बुधवार, 23 जून 2021

घिंडुड़ी (गौरैया)

       

Sparrow

               चित्र साभार, pixabay.com से....


गढ़वाली भाषा में लिखी मेरी 'पहली कविता' एवं उसका हिन्दी रूपांतरण भी....।


हे घिंडुड़ी! दिखे ने तू!

बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !!


छज्जा अडग्यूँ घोल पुराणु

कन ह्वे तेकुण सब विराणु

एजा घिंडुड़ी ! सतै ना तू

बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !!


झंग्वर सरणा चौक मा दद्दी

चूँ-चूँ करीकि वखी ए जदी

खतीं झंगरयाल बुखै जै तू

बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !!


त्वे बिना सुन्न हुँईं तिबारी

रीति छन कन  गौं-गुठ्यारी

छज्जा निसु घोल बणै जै तू

बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !!


बिसकुण सुप्पु उंद सुखणा

खैजा कुछ बिखरैजा तू !

बोल घिंडुड़ी कनै गे तू !!


हे घिडुड़ी दिखे ने तू !

कख गेई बतै दे तू !!


तपती माटी सह नि पायी

टावरुन दिशा भटकायी

नयार सुखेन त रै ने तू

लुकीं छे कख बतै दे तू !!


आ घिंडुड़ी!

चौक म नाज-पाणि रख्यूँ च

हुणतालि डाल्यूँ क छैल कर्यूं च

निभा दगड़,  रुलै न तू

न जा कखि ,  घर एजा तू


एजा घिंडुड़ी ! एजा तू

प्यारी घिंडुड़ी!  एजा तू !!


प्रस्तुत कविता जाने - माने वरिष्ठ  ब्लॉगर एवं लेखक आदरणीय विकास नैनवाल 'अंजान' जी द्वारा संपादित ई पत्रिका 'लिख्वार' में प्रकाशित की गई है ।  इसके लिए मैं उनका हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ ।   

ई पत्रिका लिख्वार में कविता का लिंक निम्न है....

https://likhwar.blogspot.com/2021/06/ghindudi-garhwali-poem-by-sudha-devrani.html


कविता का हिन्दी रूपांतरण----

            

            गौरैया(घिंडुड़ी)

हे गौरैया ! दिखाई नहीं देती तू !

    बोल गौरैया !कहाँ गयी तू !!


छज्जे में फँसे हैं तेरे घोंसले पुराने

कैसे हो गये हम सब तेरे लिए विराने   

आजा गौरैया! सता न तू!

बोल गौरैया ! कहाँ गयी तू !!


झंगोरा बीनती आँगन में दादी

चूँ-चूँ करके वहीं आ जाती

गिरे झंगरयाल खा जा तू !

बोल गौरैया !कहाँ गयी तू !!


तेरे बिना सूनी है तिबारी

खाली लगती हैं गौं-गुठ्यारी 

छज्जे के नीचे घोंसला बना दे तू!

बोल गौरैया !कहाँ गयी तू !!

 

सूप में सुखाने रखे अनाज को 

कुछ खा जा कुछ बिखरा जा तू !

कहाँ छुप गयी बता दे तू !!


धरती का तापमान सह न पायी

मोबाइल टावरों ने दिशा भटकायी

नदियाँ सूखी , न रह गयी तू !

कहाँ चली गयी बता दे तू !!


आ गोरैया !

आँगन में दाना-पानी रखा है

सुन्दर डालियों की छाया की है

साथ निभा ले , रुला मत तू !

 मत जा कहीं , घर आ जा  तू !

आ जा गौरैया! आ जा तू !!


आ जा गौरैया ! आ जा तू !

प्यारी गौरैया! आजा तू !


विरण (विराने)= पराये

झंगोरा = बारीक धान

सारती = बीनती (भूसा अलग करना)

झंगरयाल =भूसा अलग किया हुआ बारीक धान

गौं-गुठ्यार= गाँव की गौशाला (जहाँ गोरैया गोबर से कीड़े चुगती है)


36 टिप्‍पणियां:

MANOJ KAYAL ने कहा…

सुन्दर सृजन

Kamini Sinha ने कहा…

साथ निभा ले , रुला मत तू !

मत जा कहीं , घर आ जा तू !

आ जा गौरैया! आ जा तू !!

वाह !! हाँ,गौरैया! अब आ जा तू....नहीं करेंगे अब हम मनमानी बस आजा तू। मनमोहित करने वाली...बहुत ही सुंदर सृजन सुधा जी,सादर नमन आपको

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक आभार एवं धन्यवाद मनोज जी!

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी!

विश्वमोहन ने कहा…

वाह! दिन पर दिन सभ्यता की बयार में लुप्त होती जा रही गौरैया पर मोहक रचना। गौरैया संरक्षण की दिशा में महती प्रयास की आवश्यकता है। इतनी सुंदर रचना की बधाई!!!

नूपुरं noopuram ने कहा…

बहुत प्यारी कविता । गौरैया जितनी । विडम्बना यह है कि कोरोना की रोक-टोक के कारण गौरैया भी और दूसरे कुछ पंछी भी घरों के आसपास दिखाई देने लगे हैं ।

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ जून २०२१ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक आभार एवं धन्यवाद आ.विश्वमोहन जी!अनमोल प्रतिक्रिया हेतु।

Sudha Devrani ने कहा…

जी,सही कहा आपने लॉकडाउन में कुछ पक्षी दिखे तो हैं ।
तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका प्रोत्साहन हेतु।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद श्वेता जी मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु।
सादर आभार।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह ..... बहुत सुंदर । गौरैया आज कल बहुत कम देखने को मिलती हैं ।
पत्रिका में छपने के लिए हार्दिक बधाई ।

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना

Subodh Sinha ने कहा…

"तेरे बिना सूनी है तिबारी
खाली लगती हैं गौं-गुठ्यारी
छज्जे के नीचे घोंसला बना दे तू!
बोल गौरैया !कहाँ गयी तू !!" - विश्व के सबसे विभत्स और बुद्धिजीवी प्राणी ने,अन्य सभी प्राणियों का जीवन सबसे ज्यादा दूभर किया है .. और तो और .. विकास के नाम पर पूरे ब्रह्मांड के नक़्शे को बदल दिया है .. यथोचित हस्तक्षेप करने कब आएंगे अवतार ?...
"सोचों की रोशनदानविहीन वातानुकूलित कमरों में मानो ऐ साहिब!
अपनापन की गौरैयों का पहले जैसा रहा आवागमन भी अब कहाँ ?"

Harash Mahajan ने कहा…

वाह गोरैया पर आपने इतना सुंदर सृजन ।
लुप्त होती इस मसूमनपर पढ़ने पर बहुत अच्छा महसूस होता है ।
सादर

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.संगीता जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.आलोक जी!

Sudha Devrani ने कहा…

जी सही कहा आपने वातानुकूलित कमरों और ऊँची अट्टालिकाओ़ं ने गौरैयों की तो जगह छीन ली।
तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.हर्ष जी!
ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ...
गड्वाली और फिर हिन्दी रूपांतरित रचना ... एक अलग भाव लिए बेहतरीन रचना ...

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद नासवा जी!
सादर आभार।

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

सुन्दर..लिख्वार में रचना भेजने हेतु हार्दिक आभार, मैम....

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२६-0६-२०२१) को 'आख़री पहर की बरसात'(चर्चा अंक- ४१०७) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

मन की वीणा ने कहा…

ओ! सुधा जी!! आपकी रचना में आर्तनाद छिपा है, जो छू रहा है हर रोम को अंतर को,
बहुत बहुत सुंदर संदेश दे रही है आपकी कविता, और पर्यावरण की भेंट चढ़ते ये प्राणी ,और क्या क्या ??
अप्रतिम अनुपम।
बहुत बहुत बधाई आपको लिख्वार में रचना के प्रकाशन के लिए।
सस्नेह।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद नैनवाल जी मुझे ये अवसर देने हेतु।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक आभार एवं धन्यवाद प्रिय अनीता जी! मेरी रचना को चर्चा मंच पर साझा करने हेतु।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद कुसुम जी सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया द्वारा उत्साहवर्धनकरने हेतु ।
सादर आभार आपका।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

सुधा दी,पर्यावरण संरक्षण और गौरैया पर बहुत ही सुंदर रचना। ई पत्रिका के कविता प्रकाशित होने पर बहुत बहुत बधाई।

शैलेन्द्र थपलियाल ने कहा…

खरड़ी डाँडी पुंगड़ी लाल,
यो छ् हमरो उज्युडु गढ़वाल।
मूसा कुदिणी छिन मुडली माँ।
बांदर नचिणी छिन तिबरी माँ।
पलायन की चौतरफा यन मार प्वाड़ी,
मनकी त मनकी,घिंड़ुड़ी भि फुर्र ह्वे ग्यायी।
बहुत सुंदर रचना।

Sudha Devrani ने कहा…

सहृदय धन्यवाद एवं आभार ज्योति जी!

Sudha Devrani ने कहा…

सही बात च पलायन भी याँकुण जिम्मेदार च...लोग-बाग घर-कूड़ि छोड़िक शहर ए गेन, क्या खाण विचारि घिंडुड़्यून।
सस्नेह आभार।

Jigyasa Singh ने कहा…

सुधाजी, आपकी यह रचना बहुत ही शानदार है,गौरैया जैसी चिड़ियां,जो हमारे जीवन का अभिन्न अंग है,आज विलुप्ति के कगार पर है, उसके संरक्षण की दिशा में आपकी कविता भी बहुत महत्वपूर्ण है, गौरैया पर सुंदर रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।

Sudha Devrani ने कहा…

सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया द्वारा उत्साहवर्धन हेतु तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार जिज्ञासा जी !

Meena Bhardwaj ने कहा…

अत्यंत सुन्दर रचना सुधा जी बिलकुल गौरेया जैसी । गढ़वाल की स्थानीय बोली पढ़ कर भी आनंद आया । बहुत सुन्दर सृजन यूं ही लिखती रहें । 'ई पत्रिका' में आपकी रचना प्रकाशन के लिए आपको बहुत बहुत बधाई ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी लिखी कोई रचना सोमवार 28 जून 2021 को साझा की गई है ,
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

संगीता स्वरूप

Sudha Devrani ने कहा…

सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया द्वारा उत्साहवर्धन करने हेतु हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार मीना जी!

Sudha Devrani ने कहा…

पांच लिंकों के आनंद पर मेरी कोई रचना प्रकाशित करने हेतु तहेदिल से आभार एवं धन्यवाद आ.संगीता जी!

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