मंगलवार, 13 जुलाई 2021

पावन दाम्पत्य निभाने दो

 

Breakup



अब नहीं प्रेम तो जाने दो

जैसा जी चाहे जी लो तुम

कर्तव्य मुझे तो निभाने दो

अब नहीं प्रेम तो जाने दो


हमराही बन के जीवन में

चलना था साथ यहाँ मिलके

काँटों में खिले कुछ पुष्पों को

चुनना था साथ यहाँ मिलके

राहों में बिखरे काँटों को

साथी मुझको तो उठाने दो...

अब नहीं प्रेम तो जाने दो...


ये फूल जो अपनी बगिया में 

प्रभु के आशीष से पाये हैं

नन्हें प्यारे मासूम बहुत

दोनों के मन को भाये हैं

दोनों की जरुरत है इनको

इनका दायित्व निभाने दो

अब नहीं प्रेम तो जाने दो....


चंद दिनों के साथ में साथी

कुछ पल तो खुशी के बिताये हैं

आज की मेरी इन कमियों में

वो दिन भी तुमने भुलायें हैं

यादों को सहेज लूँ निज दिल में

अनबन के पल बिसराने दों

अब नहीं प्रेम तो जाने दो....


छोटी - छोटी उलझन में यूँ

परिवार छोड़ना उचित नहीं

अनबन को सर माथे रखकर

घर-बार तोड़ना उचित नहीं

इक - दूजे के पूरक बनकर

पावन दाम्पत्य निभाने दो

अब नहीं प्रेम तो जाने दो......


चित्र साभार, गूगल से....



27 टिप्‍पणियां:

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना |शत शत शुभ कामनाएं , आशीष |

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.आलोक जी!

Jigyasa Singh ने कहा…


छोटी - छोटी उलझन में यूँ

परिवार छोड़ना उचित नहीं

अनबन को सर माथे रखकर

घर-बार तोड़ना उचित नहीं

इक - दूजे के पूरक बनकर

पावन दाम्पत्य निभाने दो

अब नहीं प्रेम तो जाने दो...बहुत सुंदर भाव,सच ही तो कहा आपने छोटी छोटी घटनाएं तो जीवन में होती रहती है, इन्हें नजरंदाज करके ही जीवन संतुलित होता है,वर्ण तो हर घर विज्ञान का शिकार हो जाय।सुंदर रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

बहुत अच्छी कविता रची है सुधा जी आपने। वस्तुतः विवाह-संस्था प्रेम से कहीं अधिक पारस्परिक समायोजन तथा एक-दूसरे के पूरक होने के भाव पर ही आधारित है। प्रेम हो-न-हो, रहे-न-रहे; उत्तरदायित्वों के निमित्त संबंध का निर्वाह करना महत्वपूर्ण है, आवश्यक है विशेषतः तब जब संतानें हों जिनका जीवन संवारने का महती दायित्व कांधों पर हो। और प्रेम न रहने पर भी वार्धक्य में एकदूजे की आवश्यकताओं एवं भावनाओं को यथासंभव अनुभूत करते हुए विवेकशील सहयात्रियों की भांति शेष जीवन व्यतीत करना ही श्लाघनीय है। आपकी लेखनी को नमन।

Sudha Devrani ने कहा…

हदयतल से धन्यवाद जितेन्द्र जी रचना के मर्म एवं भाव को स्पष्ट कर मेरे विचारों से सहमत होने हेतु...। आजकल छोटे-छोटे मतभेद भी घर टूटने का कारण बन रहे हैं...असहिष्णुता इतनी बढ़ गयी है कि अपनी संतानों के बारे में भी सोचना भी गवारा नहीं किसी को, अपनी ही मैं में अपने दायित्व एवं कर्तव्य भी भूल चुके हैं
सारगर्भित प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करने हेतु अत्यंत आभार आपका।

Sudha Devrani ने कहा…

सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया द्वारा उत्साहवर्धन करने हेतु अत्यंत आभार एवं धन्यवाद जिज्ञासा जी!

Jyoti Dehliwal ने कहा…

छोटी - छोटी उलझन में यूँ

परिवार छोड़ना उचित नहीं

अनबन को सर माथे रखकर

घर-बार तोड़ना उचित नहीं

इक - दूजे के पूरक बनकर

पावन दाम्पत्य निभाने दो..
बिल्कुल सही कहा सुधा दी कि छोटी छोटी बातों के लिए घर संसार तोड़ा नही जाता। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

गोपेश मोहन जैसवाल ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण गीत !
एक सवाल - बिखरते रिश्ते को समेटने की और टूटते परिवार को जोड़ने की, इस तरह की कोशिश और इस तरह के समझौते, अधिकतर पत्नी ही क्यों करती है?

Sudha Devrani ने कहा…

नहीं सर ! समय बदल गया है आजकल समझौते पत्नियाँ नहीं कर रही हैं बच्चों का अधिकार और पति से हर्जाना लेकर आजाद जिंदगी जी रही हैं पत्नियाँ.....।किसी भी तरह के मनमुटाव को दहेज माँगना या शारिरिक मानसिक प्रताड़ना का नाम देकर पति को कहीं का नहीं छोड़ रही हैं...महिला अधिकारों का दुरुपयोग कह सकते हैं इसे हम...।
सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया एवं रचना पर विमर्श हेतु हृदयतल से धन्यवाद आपका।
सादर आभार।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

दाम्पत्य जीवन को संभालते संभालते समझौतों की ज़िंदगी जीने लगते हैं ।
प्रेम नहीं तो जाने दो .... ये स्थिति कठिन तो होती होगी न ?
सोचने पर मजबूर करती सुंदर रचना ।

विश्वमोहन ने कहा…

अब कर्तव्य बोध मिश्रित इतने मधुर मनुहार से बढ़कर और प्रेम क्या होगा! बहुत प्यारी रचना।

Anuradha chauhan ने कहा…

बहुत सुंदर और सराहनीय रचना सखी

Sudha Devrani ने कहा…

कई बार समझौतों में भी प्रेम छुपा होता है...बस चार कदम समझौते के साथ ही सही आगे चल लेते हैं तो तो प्रेम के ऊपर छाया कोहरा छँट जाता है।
इस अपरिभाषित प्रेम को समझना इतना आसान भी कहाँ है....
अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आपका।

Sudha Devrani ने कहा…

सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया हेतु तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.विश्वमोहन जी!

Sudha Devrani ने कहा…

सस्नेह आभार एवं धन्यवाद सखी!

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल ने कहा…

बहुत सुन्दर सृजन।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अब नहीं प्रेम तो जाने दो ...
सच भी है ... प्रेम न हो तो बंधन बेमानी है ...
फूल न खिले तो क्या फायदा ...
अच्छी रचना ...

Sweta sinha ने कहा…

इक शायर ने कहा था-
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मी तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

इसलिए जरूरी है समझना-
अपनी-अपनी तृष्णाओं के रेगिस्तान में
भटकते ताउम्र इच्छाओं के बियाबान में
जो दामन में नहीं अपने, उस भुलाकर
है जो खुश रहे जीवन से मिले अनुदान में।
----
प्रिय सुधा जी,

संबंधों में उपजी असंतुष्टि,मनमुताबिक,मनलायक पाने की और जीने की लालसा ने रिश्तों की गरिमा पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। संयुक्त परिवार से एकल परिवार और अब एकल परिवार का अस्तित्व भी प्रश्नों के भँवर में होना चिंतनीय है।
समाज में वैवाहिक संबंध विच्छेद के बढ़ते प्रचलन
का समाधान तलाशती आपकी यह रचना बेहद सारगर्भित
संदेश दे रही है।

सस्नेह।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार सर!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार नासवा जी!

Sudha Devrani ने कहा…

अपनी-अपनी तृष्णाओं के रेगिस्तान में
भटकते ताउम्र इच्छाओं के बियाबान में
जो दामन में नहीं अपने, उस भुलाकर
है जो खुश रहे जीवन से मिले अनुदान में।
बहुत ही सुन्दर सार्थक पंक्तियों से रचना को पूर्णता देने व सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन के हेतु तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी!

Satish Saxena ने कहा…

बहुत प्यारा सरल अनुरोध आवाहन !
सहजता कविता को प्रभावी बनाने में कामयाब है !

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आदरणीय सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया द्वारा उत्साहवर्धन हेतु।

Jyoti khare ने कहा…

आशा का संचार करती सुंदर रचना

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार सर!

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

चंद दिनों के साथ में साथी
कुछ पल तो खुशी के बिताये हैं
आज की मेरी इन कमियों में
वो दिन भी तुमने भुलायें हैं
यादों को सहेज लूँ निज दिल में
अनबन के पल बिसराने दों
अब नहीं प्रेम तो जाने दो....

बहुत सुन्दर... रचना.... कई बार हम लोग थोड़ी सी अनबन के चलते बरसों का प्रेम भूल जाते हैं जबकि होना उल्टा चाहिए...प्रेम को याद रखा जाना चाहिए....

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार नैनवाल जी!

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