तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

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अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित  तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है।  भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।  है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित विचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

बदलाव - 'अपनों के खातिर' | प्रेरणादायक हिंदी कहानी

 माँ के बदलाव ने बदल दी पूरे परिवार की सोच | प्रेरणादायक हिंदी कहानी

परिचय -

क्या हम कभी सोचते हैं कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं?
यदि माँ हर समय दूसरों के आदेशों में खुद को खो दे, तो बेटी भी वही सहना सीख सकती है।
यह कहानी धरा की है, जिसने अपने बच्चों के भविष्य के लिए खुद को बदलने का साहस किया।


माँ के बदलाव की प्रेरणादायक कहानी



 धरा का संघर्ष :

आज आकाश ने धरा का हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े प्यार से कहा, "इधर आओ धरा ! हमेशा जल्दी में रहती हो, जरा पास में बैठो तो" ! तो उसे अपने कानों पर विश्वास नही हुआ, विस्मित नेत्रों से आकाश को देखते हुए बोली, "क्या ?.. वो...मैं...मैंने ठीक से सुना नहीं " !

"सुना नहीं या सुनकर भी दोबारा सुनना चाहती हो ! मुस्कुराते हुए उसे प्यार से अपने पास खींचकर आकाश बोला तो आश्चर्य से उसकी आँखें फैल गयी ! 

आकाश को इतने रोमांटिक मूड में वह सालों बाद देख रही थी । उसने खुद को हल्की चूटी काटी कि ये मैं हमेशा की तरह कोई सपना तो नहीं देख रही । उम्ह!...दर्द से कराह उठी वो ! फिर संयत होकर इधर उधर देखकर बोली , "जी ! आप ठीक तो हैं ? कहिए क्या बात है ?

उसके ऐसे व्यवहार से आकाश भी झेंप सा गया । फिर नरम लहजे में बोला, "क्या बात है धरा ! आजकल तुम कुछ बदल सी गयी हो ? घरवाले भी कह रहे हैं और मुझे भी लग रहा है कि तुम पहले सी नहीं रही अब ! क्यों धरा ! क्या जरूरत है इस बदलाव की ? एक तुम ही तो हो जिसके कारण इस घर में सुख शांति रहती आयी है । 

मैं दिल से मानता हूँ धरा ! कि तुम्हारी जगह कोई और होता तो ये घर कबका बिखर चुका होता । तुमने मेरे गुस्सैल स्वभाव को तो झेला ही साथ ही मेरी माँ के ताने भी सहे हैं हमेशा । पक्षाघात से पीड़ित मेरे पिताजी की सेवा में कभी कोई कसर नहीं की । 

और तो और मेरे भाई -बहनों को भी निभाया, उनके बड़बोलेपन को हमेशा नजरअंदाज करती आई हो तुम । और हमारे बच्चों की सबसे अच्छी माँ बनने में भी कभी कोई कसर नहीं छोड़ी है तुमने,उनके पालन-पोषण पढ़ाई-लिखाई सब तुम ही तो अकेले सम्भालती आयी हो।

पहली बार पति से अपने बारे में सुनकर धरा की आँखों से गंगा - जमुना बह निकली । आकाश आज उसके गुण गा रहा था ,जो हमेशा अपने व्यवहार से उसे यही जताता आया था कि वह करती ही क्या है ! हमेशा चिढ़ा-चिढ़ा और नाखुश रहता । वह उसके आगे-पीछे घूमती रहती , उसकी हर जरूरत की चीजें उसके कहने से पहले देती । फिर भी वह कभी उसकी कदर नहीं करता।

उसकी बेरुखी से धरा टूट सी जाती , समझ ही नहीं पाती कि आखिर कहाँ कसर रह गयी । ये नफरत क्यों ? फिर भी उम्मीद करती कि शायद कभी तो ये समझेंगे । 

सुबह से शाम तक वह कोल्हू के बैल सी खटती रहती, सबकी जरुरतों का ख्याल रखती फिर भी ज्यों ही साँझ को उसके आने का समय होता, ना जाने क्यों बेवजह ही सासूमाँ की बड़बड़ शुरू हो जाती और फिर वही... दिन भर के किए - कराए में पानी फिर जाता, जब आकाश सवालिया और क्रोध भरी दृष्टि से उसे देखता , तो उसके आँसू छलक जाते, वह चाहती कि एक बार आकाश कुछ पूछे तो... मुझे नहीं तो अपनी माँ से ही सही । 

जाने तो कि वह किस बात पर नाराज हैं, शायद समझ पाये कि इसमें मेरी क्या गलती  !  या फिर मुझे और बेहतर करने की सलाह ही दे , मैं कर लूँगी । परंतु ये खामोशी और नफरत कैसे सहूँ !


परिवार के लिए खुद को भूलती धरा :

इसी तरह समय आगे बढ़ता गया और उनका परिवार भी । उनके दोनों बच्चे भी बड़े हो रहे थे और देवरानी भी घर आ चुकी थी परंतु धरा की जीवनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया । 

सोचा था देवरानी आने पर घर के कामों में तो मदद मिलेगी परंतु नौकरी पेशा देवरानी से यह उम्मीद करना ही बेकार था । बल्कि वह तो धरा को घर की कामवाली जैसे समझने लगी जेठानी सा सम्मान तो दूर वह तो हक से अपने भी सारे काम भी धरा पर ही छोड़ने लगी ।

और धरा भी तो ज्यों भूल ही गयी अपने आत्मसम्मान को । हमेशा कुण्ठित और दुखी रहने से उसका आत्मविश्वास जैसे खत्म हो गया । 'ना' कहना तो जैसे पाप हो गया उसके लिए । घर का हर सदस्य छोटा या बड़ा कोई भी आकर उसे आदेश दे जाता और वह अपनी परवाह किए बगैर दिन रात लगी रहती ।

इतना कुछ करने के बाद भी घर या बाहर नाते-रिश्तेदारों में उसकी छवि जरा भी सुधरी हुई नहीं थी । सुधरती भी कैसे ! जब सास ही हर वक्त उसकी निंदा में लगी रहती ।

 आजकल लोगों के पास न अपनी परख है और न ही अपना कोई नजरिया । बस जो सुनते हैं वही मान लेते हैं, नतीजतन कोई भी घर पर ससुरजी को देखने आते तो सासूमाँ की बातों में आकर सलाहकार बन चार बातें सुना जाते उसे ।

फिर वह भी दिल से लगा बैठती । ऐसी नकारात्मकता के चलते उसका मन ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन हरपल उसे कचोटता रहता और वह दुखियारी सी सब सहती रहती ।


जब बेटी ने दिखाया आईना :

तभी एक दिन उसने ध्यान दिया कि उसकी बेटी भी उसी की तरह दुखी-दुखी रहती है।  गौर किया तो पाया कि उसका बेटा जो बेटी से छोटा है फिर भी सारे हुक्म अपनी दीदी पर झाड़ता है कोई काम खुद नहीं करता । सब दीदी के ऊपर छोडता है और बेटी बिना ना-नुकर किए अपने कामों के साथ अनमने से ही उसके भी काम करती है ।

उसने बेटी को पास बुलाकर इस बारे में बात की तो बेटी बोली मम्मा ! "मैं उसके काम नहीं करुँगी तो वह आपसे करवायेगा और आप तो पहले ही सारे घर के काम करती हो, फिर एक और काम...! मम्मा ! मुझे अच्छा नहीं लगता । और आप भी तो सबका कहना मानती हो ना , बस मैं भी वही करती हूँ ।"

सुनकर स्तब्ध सी रह गयी धरा । उसकी चेतना जैसे झंकृत सी हुई ! लगा जैसे लम्बी तंद्रा से जागी हो । उसने विचार किया कि अक्सर बेटियाँ माँ की प्रतिच्छाया होती हैं । और वह अपने रूप में अपनी बेटी को सोचकर ही काँप उठी ।

आत्मबोध और बड़ा निर्णय :

सवालों की झड़ी सी लग गयी उसके मन में...। पूछने लगी खुद से ही कि आखिर उसका दुख क्या है ? और अपने दुख से निबटने के लिए उसने किया क्या ? क्यों दुखियारी बनी फिरती है ? क्या घर के अत्यधिक काम से वह दुखी है ?  तो किसने कहा कि अकेले घिसती-पिटती रह ? ननद देवर कोई छोटे बच्चे तो नहीं । और देवरानी ! उसकी भी चाकरी करने की क्या जरूरत पड़ गयी उसे ? 

सासूमाँ भगवान की कृपा से अभी ठीक-ठाक हैं, सुबह-शाम घूमने-फिरने जा सकती हैं तो अपनी छोटी-छोटी जरूरतें जैसे पानी वगैरह भी बिस्तर पर क्यों माँगती हैं ?  घर में उसके अलावा और भी सदस्य हैं जो कभी-कभार तो उनकी मदद कर ही सकते हैं, पर सब उसी के ऊपर छोड़ हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे रहते हैं ?  हाँ ! ससुरजी जरूर लाचार हैं उनकी सेवा मेरा फर्ज है ।

इसके अलावा मेरे दुखी रहने के कारण क्या है ? पतिदेव ने आज तक ना समझा तो अब क्या खाक समझेंगें ?  क्या उनकी उपेक्षा से दुखी रहती हूँ मैं ? उनकी उपेक्षा या अपनी अपेक्षा ? यदि मैं उनसे ऐसी अपेक्षा ही ना करूँ तो.. ?

क्यों सजा देती आई हूँ मैं खुद को  ?  सजा ही नहीं बल्कि आदत में सुमार कर दिया मैंने तो दुख को ! ऐसी दुखियारी माँ बनकर बेटी को क्या शिक्षा दे रही हूँ मैं ? जीवन को नरक बनाकर जीने की शिक्षा..!

नहीं ! अब ऐसा नहीं करुँगी, अगर मुझे देखकर मेरी बेटी ने बिना ना-नुकर किए खुद को झोंकना सीख लिया, सभी विसंगतियों को अनचाहे ही स्वीकार कर मन मारकर दुखी रहना सीख लिया, यूँ मजबूर और बेबस होकर दूसरों के हुक्म पूरे करना सीख लिया तो अब मुझे देखकर ही वह अपने में मस्त और खुशी - खुशी जीना भी सीखेगी । 

हाँ ! मुझे सिखाना होगा उसे अपने आप को प्राथमिकता देना ! सिर्फ़ जरूरतमंद की मदद करना और ऐसे हुक्मरानों के निठल्लेपन का कारण न बनना ! हाँ ! मुझे देखकर ही सीखेगी अब वह अपने अधिकारों का प्रयोजन करना ! अपना मूल्यांकन कर सबको अपना महत्व समझाना !

धरा का बदलाव :

बस एक ही दिन...एक ही दिन में घर में कोहराम मच गया । देवर देवरानी आकर चिढ़ने लगे कि कमरा ठीक-ठाक तक नहीं किया है । आये हैं तो ना चाय ना नाश्ता...! कोई पूछ भी नहीं रहा । 

सासूमाँ बोली आज तो मेरे बगैर माँगे चाय तक नसीब नहीं हुई। पानी वगैरह की क्या उम्मीद करूँ । महारानी बस अपने ससुरजी की सेवा कर लापता हो गयी, सास के लिए तो जैसे इसके कोई फर्ज ही नहीं ।

आकाश की सवालिया और क्रोधित नजर को देख डरी सहमी और अपराधबोध महसूस करने वाली धरा आज इयरफोन लगा अपने में मस्त , आसन बिछाकर योगाभ्यास करने में व्यस्त ! 

बच्चे कुछ डरे सहमें से कोने से झाँक रहे  । आकाश का पारा सातवें आसमान पर था । एक झटके में उसके कानों से इयरफोन खींच गुस्से में हाँफते चिल्लाते हुए बोला, " ये क्या हो रहा है ? दिमाग तो ठीक है तुम्हारा" ?

हाथ से रुकने का इशारा कर आसन से पूर्ववत हो, उसने गम्भीर स्वर में कहा,  "शान्त हो जाइए ! गुस्सा करना ठीक नहीं !  जाकर फ्रैश होइए ! मैं आपकी चाय लाती हूँ" ।

आज उसका रुख देख आकाश का सारा गुस्सा फुर्र हो गया , उसके चेहरे के तेज और आत्मविश्वास से आकाश की नजरें झुक गयी । कदाचित पहली बार देखा था उसने धरा का यह रूप । नहीं समझ पा रहा था कि ऐसा क्या हो गया, जो उसमें कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं रही ।

इधर आकाश की चुप्पी देख पूरे घर में सन्नाटा छा गया।सासूमाँ जो कान लगाए बैठी थी कि आज तो उनके मन की होगी । वह भी असमंजस में पड़ गयी । कुछ बोलना तो दूर बेटा आज चीजों की उठापटक भी नहीं कर रहा।

योगाभ्यास पूरा कर धरा ने चाय बनाई कुछ स्नैक्स के साथ कप ट्रै में सजाकर टेबल पर रख आवाज दी कि सभी अपनी चाय ले लें,  मैं किसी के कमरे में चाय नहीं लाउँगी । और वह बच्चों के लिए दूध एवं ससुरजी के लिए चाय लेकर चली गयी  ।

सासूमाँ भी कराहते हुए चाय पीने पहुँच गयी उसने चुपके से देखा तो बहुत खुश हुई देखकर कि सभी एक साथ एक ही कमरे में बैठे चाय नाश्ता कर रहे हैं । हाँ ! मन मे तूफान तो घुमड़ रहे हैं सबके । बस आकाश की क्रोधाग्नि जो ठंडी पड़ी है , वरना तो....

वह खुद भी हैरान थी कि अपने इसी परिवार से वह इतने सालों से डरी सहमी और दुखी रही !  

हैरान थी अवचेतन मन की दृढ़ संकल्प शक्ति से ! हैरान थी कि कैसे सिर्फ़ सोच बदलने भर से काफी कुछ बदल रहा है । सोच रही थी कि अपनी स्थिति के लिए तो वह खुद ही कितने हद तक जिम्मेदार थी !

बस अब तो रोज का सिलसिला था । पीठ पीछे खुसर-फुसर । पर आश्चर्य ये था कि सामने बोलने की हिम्मत नहीं कर रहे थे कोई । सासूमाँ भी अब दबी आवाज में बड़बड़ाती तो आकाश भी अपने गुस्सा जताने के पुराने नुख्सों को बारी -बारी से आजमाकर जैसे फेल हो चुका था । 

जब परिवार को सच समझ आया :

शायद इसीलिए उसने आज प्यार का सहारा लेकर अपनी बात कहने की सोची । उसकी बात शांति से सुन धरा अपने बहते आँसुओंं को पोंछकर भावनाओं को नियंत्रित कर बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ उसे बच्चों के कमरे में ले गयी । जहाँ बेटा उछलकूद कर खेलते हुए बेटी की पढाई में बाधा डाल रहा था और बेटी परेशान होकर एक कोने मे जैसे-तैसे अपना होमवर्क कर रही थी ।

आकाश समझने की कोशिश में था कि धरा क्या दिखाना चाहती है तभी धरा ने बेटे से कहा कि आपके पापा को पानी चाहिए, जाओ ले आओ  ! तो बेटे ने फोरन दीदी की नोटबुक उठा ली जिसमें वह काम कर रही थी। और तुरंत बोला, " दीदी ! सुना नहीं पापा को पानी चाहिए" ! और फिर बेटी वही रोनी सी सूरत बना बिना ना-नुकर किए अनमने से पानी लेने चली गयी । आकाश को बेटे के ऐसे व्यवहार पर बहुत गुस्सा आया । वह बेटे को डाँटता तभी धरा ने उसे रोककर वापस अपने कमरे में चलने को कहा।

फिर बैठकर आराम से समझाते हुए बोली,  "बच्चे हमेशा बड़ों से सीखते हैं , बस यही देखकर और सोचकर मैं बदल रही हूँ। 

हाँ ! मैं बदल रही हूँ ताकि हमारे बच्चों की मानसिकता बदले , बेबजह किसी को दबाना, अधिकार जताना या दबकर अनमने से जीना गलत है । 

मैं नहीं चाहती कि हमारी बेटी कुण्ठित मानसिकता के साथ दुखी जीवन जिए । और बेटा निठल्ला बन दूसरों को ऑर्डर देने में अपनी शान समझे" । 

आकाश भी सब समझ चुका था, उसके लिए ना भी सही तो अपने बच्चों के लिए उसे समझना ही पड़ा। अपनों के खातिर ये बदलाव जरूरी जो था ।

कहानी से सीख -

दूसरों का ख्याल रखना एक सुंदर गुण है,
लेकिन स्वयं को पूरी तरह मिटा देना नहीं।

बच्चे वही नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं,
बल्कि वे वही सीखते हैं जो हमें जीते हुए देखते हैं।

इसलिए अपने आत्मसम्मान, मानसिक शांति और खुशियों को महत्व देना भी उतना ही आवश्यक है।

क्योंकि जब एक माँ खुद की पहचान बचाती है,
तभी वह अपनी बेटी को भी सम्मान के साथ जीना सिखा पाती है।



पढ़िए रूढिवादी सोच एवं बदलाव से सम्बंधित एक और कहानी एवं लघुकथा निम्न लिंक्स पर -

●   असर 

● आत्महत्या - "माँ मेरी भी सुन लिया करो कभी"



टिप्पणियाँ

  1. सुधा दी, हर इंसान को और उसमें भी महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। बहुत ही सुंदर शिक्षाप्रद कहानी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हृदयतल से धन्यवाद ज्योति जी ! आपने इतनी लम्बी कहानी पढ़ने के लिए समय निकाला, दिल से आभार आपका ।

      हटाएं

  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 15 फरवरी 2023 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
    अथ स्वागतम शुभ स्वागतम

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हृदयतल से धन्यवाद पम्मी जी !मेरी रचना चयन करने के लिए ।
      सादर आभार ।

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  3. जाने कितनी स्त्रियों के मन की बात आपने इस कहानी में बड़ी खूबसूरती से पिरो दिया, स्त्री की सहनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा का जब परिवार के सदस्य फायदा उठाने लगते है, तब धीरे धीरे स्त्री का आत्मविश्वास क्षीण हो जाता है, अपने अस्तित्व का महत्व वो कब कम कर देती है, उसे खुद ही नहीं अहसास होता है।
    बहुत ही जरूरी और प्रेरक कहानी, हर स्त्री के लिए।

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    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार जिज्ञासा जी ! इतनी लम्बी कहानी को अपना कीमती समय देकर पढ़ने एवं अपनी अनमोल प्रतिक्रिया से इसे सार्थक बनाने हेतु ।

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  4. बड़ी खूबसूरती से पिरोई शिक्षाप्रद, सार्थक एवं ज्ञानबर्धक कहानी

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    उत्तर
    1. हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार मनोज जी !
      आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ ।

      हटाएं
  5. उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद आ.आलोक जी !
      बहुत दिनों बाद आपका शुभागमन एवं आशीर्वचन पाकर बहुत प्रसन्नता हुई ।
      सादर आभार ।
      🙏🙏

      हटाएं
  6. उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद आ.अजितेन्दु जी !
      ब्लॉग पर आपका स्वागत है ।

      हटाएं
  7. बहुत ही अच्छी और प्रेरक कहानी है यह सुधाजी आपकी। पढ़कर एक सकारात्मक अनुभूति हुई।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद आदरणीय जितेंद्र जी !
      सादर आभार ।

      हटाएं

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