भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

बी पॉजिटिव

 

be positive

बी पॉजिटिव

"ओह! कम ऑन मम्मा! अब आप फिर से मत कहना अपना वही 'बी पॉजिटिव'! कुछ भी पॉजिटिव नहीं होता हमारे पॉजिटिव सोचने से। ऐसे टॉक्सिक लोगों के साथ, इतने नेगेटिव माहौल में कैसे पॉजिटिव रहें?

कैसे पॉजिटिव सोचें जब आस-पास इतनी नेगेटिविटी हो? और कब तक पॉजिटिव रह सकते हैं? कोशिश कर भी लें तो क्या बदल जाएगा? कुछ भी पॉजिटिव नहीं होने वाला। बस भ्रम में रहो और खुद को दिलासा देते रहो!"

अंकुर झुंझलाहट और बेचैनी के साथ आँगन में इधर-उधर चक्कर काटते हुए बोले जा रहा था। पिछले कुछ समय से वह लगातार लोगों की आलोचनाओं, कटाक्षों और नकारात्मक व्यवहार का सामना कर रहा था। हर ओर उसे शिकायतें, निराशा और नकारात्मकता ही दिखाई दे रही थी। धीरे-धीरे उसका धैर्य जवाब देने लगा था।

उधर माँ आँगन में रखी स्प्रे बोतल उठाकर गमले में लगे स्नेक प्लांट की पत्तियों पर जमी धूल पर पानी का छिड़काव कर रही थीं।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "देख बेटा, कितनी धूल जम जाती है इन पौधों पर। बेचारे तब तक धूमिल दिखाई देते हैं, जब तक यह धूल हट न जाए।"

माँ की बात सुनकर अंकुर और झुंझला गया।

उसने मन ही मन सोचा, "मैं अपनी परेशानी बता रहा हूँ और मम्मा को पौधों की पड़ी है!"

फिर भी माँ का मन रखने के लिए वह अनमने भाव से उनके पास जाकर खड़ा हो गया।

माँ ने स्नेह से उसकी ओर देखा और बोलीं, "जरा ध्यान से देख। यह धूल इस पौधे पर कैसी चिपकी हुई है न? बिल्कुल वैसे ही जैसे तेरे मन पर यह सारी नेगेटिविटी चिपक गई है।"

उन्होंने फिर पत्तियों पर पानी की फुहार करते हुए कहा।

"ये देख, पानी के साथ यह धूल पत्तियों से नीचे मिट्टी में जा रही है। अब बता, क्या इस धूल से यह पौधा भी धूल बन जाएगा?"

अंकुर कुछ समझने की कोशिश ही कर रहा था कि पानी से धुली पत्तियाँ चमक उठीं। पौधा पहले से कहीं अधिक ताज़ा और जीवंत दिखाई देने लगा।

माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं न! पौधा धूल को अपने ऊपर बोझ बनाकर नहीं रखता। वह उसे नीचे पहुँचा देता है। वही धूल मिट्टी में मिलकर उसके विकास का हिस्सा बन जाती है।"

अंकुर की बुझी आँखों में जैसे अचानक चमक लौट आई।

वह उत्साहित होकर बोला, "मतलब... यह धूल तो इसके लिए खाद जैसी बन गई!"

"बिल्कुल!" माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "जीवन की नेगेटिविटी भी ऐसी ही होती है बेटा। यदि हम उसे अपने मन पर जमाए रखें तो वह हमें धूमिल कर देती है। लेकिन यदि उससे सीख लेकर आगे बढ़ जाएँ, तो वही हमारे विकास का कारण बन जाती है।"

अंकुर कुछ क्षण उस चमकते पौधे को देखता रहा।

फिर मुस्कुराकर बोला, "समझ गया मम्मा। नेगेटिव लोगों को बदलना मेरे हाथ में नहीं है, लेकिन उनकी नेगेटिविटी को अपनी ताकत में बदलना जरूर मेरे हाथ में है।"

माँ की आँखों में संतोष झलक उठा।

"बस बेटा," उन्होंने स्नेह से कहा, "यही है मेरा 'बी पॉजिटिव'।"

अंकुर ने फिर एक बार चमकती पत्तियों की ओर देखा। कुछ देर पहले जो पौधा धूल से ढका हुआ था, अब पहले से अधिक निखरा हुआ लग रहा था।

शायद उसके मन की धूल भी अब कुछ हद तक झड़ चुकी थी।





पढ़िए एक और लघुकथा निम्न लिंक पर

● उफ्फ ! ये बच्चे भी न

टिप्पणियाँ


  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 16 अप्रैल को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. व्वाहहहहहह
    सुंदर चिंतन
    वंदन

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  3. वाह ! माँ ऐसी ही होती है जो हर निराशा को आशा में बदल दे

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  4. सकारात्मक भाव .., कितना सहज संदेश!! मन को छू गई प्रेरणादायक लघुकथा ।

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  5. बहुत ही सुंदर भावपूर्ण हृदयस्पर्शी लघु कथा

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