खामोशी जो सब कह गई | अनकही भावनाओं की भावुक हिंदी कहानी

चित्र
​प्रस्तावना (Introduction) ​ "शब्दों की एक सीमा होती है, पर संवेदनाएँ असीम हैं।" ​ अक्सर हमें लगता है कि मन की उलझनों को शब्दों के धागे में पिरोकर बाहर निकाल देने से हृदय का बोझ कम हो जाएगा। हम सोचते हैं कि कह देने से मन खाली हो जाएगा। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होता है ?  कभी-कभी शब्द उस गुबार को केवल हवा देते हैं, और पीछे छूट जाती है एक भारी खामोशी । ​यह कहानी है एक ऐसी ही संध्या की, जहाँ डूबते सूरज की लाली और बादलों की विरल परतों के बीच एक स्त्री अपने अंतर्मन की गठरी खोलती है। वह बोलती तो है, पर पाती है कि आँसू फिर भी थम नहीं रहे। यह रचना 'कह देने' और 'महसूस करने' के बीच के उस सूक्ष्म अंतर को उकेरती है, जहाँ अंततः उसे समझ आता है कि पूर्णता शब्दों में नहीं, बल्कि स्वयं की खामोशी और वर्तमान स्थिति को स्वीकार करने में है । संध्या की धुंधलाती बेला वह छत के कोने में खामोश खड़ी थी। उसकी निगाहें दूर क्षितिज में कहीं खोई हुई थीं, मानो अपनी उमड़ती भावनाओं का कोई सिरा खोज रही हो। आकाश पर बादलों की विरल परतें, दिनभर के अनकहे भावों को समेटे धीरे-धीरे तैर रही थीं। डूबते सूरज...

मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता हैं न !

 

Table chair


"जाने दे बेटा ! एक कुर्सी ही तो है ,वो या ये, क्या फर्क पड़ता है,  बैठना ही तो है न । इसी से काम चला ले"।

"नहीं मम्मा ! इस टेबल के साथ की वही चेयर है । हाइट वगैरह से फिट है वो इसके साथ,और ये चेयर उसके टेबल से साथ की है फिर भी उसने"...

"जाने दे न बेटा ! रहने दे , शायद उसे पसन्द आ गई !  अब ले गई तो ले जाने दे" !

"ऐसे कैसे मम्मा !  कैसे जाने दूँ ? इस चेयर के साथ मैं कम्फर्टेबल नहीं हूँ" ! 

उसने कुछ चिढ़कर कहा तो माँ डाँटते हुए बोली, "ऐडजस्ट कर ले अब ऐसे ही ! "अच्छा थोड़े ना लगता है कि तू भी वैसे ही चुपचाप उठा लाये" !

"मैं क्यों चुपचाप उठाकर लाउँगी मम्मा" ?

"तो शिकायत करेगी ऑनर से ? चुप रह ले ! माँ ने फिर घुड़क दिया"।

"नहीं मम्मा ! कोई कम्प्लेन नहीं कर रही मैं ! आप चिंता मत करो ! मैं उसे बताकर इस टेबल के साथ की चेयर लाउँगी या फिर इस चेयर के साथ का टेबल" ! 

"पर बेटा जाने दे न ! उसने दे भी दिया तो मन में क्या सोचेगी ? ऐसे तो तुम्हारी दोस्ती में मनमुटाव"...

"मम्मा ! ना लाई तो मैं मन में क्या सोचुँगी ! मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता हैं न" !

माँ अब निःशब्द मुस्कुरा कर रह गई और 'मन की सोच और मनमुटाव' के इस वाकये में जीवन के कितने ही वाकये जोड़ सोचने लगी कि वाकई दूसरे के मन की सोचने से पहले अपने ही मन के मनमुटाव तो ठीक कर दें पहले ।



पढ़िए ऐसे ही एक और लघुकथा

टिप्पणियाँ

  1. सही कहा। बातचीत से ही हल निकलता है। सुंदर सीख देती लघु-कथा।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर संदेश निहित है लघुकथा में । बच्चों के विचारों में गहन संदेश छिपा होता है । अति सुन्दर लघुकथा ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सार्थक ... पहले खुद को व्यवस्थित होना / करना .. दोनों जरूरी है ...
    सार्थक सन्देश ...

    जवाब देंहटाएं
  4. यही तो हमारी पीढ़ी को नहीं आया हमेशा पहले दुसरो के बारे में ही सोचते रहे लेकिन कहीं न कहीं अपना मन तो मैला कर ही रहे थे न, ये आज के बच्चे सीखा रहे हैं हमें, सुन्दर संदेश देती लधु कथा, आप को और आपके पुरे परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं सुधा जी 🙏

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह! सुधा जी ,बहुत सुन्दर सीख देती लघुकथा ।

    जवाब देंहटाएं
  6. अक्सर हम दूसरों को बुरा ना लगे इसके लिए अपनी कितनी ही इच्छाओं को दबाते रहे हैं । न्यायोचित को भी !!!

    जवाब देंहटाएं
  7. सुंदर लघुकथा , नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

फ़ॉलोअर

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सम्भाले ना सम्भल रहे अब तूफानी जज़्बात

करते रहो प्रयास (दोहे)

विश्वविदित हो भाषा