गुस्सा क्यों हो सूरज दादा | गर्मी पर कविता

परिचय :-

आज बढ़ती गर्मी, सूखती नदियाँ और तपती धरती हर जीव-जंतु को प्रभावित कर रही हैं। प्रस्तुत कविता “गुस्सा क्यों हो सूरज दादा!” प्रकृति की इसी वेदना को सरल, भावपूर्ण और संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है। यह कविता केवल सूरज से शिकायत नहीं बल्कि धरती, जल और जीवन को बचाने की एक विनम्र पुकार भी है।

भीषण गर्मी में तपती धरती और लाल सूरज दर्शाती हिंदी कविता की चित्रात्मक प्रस्तुति



गुस्सा क्यों हो सूरज दादा !

आग उगलते हद से ज्यादा !

लू की लपटें फेंक रहे हो ,

आतप अवनी देख रहे हो ।


छाँव भी डरकर कोने बैठी,

रश्मि तपिश दे तनकर ऐंठी ।

बदरा जाने कहाँ खो गये,

पर्णहीन सब वृक्ष हो गये ।


माँ धरती भी दुःखी रो रही,

दया आपकी कहाँ खो गयी ?

जल, जलकर बस रेत बची है ।

अग्निकुंड सी वो भी तची है !


दीन-दुखी को और दुखाते !

नीर नदी का भी क्यों सुखाते ?

मेरी मानो सूरज दादा !

मत त्यागो निज नेक इरादा ।


सूर्य देव हो तुम जगती के !

अर्ध्य देते जल सब भक्ति से ।

जीव-जगत के हो रखवारे

वन्य वनस्पति तुमसे सारे ।


क्यों गुस्से में लाल हो रहे

दीन-हीन के काल हो रहे ।

इतना भी क्यों गरमाए हो ?

दिनचर्या से उकताये हो ?


कुछ दिन छुट्टी पर हो आओ !

शीत समन्दर तनिक नहाओ !

करुणाकर ! करुणा अब कर दो !

तप्त अवनि का आतप हर दो !


निष्कर्ष :-

यह कविता हमें प्रकृति के संतुलन और करुणा का महत्व समझाती है। सूरज जीवनदाता हैं, लेकिन अत्यधिक ताप धरती और जीव-जगत के लिए कष्टकारी बन जाता है। संदेश यही है कि प्रकृति का संतुलन बना रहे ताकि धरती पर जीवन मुस्कुराता रहे।


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✨धन्यवाद🙏

पढ़िए सूरज दादा पर मेरी एक और रचना

● कहाँ गये तुम सूरज दादा !


टिप्पणियाँ

  1. क्या करेंगे सूरज दादा,मानवों की स्वार्थपरता से व्यथित हैं,
    दंड तो देने का है इरादा,प्रकृति का हाल देख शायद द्रवित हैं।
    प्रकृति के उग्र रूप का बहुत सुंदर, सरल,निश्छल अभिव्यक्ति दी
    सस्नेह प्रणाम
    सादर
    ---
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ मई २०२४ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर रचना।

    जवाब देंहटाएं

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