मैं जो गई बाहर ( हिंदी कविता)
मैं जो गई बाहर, स्त्री मन की अनुभूति "यह एक भावनात्मक हिंदी कविता है जिसमें स्त्री के मन, घर से दूर जाने और जीवन में आए सूक्ष्म बदलावों को सुंदर रूप से व्यक्त किया गया है।" चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया । घर का आँगन, आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में, फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. ...

तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी मेरी इतनी पुरानी रचना साझा करने हेतु ।
जवाब देंहटाएंबच्चों को प्रेरणा देता शब्द शब्द ।
जवाब देंहटाएंसंस्कारों और देशप्रेम का सुंदर आह्वान।
प्रेरक बाल गीत।
हार्दिक धन्यवाद जवं आभार आ.कुसुम जी !
हटाएंबच्चों को बहुत ही प्रेरक उद्बोधन प्रिय सुधा जी।यदि राष्ट्र के भावी कर्णधार देश हित के लिए प्रयास करें तो ही वे सच्चे भारतीय कहलाने लायक हैं।
जवाब देंहटाएंजी, अत्यंत आभार आपका ।
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