जल संरक्षण कविता | पानी का करो संचय | मनहरण घनाक्षरी
मनमुटाव हमेशा किसी बड़ी घटना से नहीं जन्म लेता। कई बार एक छोटी-सी बात, मन में उठी अनकही शंका या दूसरे के बारे में बना लिया गया अनुमान भी रिश्तों में दूरी पैदा कर देता है। प्रस्तुत लघुकथा "मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता है, न!" एक साधारण-सी घटना के माध्यम से यही बताती है कि रिश्तों की मधुरता केवल त्याग या समायोजन से नहीं, बल्कि स्पष्ट संवाद और सकारात्मक सोच से भी बनी रहती है। दूसरे के मन का अनुमान लगाने से पहले यदि हम अपने मन के भ्रम और मनमुटाव को समझ लें, तो अनेक रिश्ते अनावश्यक कटुता से बच सकते हैं।
"जाने दे बेटा ! एक कुर्सी ही तो है ,वो हो या ये, क्या फर्क पड़ता है, बैठना ही तो है न । इसी से काम चला ले"।
"नहीं मम्मा ! इस टेबल के साथ की वही चेयर है। उसकी ऊँचाई भी इसी टेबल के हिसाब से है, जबकि यह चेयर उसके टेबल की है। फिर भी उसने बदल ली..."
"जाने दे न बेटा ! रहने दे , शायद उसे पसन्द आ गई ! अब ले गई तो ले जाने दे" !
"ऐसे कैसे मम्मा ! कैसे जाने दूँ ? इस चेयर के साथ मैं कम्फर्टेबल नहीं हूँ" !
उसने कुछ चिढ़कर कहा तो माँ डाँटते हुए बोली, "ऐडजस्ट कर ले अब ऐसे ही ! "अच्छा थोड़े ना लगता है कि तू भी वैसे ही चुपचाप उठा लाये" !
"मैं क्यों चुपचाप उठाकर लाउँगी मम्मा" ?
"तो शिकायत करेगी ऑनर से ? चुप रह ले ! माँ ने फिर घुड़क दिया"।
"नहीं मम्मा ! कोई कम्प्लेन नहीं कर रही मैं ! आप चिंता मत करो ! मैं उसे बताकर इस टेबल के साथ की चेयर लाउँगी या फिर इस चेयर के साथ का टेबल" !
"पर बेटा जाने दे न ! उसने वापस दे भी दिया तो मन में क्या सोचेगी ? कहीं तुम्हारी दोस्ती में मनमुटाव न आ जाय "।
"मम्मा ! ना लाई तो मैं मन में क्या सोचुँगी ! मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता है न" ?..
"माँ अब निःशब्द मुस्कुरा कर रह गई। इस छोटे-से प्रसंग ने उसे जीवन के अनेक ऐसे प्रसंग याद दिला दिए, जहाँ मनमुटाव केवल मन की कल्पनाओं से जन्मा था। वह सोचने लगी—वाकई, दूसरे के मन के अनुमान लगाने से पहले अपने ही मन के मनमुटाव दूर कर लेने चाहिए।"
निष्कर्ष
जीवन में मनमुटाव की शुरुआत अक्सर किसी बड़ी वजह से नहीं, बल्कि मन में उपजे छोटे-छोटे भ्रम, संकोच और पूर्वधारणाओं से होती है। यह लघुकथा सहजता से याद दिलाती है कि रिश्तों को मधुर बनाए रखने के लिए दूसरे के मन का अनुमान लगाने से अधिक आवश्यक है अपने मन के संशय और मनमुटाव को समय रहते दूर करना। संवाद और स्पष्टता ही विश्वास की सबसे मजबूत नींव हैं।
✨धन्यवाद 🙏
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सही कहा। बातचीत से ही हल निकलता है। सुंदर सीख देती लघु-कथा।
जवाब देंहटाएंजीवन के अनुभव और पाठ सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर संदेश निहित है लघुकथा में । बच्चों के विचारों में गहन संदेश छिपा होता है । अति सुन्दर लघुकथा ।
जवाब देंहटाएंसार्थक ... पहले खुद को व्यवस्थित होना / करना .. दोनों जरूरी है ...
जवाब देंहटाएंसार्थक सन्देश ...
यही तो हमारी पीढ़ी को नहीं आया हमेशा पहले दुसरो के बारे में ही सोचते रहे लेकिन कहीं न कहीं अपना मन तो मैला कर ही रहे थे न, ये आज के बच्चे सीखा रहे हैं हमें, सुन्दर संदेश देती लधु कथा, आप को और आपके पुरे परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं सुधा जी 🙏
जवाब देंहटाएंवाह! सुधा जी ,बहुत सुन्दर सीख देती लघुकथा ।
जवाब देंहटाएंअक्सर हम दूसरों को बुरा ना लगे इसके लिए अपनी कितनी ही इच्छाओं को दबाते रहे हैं । न्यायोचित को भी !!!
जवाब देंहटाएंसुंदर लघुकथा , नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें
जवाब देंहटाएंसुन्दर भाव सृजन
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