीं प्रेम तो जाने दो...... चित्र साभार, गूगल से....

मोहजाल

चित्र
छो टा ही था प्रमोद जब उसके पिता  देहांत हुआ  बस माँ तक सिमटकर रह गयी थी उसकी दुनिया। माँ ने ही उसे पढ़ा- लिखा कर काबिल इंसान बनाया ।    बहुत प्यार और सम्मान था उसकी नजरों में माँ के लिए। माँ की उफ तक सुनकर उसकी तो जैसे रुह ही काँप जाती । बस माँ के इर्द गिर्द ही घूमता रहता । खूब ख्याल रखता माँ का। आखिर माँ के सिवाय उसका था भी कौन। माँ भी बहुत खुश रहती थी उससे।  अपने बेटे की काबिलियत और सेवाभाव का बखान करते करते मन नहीं भरता था उसका । जिससे भी कहती साथ में उसके रिश्ते की भी बात करती ।  बस अब घर बस जाय मेरे प्रमोद का ।  सुन्दर सी लड़की मिले तो हाथ पीले कर अपना फर्ज निभा गंगा नहा आऊँ ।  और सुन ली भगवान ने उसकी । देखते ही देखते रिश्ता पक्का हुआ और फिर चट मँगनी पट ब्याह । प्रमोद अब अपनी दुनिया में व्यस्त हो गया। मोह का जंजाल भी कैसा रचा है न ऊपर वाले ने। जीते जी कहाँ खतम होता है।  पहले बेटे के ब्याह का फिर पोते-पोती का मोह , और फिर उन्हें बड़ा होते हुए देखने का ।  माँ - बेटे की छोटी सी दुनिया अब कुछ पसरने लगी । और साथ ही बदलने लगे प्रेम के एहसास ...

घिंडुड़ी (गौरैया)

चित्र
                       चित्र साभार, pixabay.com से.... गढ़वाली भाषा में लिखी मेरी 'पहली कविता' एवं उसका हिन्दी रूपांतरण भी....। हे घिंडुड़ी! दिखे ने तू! बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !! छज्जा अडग्यूँ घोल पुराणु कन ह्वे तेकुण सब विराणु एजा घिंडुड़ी ! सतै ना तू बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !! झंग्वर सरणा चौक मा दद्दी चूँ-चूँ करीकि वखी ए जदी खतीं झंगरयाल बुखै जै तू बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !! त्वे बिना सुन्न हुँईं तिबारी रीति छन कन  गौं-गुठ्यारी छज्जा निसु घोल बणै जै तू बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !! बिसकुण सुप्पु उंद सुखणा खैजा कुछ बिखरैजा तू ! बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !! हे घिडुड़ी दिखे ने तू ! कख गेई बतै दे तू !! तपती माटी सह नि पायी टावरुन दिशा भटकायी नयार सुखेन त रै ने तू लुकीं छे कख बतै दे तू !! आ घिंडुड़ी! चौक म नाज-पाणि रख्यूँ च हुणतालि डाल्यूँ क छैल कर्यूं च निभा दगड़,  रुलै न तू न जा कखि ,  घर एजा तू एजा घिंडुड़ी ! एजा तू प्यारी घिंडुड़ी!  एजा तू !! प्रस्तुत कविता जाने - माने वरिष्ठ  ब्लॉगर एवं लेखक आदरणीय विकास नैनवाल 'अंजान' जी ...

बिना आपके भला जिंदगी कहाँ सँवरती

चित्र
पिता दिवस पर आज आपकी यादें लेकर, हुई लेखनी मौन बस आँखें हैं बरसती । वो बीता बचपन दूर कहीं यादों में झिलमिल झलक आपकी बस माँ की आँखों में मिलती। वीरानी राहों में तन्हा सफर हमारा, हर बढें कदम पर ज्यों शाबाशी आप से मिलती । मन का हौसला बन के हमेशा साथ हो पापा ! बिना आपके भला जिन्दगी कहाँ सँवरती । ना होकर भी सदा अवलम्बन रहे हमारे, पिता से बढ़कर कौन प्रभु की पूजा बनती । हर पल अपने होने का एहसास कराया, मन आल्हादित पर दर्शन को आँख तरसती । हर इक जन्म में पिता आप ही रहें हमारे, काश प्रभु से जीते जी यह आशीष मिलती ।।         चित्र , साभार photopin.com  से...

बदलती सोच 【2】

चित्र
आज शीला कुछ और सहेलियों के साथ विमला के घर बिन बताए पहुँची उसे सरप्राइज देने... लेकिन दरवाजे पर उसके पति नीलेश को देख  सभी के मुँह लटक गये...। ओह! नीलेश जी आप! ?...सबके मुँह से एक साथ निकला.... जी ! क्यों... मेरा मतलब ,..नमस्ते... आ..आइए...! आइए न..! आ..आप बाहर क्यों हैं ...नीलेश ने हकलाते हुए कहा। वो... सॉरी नीलेश जी ! हमें लगा कि आप भी अब ऑफिस जाने लगे होंगे...। लॉकडाउन तो अब खत्म हो गया न...।   तो हम विमला से मिलने आ गये बिन बताए......सोचा सरप्राइज देंगे उसे.......पर कोई नहीं हम अभी चलते हैं फिर कभी आयेंगें... माफ करना आपको डिस्टर्ब किया" हिचकिचाते हुए शीला बोली। अरे नहीं ! डिस्टर्ब कैसा !!  डिस्टर्ब जैसी कोई बात ही नहीं !..आप सभी ने बहुत अच्छा किया ..आइए न..... दीजिए उसे सरप्राइज!!..वो पीछे गेस्ट रूम की सफाई कर रही है......। आप सभी को देखकर सचमुच बहुत खुश एवं आश्चर्यचकित हो जायेगी। वैसे भी कब से बोर हो रहे हैं सब घरों में कैद होकर...। (नीलेश उन सब को गेस्ट रूम तक छोड़ आये) अचानक सभी सहेलियों के देखकर विमला सचमुच चौंक गयी,बड़ी खुशी-खुशी हालचाल पूछते हुए सबको बिठाया....

फ़ॉलोअर

लेबल

कविता -हास्यव्यंग1 कहानी19 कह़ानी1 कहानीकविता1 कांवड़1 काव्य रचना1 कुण्डलिया छंद5 कुण्डलिया छन्द3 गजल10 गढ़वाली कविता एवं उसका हिन्दी रूपांतरण1 गढ़वाली गीत1 गर्मी पर कविता1 गर्मी पर बाल कविता1 गीत17 गीतात्मक कविता1 गुरु महिमा कविता2 गुरु महिमा पर दोहा मुक्तक1 घरेलू हिंसा1 चिड़िया1 चौपाई | पावस पर कविता | बरसात पर कविता | सावन | शिव भक्ति1 छंद कविता1 जल संरक्षण पर कविता1 जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग1 जीवन दर्शन2 दोहा मुक्तक3 दोहा-मुक्तक1 दोहे7 नवगीत15 नारी सम्मान1 नारी सशक्तिकरण1 पकौड़े1 परिवार1 पाँच लिंकों का आनंद स्थापना दिवस1 पारिवारिक कहानी2 पारिवारिक रिश्ते1 पावस पर कविता1 पुस्तक समीक्षा1 प्रकृति3 प्रकृति कविता3 प्रार्थना4 प्रेणादायक आलेख1 प्रेम कविता1 प्रेरक लघुकथा1 प्रेरणादायक कहानी1 प्रेरणादायक हिंदी कविता2 बरसात पर कविता2 बारिश पर गीत1 बाल कविता3 बुज़ुर्ग1 भक्ति कविता4 भगवान शिव2 भावनात्मक1 भावनात्मक रचना1 मन1 मनहरण घनाक्षरी2 मनहरण घनाक्षरी छंद5 महादेव1 महिला सशक्तिकरण1 महिला सशक्तिकरण पर प्रेरणादायक कहानी।1 माँ का त्याग1 माँ की ममता1 माता पिता1 माता-पिता1 मुक्तक3 मुहावरे पर आधारित लघुकथा1 मोबाइल की लत तकनीक डिजिटल जीवन1 रक्षाबंधन1 राम भक्ति3 रिश्ते2 रोला छंद2 लघु कथा2 लघु कहानी6 लघुकथा19 लेख3 वर्षा ऋतु2 वसंत पर कविता1 व्यंग कविता1 व्यंग लेख1 शरद ऋतु2 शराब की लत1 शिक्षक दिवस1 शिक्षा -परीक्षा1 शिक्षा-परीक्षा1 शिव भक्ति2 शिव महिमा1 शुभकामना कविता1 श्रीराम2 संघर्ष1 संवेदनाएँ1 संस्मरण2 संस्मरणात्मक लेख1 सकारात्मक सोच2 सच्ची घटना1 सद्गुरु1 समय1 समीक्षा2 सामाजिक कहानी1 सामाजिक लेख1 सावन1 साहित्य1 हाइबन1 हायकु3 हास्यव्यंग कविता1 हास्यव्यंग लघुकथाएं1 हिंदी कविता6 हिंदी कहानी1 हिंदी भावनात्मक कहानी1 हिंदी लघुकथा प्रेरक लघुकथा रिश्ते मनमुटाव संवाद जीवन दर्शन1 हिंदी लघुकथा माँ का त्याग प्रेरक लघुकथा प्रेरणादायक कहानी1 हिंदी लेख1 हिंदी साहित्य1 हिन्दी कविता1
ज़्यादा दिखाएं