धन्य हुए योगिराज, बनाई पावन मूरत| राम भक्ति पर कुण्डलिया छंद
परिचय अयोध्या में श्रीराम के विराजने की भावभूमि और रामभक्ति से उपजे भावों ने इस कुण्डलिया छंद को जन्म दिया। श्रीराम की मनोहारी छवि और भक्तिभाव को शब्दों में पिरोने का यह मेरा एक प्रयास है। रचना में राम की सुंदर मूरत के साथ निष्काम कर्म और हृदय में राम के वास की भावना को भी स्वर देने का प्रयास किया है। चित्र साभार 'गूगल' से मूरत अद्भुत राम की, श्यामल सुन्दर रुप । स्मित अधर सरसिज नयन,शोभा अतुल अनूप । शोभा अतुल अनूप , वसन पीतांबर सोहे । गल भूषण बनमाल, छवि आलोक मनमोहे । निरखि सुधा सुध भूलि, मनोहर श्यामल सूरत। धन्य हुए योगिराज, बनाई पावन मूरत । ******************** राम विराजे अवधपुरी, मची देश में धूम । राम राम जपते सभी, नाच रहे हैं झूम । नाच रहे हैं झूम, लगी गणतंत्र में झाँकी । राम हि बस देखें सुने, भक्ति राम की आँकी । कहे सुधा सुन मीत,भक्ति का डंका बाजे । कर्म करें निष्काम, हृदय में राम विराजे । निष्कर्ष...