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सच बड़ा तन्हा उपेक्षित राह एकाकी चला

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  सच बड़ा तन्हा उपेक्षित, राह एकाकी चला, टेरती शक्की निगाहें, मन में निज संशय पला । झूठ से लड़ता अभी तक, खुद को साबित कर रहा, खुद ही दो हिस्से बँटा अब, मन से अपने लड़ रहा। मन ये पूछे तू भला तो, क्यों न तेरे यार हैं  ? पैरवी तेरी करें जो, कौन कब तैयार हैं  ? क्या मिला सच बनके तुझको, साजिशों में दब रहा, घोर कलयुग में समझ अब, तू कहीं ना फब रहा । क्यों कसैला और कड़वा, चाशनी कुछ घोल ले ! चापलूसी सीख थोड़ी, शब्द मीठे बोल ले ! ना कोई दुनिया में तेरा, अपने बेगाने हुए, खून के रिश्ते भी देखो, ऐसे अनजाने हुए । सच तू सच में सच का अब तो, इतना आदी हो गया देख तो सबकी नजर में, तू फसादी हो गया । हाँ फसादी ही सही पर सच कभी टलता नहीं, जान ले मन ! मेरे आगे झूठ ये  फलता नहीं । मेरे मन ! तेरे सवालों का बड़ा अचरज मुझे ! क्या करूँ इस चापलूसी से बड़ी नफरत मुझे ! पर मेरे मन !  तू ही मुझसे यूँ खफा हो जायेगा । फिर तेरा सच बोल किससे कैसे संबल पायेगा ? वैसे झूठों और फरेबों ने  मुझे मारा नहीं  हूँ परेशां और तन्हा, पर कभी हारा नहीं  । हाँ  मैं सच हूँ सच रहूँगा,  चाहे एकाकी रह...

अपने हिस्से का दर्द

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चित्र साभार pixabay  से... अपनों  की महफिल में हँसते -मुस्कराते  हिल - मिल कर  खुशियाँ मनाते सभी अपने खुशियों से चमकती - दमकती  इन खूबसूरत आँखों के बीच   नजर आती हैं,  कहीं कोई  एक जोड़ी आँखें  सूनी - सूनी पथराई सी । ये सूनी पथराई सी आँखें  कोरों का बाँध बना  आँसुओं का सैलाब थामें जबरन मुस्कराती हुई  ढूँढ़ती हैं कोई  एकांत अंधेरा कोना जहाँ कुछ हल्का कर सके पलकों का बोझ। बोझिल पलकों संग  ये जोड़ी भर आँखें झुकी - झुकी और  सहमी सी बामुश्किल छुपाती हैं  कोरों  के छलकाव से आँसुओं संग बहता दर्द  । हाँ दर्द जिसे नहीं दिखाना चाहती उसके उन अपनों को जिन्हें अपना बनाने और  उनका अपनापन पाने में  लगी हैं उसकी  वर्षों की मेहनत। जानती है अपनों को  अपना दर्द बता कर मिलेगी उसे संवेदना  पर साथ में उठेंगे सवाल भी। और जबाब में उधड़ पड़ेंगी वे सारी गाँठे जिनमें  तुलप-तुलप कर  बाँधे हैं उसने दर्द अपने हिस्से के... हर एक दर्द की  अपनी अलग कहानी किसी की बेरुखी, बेदर्दी तो  किसी...

पराया धन - बेटी या बेटा

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                  चित्र, साभार pixabay से "अनुज सुन ! वो...पापा...पापा को हार्टअटैक आया है। भाई !  हम बहुत परेशान हैं माँ का रो - रोकर बुरा हाल है , ...हैलो ! हैलो ! अनुज तू सुन तो रहा है न" ?  सिसकते हुए अनु ने पूछा तो उधर से निधि (अनुज की पत्नी) बोली, "दीदी मैं सुन रही हूँ अनुज तो बाथरूम में हैं मैं बताती हूँ उन्हें"। "निधि तुम दोनों आ जाओ न । ऐसे वक्त में हमें तुम्हारी बहुत जरूरत है। प्लीज निधि ! अनुज को फोन करने को कहना ! ओके" ! कहकर अनु जल्दी से फोन रख दवाइयों का लिफाफा लेकर भागी। अनु कभी माँ को संभालती तो कभी दवाइयाँ वगैरह के लिए भागदौड़ करती फिर भी बार-बार मोबाइल स्क्रीन चैक करती कि कहीं अनुज की कॉल मिस न हो जाय ।  सुबह से शाम ढ़ल गयी पर अनुज का फोन नहीं आया तो अनु को लगा कि शायद सीधे आ रहे होंगे दोनों । इसलिए कॉल नहीं किया होगा। पापा की हालत जानकर परेशान हो गये होंगे बेचारे । माँ ने पूछा तो बता दिया कि निधि को बताया है शायद निकल पड़े होंगे इसीलिए फोन नहीं कर पाये होंगे। और माँ भी बेटे की बाट जोहने लगी।  ऑपरेशन सफल रहा...

आओ ! खुद से प्यार करें

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चित्र साभार pixabay.com से चलो स्वयं से इश्क लड़ाएं  कुछ मुस्काएं कुछ शरमाए ! एक गुलाब स्वयं को देकर वेलेंटाइन अपना मनाएं ! आओ खुद से प्यार करें! लव-शब कह इजहार करें! बने-ठने कुछ अपने लिए, दर्पण में आभार करें !! इक छोटी सी डेट पे जाएं , कॉफी संग कोई मेज सजाएं । कुछ कह लें कुछ सुन लें यारा! खुद से खुद की चैट कराएं !! खुदगर्जी नहीं खुद से प्यार यह तो तन मन का अधिकार तन-मन  से ही है ये जीवन कर लें जीवन का सत्कार !! अरमानों के बीच खड़े, दौलत के मायाजाल बड़े। कभी तो निकलें इन सब से, खुद से खुद के लिए लड़ें ! अपनों की परवाह हमें अपनी भी कुछ आज करें छोटी-छोटी फतह सराहें अपने पर कुछ नाज करें मरूथल से बीहड़ जीवन का  मन -आँगन गुल्जार करें ! वेलेंटाइन के अवसर पर आओ ! खुद से प्यार करें।।          

मुझे बड़ा नहीं होना - दिल छू लेने वाली हिंदी लघुकथा

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"मुझे बड़ा नहीं होना" बचपन की मासूम सोच और भावनाओं पर आधारित दिल छू लेने वाली लघुकथा - "दादू ! अब से न मैं आपको प्रणाम नहीं करूंगा ?" हाथ से हाथ बाँधते हुए दादू के बराबर बैठकर मुँह बनाते हुए विक्की बोला। " अच्छा जी ! तो हाय हैलो करोगे या गुड मॉर्निंग, गुड नाइट "। दादू मुस्कुराते हुए बोले, "सब चलेगा छोटे साहब! आखिर हम मॉडर्न विक्की के सुपर मॉडर्न दादू जो हैं । और हम तुम्हें हर हाल में वही आशीर्वाद देंगे जो हमेशा देते हैं-- खुश रहो और जल्दी से बड़े हो जाओ ।"  "ओह्ह!  दादू, फिर से वही ?   विक्की चिढ़कर बोला और अपने नन्हें हाथों से सोफे पर हल्का मुक्का मार दिया । " प्लीज दादू अपना आशीर्वाद बदल दीजिए -- खासकर दूसरा वाला ! !" दादू ठठाकर हँसते हुए बोले,  “अरे! बड़ा नहीं होना क्या ?” विक्की का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। वह दादू के सामने आकर खड़ा हो गया और उनकी आँखों में देखते हुए बोला— "नहीं दादू ! सच्ची में बड़ा नहीं होना । आप इसकी जगह कोई और आशीर्वाद दीजिए न , कोई भी" ।   दादू ने हैरानी से पूछा, "पर क्यों ? छोटे साहब ?"  व...

लड़कियों की सुरक्षा या सजा ? एक विचारणीय लघुकथा

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आज भी समाज में लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर कई नियम बनाए जाते हैं। लेकिन क्या ये नियम सच में सुरक्षा देते हैं या उन्हें और भी सीमित कर देते हैं? इसी सवाल को उठाती है यह छोटी सी लघुकथा । माँ-बेटी की बातचीत -  हैलो ! मम्मा! कहाँ हो आप ? फोन क्यों नहीं उठा रहे थे सब ठीक है न ? निक्की ने चिंतित होकर पूछा  । माँ ने जबाब दिया, "हाँ बेटा! सब ठीक है । भूल गयी क्या ? मैंने बताया तो था कि मैंने ज्यूलरी वापस लॉकअप में रखने जाना है ।  ओह! मैं तो भूल गयी, और खूब परेशान हुई । पर मैंने आपके मोबाइल पर भी तो कॉल किया था, आपने उठाया क्यों नहीं ? अरे ! साइलेंट था शायद। चल छोड़। तू बता ! क्या बात है ? और ये  शोर कैसा है वहाँ ? कुछ नहीं मम्मा ! ये कुछ लड़कियों वार्डन से बहस कर रही हैं । दबी आवाज में निक्की ने बताया । हॉस्टल के नियम: सुरक्षा या भेदभाव ? वार्डन से ? पर क्यों ? ये बच्चे भी न ! माँ ने पूछा । नहीं मम्मा,  यहाँ के रूल्स ही अनोखे हैं, और वार्डन भी स्ट्रिक्ट !  वार्डन तो अपनी ड्यूटी कर रही है बेटा ! ऐसे अपने से बड़ों के मुँह लगना अच्छी बात तो नहीं। वैसे बहस किस बारे में ...

कहाँ गये तुम सूरज दादा ? | सर्दी पर बाल कविता

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 परिचय सर्दी का मौसम आते ही ठंडी हवाएँ, घना कोहरा और धूप की कमी सभी को महसूस होने लगती है। ऐसे में बच्चों का मन भी सूरज की गर्माहट को याद करता है। प्रस्तुत बाल कविता में बच्चे सूरज दादा से मासूम शिकायत करते हैं कि वे देर से क्यों निकलते हैं और जल्दी क्यों छिप जाते हैं। हास्य, कल्पना और बाल-सुलभ जिज्ञासाओं से भरपूर यह कविता शीत ऋतु का सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है। कहाँ गये तुम सूरज दादा ? क्यों ली अबकी छुट्टी ज्यादा ? ठिठुर रहे हैं हम सर्दी से, कितना पहनें और लबादा ? दाँत हमारे किटकिट बजते । रोज नहाने से हम डरते । खेलकूद सब छोड़-छाड़ हम, ओढ़ रजाई ठंड से लड़ते । क्यों देरी से आते हो तुम ? साँझ भी जल्दी जाते क्यों तुम ? अपनी धूप भी आप सेंकते, दिनभर यूँ सुस्ताते क्यों तुम ? धूप भी देखो कैसी पीली । मरियल सी कुछ ढ़ीली-ढ़ीली । उमस कहाँ गुम कर दी तुमने  जलते ज्यों माचिस की तीली । शेर बने फिरते गर्मी में । सिट्टी-पिट्टी गुम सर्दी में । घने कुहासे से डरते क्यों ? आ जाओ ऊनी वर्दी में ! निकल भी जाओ सूरज दादा । जिद्द न करो तुम इतना ज्यादा। साथ तुम्हारे खेलेंगे हम, लो करते हैं तुमसे वादा । कोहरे ...

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