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पुनर्जन्म – एक स्त्री के स्वाभिमान और आत्मविश्वास की प्रेरणादायक हिंदी कहानी

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  इस कहानी में 'पुनर्जन्म' का अर्थ नया शरीर धारण कर पुनः जन्म लेना नहीं, बल्कि मन की गहराइयों में सुप्त पड़े स्वाभिमान, संवेदनाओं और व्यक्तित्व का पुनः जागृत होना है। यह प्रेरणादायक हिंदी कहानी एक ऐसी स्त्री की यात्रा को दर्शाती है, जो वर्षों के समझौतों के बाद अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और खोई हुई पहचान को फिर से खोजती है। "साँझ धीरे-धीरे आँगन में उतर रही थी। पश्चिम में डूबते सूरज की सुनहरी आभा दीवारों पर बिखरी थी। कोने में खड़ा अमलतास गर्म हवा के हल्के झोंकों के साथ मद्धिम-सा झूम रहा था। ऐसे ही समय पूरे पन्द्रह दिन बाद भुविका ननिहाल से लौटी।" उसे देखते ही अनुमेधा ने आगे बढ़कर उसे बाँहों में भर लिया। "उतर गया तेरा गुस्सा, नकचढ़ी कहीं की?" उसने स्नेहभरे उलाहने से कहा, "इतने दिन नानी के पास बैठी रही। अब कुछ ही दिनों में नौकरी पर चली जाएगी, तब तो माँ को और भी भूल जाएगी।" भुविका के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी, पर वह उसकी आँखों तक न पहुँच सकी। माँ की बाँहों से अलग होकर वह चुपचाप अपना बड़ा-सा बैग घसीटते हुए कमरे की ओर बढ़ गई। उसके कदमों की धीमी आहट...

ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कराना आ गया

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दुपहरी बेरंग बीती सांझ हर रंग भा गया । ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । अजब तेरे नियम देखे,गजब तेरे कायदे । रोते रोते समझ आये,अब हँसी के फ़ायदे । भीगी पलकों संग लब को खिलखिलाना आ गया ।  ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । क्यों कहें संघर्ष तुझको, ये तो तेरा सिलसिला । नियति निर्धारित सभी , फिर क्या करें तुझसे गिला ।  सत्य को स्वीकार कर जीना जिलाना आ गया ।  ज़िन्दगी !  समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । हो पूनम की रात सुन्दर या तिमिर घनघोर हो । राहें हों कितनी अलक्षित, आँधियाँ चहुँ ओर हो । हर हाल में मेरे 'साँवरे' तेरे गुण गुनाना आ गया । ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कराना आ गया । पढिए  ऐसे ही जिंदगी से जुड़ी एक और रचना ■  चल जिंदगी तुझको चलना ही होगा

हम फल नहीं खायेंगे

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आज बाबा जब अपने लाये थोड़े से फलों को बार - बार देखकर बड़े जतन से टोकरी में रख रहे थे तब रीना ने अपने छोटे भाई रवि को बुलाकर धीमी आवाज में समझाया कि बाबा जब माँ को फल काटकर देंगे और माँ हमेशा की तरह हमें  खिलायेगी तो हम फल नहीं खायेंगे ! सुनकर रवि बोला, "क्यों नहीं खायेंगे ? दीदी ! ऐसे तो माँ परेशान हो जायेगी न ! अगर परेशान होकर और बीमार हो गयी तो ? नहीं मुझे माँ को परेशान नहीं करना ! मैं तो चुपचाप खा लूँगा " । कहकर वो जाने लगा तो रीना ने उसकी कमीज पकड़कर उसे पास खींचा और फिर वैसी ही दबी आवाज में बोली, "अरे बुद्धू ! देखा नहीं , फल कित्ते कम हैं ! माँ बीमार है न, खाना भी नहीं खाती है, तो थोड़े फल ही खा लेगी न । समझा" !  तो वह मासूमियत से बोला, "क्या समझा ? इत्ते सारे तो हैं न  !  हम सब मिलकर खा लेंगे । फिर बाबा और ले आयेंगे " । श्श्श...धीरे बोल ! सुन ! आज मैंने माँ - बाबा की बातें सुनी । वे दोनों पैसों की चिंता कर रहे थे । माँ की बीमारी को ठीक करने के लिए अभी बहुत सारे पैसे खर्च करने पड़ेंगे । तो बाबा अब ज्यादा फल नहीं ला पायेंगे ना ! इसीलिए हम फल नहीं खायेंगे ...

उठे वे तो जबरन गिराने चले

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  उठे वे तो जबरन गिराने चले  कुछ अपने ही रिश्ते मिटाने चले  अपनों की नजर में गिराकर उन्हें गैरों में अपना बताने चले ।। ना राजा ना रानी, अधूरी कहानी दुखों से वे लाचार थे बेजुबानी करम के भरम में फँसे ऐसे खुद ही कल्पित ही किस्से सुनाने चले  उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। दर-दर की ठोकर से मजबूत होकर चले राह अपनी सभी आस खोकर हर छाँव सर से उनकी गिराकर राहों में काँटे बिछाने चले उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। काँटों में चल के तमस से निकल के रस्ते बनाये हर विघ्नों से लड़ के पहचान खुद से नयी जब बनी तो मिल बाँट खुशियाँ मनाने चले उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। पढ़िए इन्हीं भावों पर आधारित एक और सृजन " दुखती रगों को दबाते बहुत हैं "

ये माँ भी न !...

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 ट्रेन में बैठते ही प्रदीप ने अपनी बंद मुट्ठी खोलकर देखी तो आँखों में नमी और होठों में मुस्कुराहट खिल उठी ।  साथ बैठे दोस्त राजीव ने उसे देखा तो आश्चर्यचकित होकर पूछा, "क्या हुआ ? तू हँस रहा है या रो रहा है " ?  अपनी बंद मुट्ठी को धीरे से खोलकर दो सौ का नोट दिखाते हुए प्रदीप बोला , "ये माँ भी न ! जानती है कि पिचहत्तर हजार तनख्वाह है मेरी । फिर भी ये देख ! ये दो सौ रुपये का नोट मेरी मुट्ठी में बंद करते हुए बोली , रास्ते में कुछ खा लेना" ।  कहते हुए उसका गला भर आया । 

सफर ख्वाहिशों का थमा धीरे -धीरे

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 यह एक भावपूर्ण प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो जीवन में आने वाले बदलाव, आशा, विश्वास और आत्मबोध की यात्रा को दर्शाती है। “धीरे-धीरे” की लय में रची गई यह कविता मन के भीतर चल रहे द्वंद्व, उम्मीद और सच्चाई के उजागर होने की प्रक्रिया को बेहद संवेदनशीलता से व्यक्त करती है। जीवन में धैर्य और विश्वास बनाए रखना जरूरी है... मौसम बदलने लगा धीरे-धीरे, जगा, आँख मलने लगा धीरे-धीरे । जमाना जो आगे बहुत दूर निकला, रुका , साथ चलने लगा धीरे - धीरे। हुआ चाँद रोशन खिली सी निशा है, कि बादल जो छँटने लगा धीरे-धीरे । खुशी मंजिलों की मनाएँ या मानें, सफर ख्वाहिशों का थमा धीरे -धीरे। अवचेतन में आशा का दीपक जला तो,  मुकद्दर बदलने लगा धीरे-धीरे । हवा मन - मुआफिक सी बहने लगी है, मन में विश्वास ऐसा जगा धीरे -धीरे । अनावृत हुआ सच भले देर से ही, लगा टूटने अब भरम धीरे-धीरे । पढ़िए एक और रचना इसी ब्लॉग पर   जिसमें अपना भला है, बस वो होना है #हिंदीकविता #प्रेरणादायककविता #जीवनयात्रा #नईकविता #स्त्रीमन

लो ! मैं तो फिर वहीं आ गयी

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  "क्या होगा इसका ? बस खाना खेलना और सोना । इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जीवन में बेटा !  कम से कम पढ़ाई-लिखाई तो कर ले । आजकल कलम का जमाना है । चल बाकी कुछ काम-काज नहीं भी सीखती तो कलम चलाना तो सीख !  बिना पढ़े -लिखे क्या करेंगी इस दुनिया में, बता ?... पढेगी-लिखेगी तभी तो सीखेगी दुनियादारी" ! घर के बड़े जब देखो तब टोकते इसी तरह । सुन सुन कर पक गयी भावना। आखिर झक मारकर पढ़ने में मन लगाने लगी । और बन गयी एक पढ़ाकू लड़की।अपनी कक्षा में सबसे अब्बल । चार दिन की खुशी ! फिर वही... "अरे ! पढ़ती तो है । बस पढ़ती ही तो है ! अब बन भी जाये कुछ तो माने । नहीं तो सम्भालेगी फिर चौका चूल्हा !... और वो सीखना तो दूर देखा भी ना है इसने । क्या होगा इस छोरी का" ?.. सबको लगता भावना किसी की नहीं सुनती बस अपने में ही मस्त मौला है । पर वो थी ठीक इसके उलट । बहुत ही संवेदनशील, और अन्तर्मुखी। साथ ही  सबकी सुनकर सबके मुताबिक कुछ करने की ठानने वाली । पर ना जताना और ना ही कुछ बताना। फिर ठान ली उसने तो बन गई शिक्षिका ! परन्तु पढ़ते-पढ़ते पढ़ने की ऐसी लत लगी उसे कि बिना पढ़े तो सो भी ना पाती । इधर घर वाले सोच...

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