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खोये प्यार की यादें......

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वो ऐसा था/वो ऐसी थी यही दिल हर पल कहता है, गुजरती है उमर, यादों में खोया प्यार रहता है......... भुलाये भूलते कब हैं वो यादें वो मुलाकातें, भरे परिवार में अक्सर अकेलापन ही खलता है । कभी तारों से बातें कर कभी चंदा को देखें वो, कभी गुमसुम अंधेरे में खुद ही खुद को समेटें वो । नया संगी नयी खुशियाँ कहाँ स्वीकार करते हैं, उन्हीं कमियों में उलझे ये तो बस तकरार करते हैं । कहाँ जीते हैं ये दिल से, ये घर नाबाद रहता है, गुजरती है उमर यादोंं में खोया प्यार रहता है.......... साथी हो सगुण फिर भी इन्हेंं कमियां ही दिखती हैं, जो पीछे देख चलते हैं, उन्हेंं ठोकर ही मिलती हैं.। कशमकश में रहे साथी, कमीं क्या रह गयी मुझमें समर्पित है जिन्हेंं जीवन,वही खुश क्यों नहीं मुझमें । करीब आयेंगे ये दिल से, यही इन्तजार रहता है, गुजरती है उमर यादों में खोया प्यार रहता है.......। बड़े जिनकी वजह से दूर हो जीना इन्हेंं पडता, नहीं सम्मान और आदर उन्हें इनसे कभी मिलता.। खुशी इनकी इन्हें देकर बड़प्पन खुद निभाते हैं, वही ताउम्र  छोटों  से  उचित  सम्मान पाते हैं .। दिल ...

शुक्रिया प्रभु का.......

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हम चलें एक कदम फिर कदम दर कदम यूँ कदम से कदम हम फिर बढाते चले । जिन्दगी राह सी,और चलना ही अगर मंजिल नयी उम्मीद मन में जगाते रहें। खुशियाँ मिले या गम हम चले, हर कदम शुकराने तेरे मन में गाते रहें। डर भी है लाजिमी, इन राहों पर, कहीं खाई है, तो कभी तूफान हैं । कभी राही मिले जाने-अनजाने से, कहीं राहें बहुत ही सुनसान हैं । आशा उम्मीद के संग हो थोड़ा सब्र साहस देना तो उसकी पहचान है । मन मेंं हर पल करे जो शुकराना तेरा मंजिलें पास लाना तेरा काम है । ये दुनिया तेरी, जिन्दगानी तेरी, बस यूँ जीना सिखाना तेरा काम है । कभी चिलमिलाती उमस का कहर, कभी शीत जीवन सिकुडाती सी है । कभी रात काली अमावश बनी, कभी चाँद पूनम दे जाती जो है । न हो कोई शिकवा ,न कोई गिला बस तेरे गुण ही यूँ गुनगुनाते रहें, जीवन दर्शन जो दिया तूने, शुकराने तेरे मन में गाते रहें । नयी उम्मीद मन में जगाते रहें ।

उफ्फ ! "गर्मी आ गयी"– पर्यावरण विनाश और बढ़ती गर्मी पर व्यंग्यात्मक कविता

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   परिचय :-    उफ! गर्मी आ गई केवल एक मौसम की कहानी नहीं, बल्कि मानव द्वारा प्रकृति के साथ किए गए व्यवहार का आईना है। जब सर्दी थी तब हम उससे परेशान थे, पेड़ों की छाँव को महत्व नहीं दिया, और प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ते रहे। अब बढ़ती गर्मी, लू और पर्यावरण संकट हमें उसी का परिणाम दिखा रहे हैं। प्रस्तुत कविता में गर्मी स्वयं मनुष्यों से संवाद करती है और उन्हें उनके कर्मों का स्मरण कराती है।     उफ! गर्मी आ गई बसंत की मेजबानी अभी चल ही रही थी, तभी दरवाजे पर दस्तक दे गर्मी बोली— "लो, मैं आ गई!" और फिर सब एक साथ बोल उठे— "उफ! गर्मी आ गई!" हाँ! मैं आ गई, अब क्या हुआ? सखी, सर्दी जब यहाँ आई, तब भी तुम कहाँ खुश थे भाई। रोज स्मरण कर मुझे, कोसे थे सर्दी को तुम। ताने-बाने सर्दी सुनकर  चुप लौटी बेचारी बनर। उसे मिटाने और निबटाने, क्या-क्या नहीं किए थे तुम! पेड़ भी सारे काट गिराए, बस तुमको तब धूप ही भाए। छाँव कहीं पर रह न जाए, राहों के भी वृक्ष कटाए। जगह-जगह अलाव जलाकर, फिर सर्दी को तुम निबटाए। गई बेचारी अपमानित होकर, बसंत आ गया फिर मुँह धोकर। दो दिन की मेहम...

जब से मिले हो तुम

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जीवन  बदला ,दुनिया बदली, मन को अनोखा,ज्ञान मिला। मिलकर तुमसे मुझको मुझमें  एक नया इंसान मिला। रोके भी नहीं रुकती थी जो, आज चलाए चलती हूँ। जो तुम चाहते वही हूँ करती जैसे कोई कठपुतली हूँ माथे की तुम्हारी एक शिकन, मन ऐसा झकझोरे क्यों... होंठों की तुम्हारी एक हँसी मानूँ जीवन की बडी खुशी गलती भी तुम्हारी सिर्फ़ शरारत, दुख अपना गर तुम्हें मुसीबत । दुनिया अपनी उजड सी जाती, आँखों में दिखे गर थोड़ी नफरत । बेवशी सी कैसी छायी मुझमें क्यों हर सुख-दुख देखूँ तुममें..... कब चाहा ऐसे बन जाऊँँ, जजबाती फिर कहलाऊँ। प्रेम-दीवानी सी बनकर...... फिर विरह-व्यथा में पछताऊँ ।

दो दिन की हमदर्दी में, जीवन किसका निभ पाया....

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जाने इनके जीवन में , ये कैसा मोड आया, खुशियाँँ कोसों दूर गयी दुख का सागर गहराया । कैसे खुद को संभालेंगे सोच के मन मेरा घबराया । आयी है बसंत मौसम में, हरियाली है हर मन में । पतझड़ है तो बस इनके, इस सूने से जीवन में । इस सूने जीवन में तो क्या, खुशियाँ आना मुमकिन है ? अविरल बहते आँसू इनके मन मेरा देख के घबराया । छिन गया बचपन बच्चों का, उठ गया सर से अब साया, हुए अनाथ जो इक पल में जर्जर तन मन की काया । मुश्किल जीवन बीहड राहें, उस पर मासूम अकेले से, कैसे आगे बढ़ पायेंगे, सोच के मन मेरा घबराया । बूढे़ माँ-बाप आँखें फैलाकर, जिसकी राह निहारा करते थे। उसे "शहीद"कह विदा कर रहे, खुद विदा जिससे लेने वाले थे । बहती बूढ़ी आँखें जो अब  कौन पोंछने आयेगा ? गर्व करे शहीदों पर पूरा देश घरवालों को कौन संभालेगा ? दो दिन की हमदर्दी में, जीवन किसका निभ पाया ? कैसे खुद को संभालेंगे ? सोच के मन मेरा घबराया । जाने इनके जीवन में, एक ऐसा ही मोड़ आया। खुशियाँ कोसों दूर गयी, दुख का सागर गहराया ।

"पुष्प और भ्रमर"

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तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया । हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे, बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा । न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी, मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा। तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा। तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।            "मगर अफसोस" !!! तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ? मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ                    ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा । मौसम में जब भी समाँ लौट आये मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा                                                      ...

हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है ;

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जंग लगे/दीमक खाये खोखले से थे वे, कलई / पालिस कर चमका दिये गये नये /मजबूत से दिखने लगे एकदम... ऐसे सामानों को बाजारों में बिकते देखा है। खोखले थे सो टूटना ही था, दोष लाने वालों पर मढ़ दिये गये... शुभ और अशुभ भी हो गयी घड़ियाँ.... मनहूसियत को बहुओं के सर मढ़ते देखा है। हाँ !मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है। झगड़ते थे बचपन मे भी, खिलौने भी छीन लेते थे एक-दूसरे के.... क्योंकि खिलौने लेने तो पास आयेगा दूसरा, हाँ! "पास आयेगा" ये भाव था प्यार/अपनेपन का.... उन्ही प्यार के भावों में नफरत को भरते देखा है। हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है। वो बचपन था अब बड़े हुए, तब प्यार था अब नफरत है..... छीनने के लिए खिलौने थे, औऱ अब पैतृक सम्पत्ति..... तब सुलह कराने के लिए माँ-बाप थे, अब वकील औऱ न्यायाधीश.... भरी सभा में सच को मजबूरन गूँगा होते देखा है ; या यूँ कह दें-"झूठ के आगे सच को झुकते देखा है"। हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।। हो गयी जीत मिल गये हिस्से, खत्म हुए अब कोर्ट के किस्से... ...

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