जल संरक्षण कविता | पानी का करो संचय | मनहरण घनाक्षरी
परिचय
प्रकृति का प्रत्येक रूप मेरे मन को गहराई से स्पर्श करता है, परंतु वर्षा ऋतु का आगमन एक अलग ही अनुभूति जगाता है। कजरारे बादलों का उमड़ना-घुमड़ना, तपती धरती पर अमृत-सी वर्षा बरसाना और कभी अपने असंतुलित रूप से बाढ़ तथा सूखे जैसी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देना—इन सभी भावों ने इस कविता को जन्म दिया। "पावस के कजरारे बादल" केवल वर्षा का चित्रण नहीं, बल्कि बादलों से की गई एक विनम्र प्रार्थना है कि वे समभाव से बरसें, जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहे और प्रत्येक जीव के जीवन में हरियाली, आनंद और नवजीवन का संचार हो।
पावस के कजरारे बादल,
जमकर बरसे कारे बादल ,
उमस धरा की मिटा न पाए,
बरस बरस कर हारे बादल ।
घिरी घटा गहराये बादल,
भर भर के जल लाये बादल,
तीव्र ताप से तपी धरा पर,
मधुर सुधा बरसाये बादल ।
सूरज से घबराए बादल,
चढ़ी धूप छितराए बादल,
उमड़-घुमड़ पहुँचे गिरि-कानन,
घन घट फट पछताए बादल ।
भली नहीं अतिवृष्टि बादल,
करे याचना सृष्टि बादल,
कहीं बाढ़ कहीं सूखा क्यों ?
समता की रख दृष्टि बादल !
छोड़ भी दो मनमानी बादल,
बहुत हुई नादानी बादल,
बरसो ऐसा कि सब बोलें,
पावस भली सुहानी बादल ।
निष्कर्ष
प्रकृति का सौंदर्य उसके संतुलन में ही निहित है। बादल जब समय, स्थान और आवश्यकता के अनुरूप बरसते हैं, तभी धरती पर जीवन मुस्कुराता है। "पावस के कजरारे बादल" के माध्यम से मेरी यही कामना है कि वर्षा हर खेत, हर वन और हर आँगन को समान रूप से तृप्त करे, ताकि कहीं बाढ़ का संकट न हो, कहीं सूखे की पीड़ा न रहे और पावस ऋतु सभी के जीवन में सुख, समृद्धि हरियाली और नवजीवन का संदेश लेकर आए।
✨धन्यवाद🙏
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जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबेहतरीन पंक्तियाँ
जवाब देंहटाएंभली नहीं अतिवृष्टि बादल,
जवाब देंहटाएंकरे याचना सृष्टि बादल,
कहीं बाढ़ कहीं सूखा क्यों ?
समता की रख दृष्टि बादल !
अति सुन्दर !! लाजवाब सृजन सुधा जी !बादलों की मनुहार और समझाइश भरे भाव बहुत अच्छे लगे ।
लाजबाब सृजन
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