मैं जो गई बाहर

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चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया  मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी  । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया  । घर का आँगन,  आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में,  फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया  मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब  वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. बहुत कुछ बदल गया । हाँ ! नवीन स्फूर्ति आई । पर ये स्फूर्ति भी तो जैसे वसंत की असमय आँधी — जो पुष्पों को महकाती कम, और बिखेरती अधिक है। और स्थिरता - वह तो मानो शरद की निस्तब्ध चाँद...

मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता हैं न !

 

Table chair


"जाने दे बेटा ! एक कुर्सी ही तो है ,वो या ये, क्या फर्क पड़ता है,  बैठना ही तो है न । इसी से काम चला ले"।

"नहीं मम्मा ! इस टेबल के साथ की वही चेयर है । हाइट वगैरह से फिट है वो इसके साथ,और ये चेयर उसके टेबल से साथ की है फिर भी उसने"...

"जाने दे न बेटा ! रहने दे , शायद उसे पसन्द आ गई !  अब ले गई तो ले जाने दे" !

"ऐसे कैसे मम्मा !  कैसे जाने दूँ ? इस चेयर के साथ मैं कम्फर्टेबल नहीं हूँ" ! 

उसने कुछ चिढ़कर कहा तो माँ डाँटते हुए बोली, "ऐडजस्ट कर ले अब ऐसे ही ! "अच्छा थोड़े ना लगता है कि तू भी वैसे ही चुपचाप उठा लाये" !

"मैं क्यों चुपचाप उठाकर लाउँगी मम्मा" ?

"तो शिकायत करेगी ऑनर से ? चुप रह ले ! माँ ने फिर घुड़क दिया"।

"नहीं मम्मा ! कोई कम्प्लेन नहीं कर रही मैं ! आप चिंता मत करो ! मैं उसे बताकर इस टेबल के साथ की चेयर लाउँगी या फिर इस चेयर के साथ का टेबल" ! 

"पर बेटा जाने दे न ! उसने दे भी दिया तो मन में क्या सोचेगी ? ऐसे तो तुम्हारी दोस्ती में मनमुटाव"...

"मम्मा ! ना लाई तो मैं मन में क्या सोचुँगी ! मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता हैं न" !

माँ अब निःशब्द मुस्कुरा कर रह गई और 'मन की सोच और मनमुटाव' के इस वाकये में जीवन के कितने ही वाकये जोड़ सोचने लगी कि वाकई दूसरे के मन की सोचने से पहले अपने ही मन के मनमुटाव तो ठीक कर दें पहले ।



पढ़िए ऐसे ही एक और लघुकथा

टिप्पणियाँ

  1. सही कहा। बातचीत से ही हल निकलता है। सुंदर सीख देती लघु-कथा।

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  2. बहुत सुन्दर संदेश निहित है लघुकथा में । बच्चों के विचारों में गहन संदेश छिपा होता है । अति सुन्दर लघुकथा ।

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  3. सार्थक ... पहले खुद को व्यवस्थित होना / करना .. दोनों जरूरी है ...
    सार्थक सन्देश ...

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  4. यही तो हमारी पीढ़ी को नहीं आया हमेशा पहले दुसरो के बारे में ही सोचते रहे लेकिन कहीं न कहीं अपना मन तो मैला कर ही रहे थे न, ये आज के बच्चे सीखा रहे हैं हमें, सुन्दर संदेश देती लधु कथा, आप को और आपके पुरे परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं सुधा जी 🙏

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  5. वाह! सुधा जी ,बहुत सुन्दर सीख देती लघुकथा ।

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  6. अक्सर हम दूसरों को बुरा ना लगे इसके लिए अपनी कितनी ही इच्छाओं को दबाते रहे हैं । न्यायोचित को भी !!!

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  7. सुंदर लघुकथा , नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

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