खामोशी जो सब कह गई | अनकही भावनाओं की भावुक हिंदी कहानी
प्रस्तावना (Introduction) "शब्दों की एक सीमा होती है, पर संवेदनाएँ असीम हैं।" अक्सर हमें लगता है कि मन की उलझनों को शब्दों के धागे में पिरोकर बाहर निकाल देने से हृदय का बोझ कम हो जाएगा। हम सोचते हैं कि कह देने से मन खाली हो जाएगा। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होता है ? कभी-कभी शब्द उस गुबार को केवल हवा देते हैं, और पीछे छूट जाती है एक भारी खामोशी । यह कहानी है एक ऐसी ही संध्या की, जहाँ डूबते सूरज की लाली और बादलों की विरल परतों के बीच एक स्त्री अपने अंतर्मन की गठरी खोलती है। वह बोलती तो है, पर पाती है कि आँसू फिर भी थम नहीं रहे। यह रचना 'कह देने' और 'महसूस करने' के बीच के उस सूक्ष्म अंतर को उकेरती है, जहाँ अंततः उसे समझ आता है कि पूर्णता शब्दों में नहीं, बल्कि स्वयं की खामोशी और वर्तमान स्थिति को स्वीकार करने में है । संध्या की धुंधलाती बेला वह छत के कोने में खामोश खड़ी थी। उसकी निगाहें दूर क्षितिज में कहीं खोई हुई थीं, मानो अपनी उमड़ती भावनाओं का कोई सिरा खोज रही हो। आकाश पर बादलों की विरल परतें, दिनभर के अनकहे भावों को समेटे धीरे-धीरे तैर रही थीं। डूबते सूरज...

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 27 जुलाई 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद आ.यशोदा जी मेरी रचना को मुखरित मौन के मंच पर स्थान देने हेतु।
हटाएंसादर आभार।
रिश्तों का ऐसा क्यो़ होता ताना-बाना
जवाब देंहटाएंसाथ चलते है लगते मगर अजनबी अनजाना।
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सुंदर भावपूर्ण सृजन प्रिय सुधा जी।
सस्नेह।
बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ श्वेता जी!
हटाएंसहृदय धन्यवाद एवं आभार आपका।
रिश्तों ने भी बदलते समय में अपना चेहरा बदला है। भौतिकता के आगे प्रेम प्यार गौण होकर रह गए हैं। रिश्तों पर गहनता से पड़ताल करतीं रचना प्रिय सुधा जी। जिन्होंने रिश्ते नातों का उत्कर्ष देख रखा हो उनके लिए ये पतन किसी सदमे से कम नहीं। पर क्या करें हर जगह यही हो रहा है।
जवाब देंहटाएंसारगर्भित प्रतिक्रिया द्वारा प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार रेणु जी!
हटाएंजीवन के कुछ सच ऐसे भी होते हैं। सही कहा आपने। दिल को छू लिया।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद आ.विश्वमोहन जी!
हटाएंरिश्तों में स्वार्थ के आ जाना ही दुखदायी है ।
जवाब देंहटाएंभौतिक साधनों के पीछे भागते भागते रिश्तों की अहमियत को खो देते हैं । विचारणीय रचना ।
तहेदिल से धन्यवाद आ.संगीता जी! आपकी सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया हमेशा उत्साह द्विगुणित कर देती है।
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