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हौले से कदम बढ़ाए जा...

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अस्मत से खेलती दुनिया में चुप छुप अस्तित्व बनाये जा आ मेरी लाडो छुपके मेरे पीछे हौले से कदम बढ़ाये जा..... छोड़ दे अपनी ओढ़नी चुनरी, लाज शरम को ताक लगा बेटोंं सा वसन पहनाऊँ तुझको कोणों को अपने छुपाये जा आ मेरी लाडो छुपके मेरे पीछे  हौले से कदम बढ़ाए जा.... छोड़ दे बिंंदिया चूड़ी कंगना अखाड़ा बनाऊँ अब घर का अँगना कोमल नाजुक हाथों में अब  अस्त्र-शस्त्र पहनाए जा आ मेरी लाडो छुपके मेरे पीछे हौले से कदम बढ़ाए जा..... तब तक छुप-छुप चल मेरी लाडो जब तक तुझमेंं शक्ति न आये आँखों से बरसे न जब तक शोले किलकारी से दुश्मन न थरथराये हर इक जतन से शक्ति बढ़ाकर फिर तू रूप दिखाए जा... आ मेरी लाडो छुपके मेरे पीछे हौले से कदम बढाए जा....।। रक्तबीज की इस दुनिया में रक्तपान कर शक्ति बढ़ा चण्ड-मुण्ड भी पनप न पायेंं ऐसी लीला-खेल रचा   आ मेरी लाडो छुपके मेरे पीछे हौले से कदम बढ़ाए जा..... रणचण्डी दुर्गा बन काली ब्रह्माणी,इन्द्राणी, शिवा.... अब अम्बे के रूपोंं में आकर  डरी सी धरा का डर तू भगा आ मेरी लाडो छुपके मेरे पीछे  ...

लावारिस : "टाइगर तो क्या आज कुत्ता भी न रहा"

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हैलो शेरू ! बडे़ दिनों बाद दिखाई दिया,कहाँ व्यस्त था यार ! आजकल ?  (डॉगी टाइगर ने डॉगी शेरू के पास जाकर बड़ी आत्मीयता से पूछा) तो शेरू खिसियाते हुए पीछे हटा और बुदबुदाते हुए बोला; ओह्हो!फँस गया... अरे यार !  परे हट !  मालकिन ने देख लिया तो मेरी खैर नहीं ,  यूँ गली के कुत्तों से मेरा बात करना मालकिन को बिल्कुल नहीं भाता ,  मेरी बैण्ड बजवायेगा क्या ?.. टाइगर  -  "अरे शेरू! मैं कोई गली का कुत्ता नहीं ! अबे यार ! तूने मुझे पहचाना नहीं  ?  मैं 'टाइगर' तेरे मालिक के दोस्त वर्मा जी का टाइगर ! शेरू (आश्चर्य चकित होकर) -- टाइगर ! अरे ! ये तेरी क्या दशा हो गयी है यार !  कितना कमजोर हो गया है तू  !  मैं तो क्या तुझे तो कोई भी नहीं पहचान पायेगा ।क्या हुआ यार ! बीमार है क्या ?  इलाज-विलाज नहीं करवाया क्या तेरे मालिक ने ?  डींगें तो बड़ी-बड़ी हांकता है तेरा मालिक !  ओह ! माफ करना यार ! अपने मालिक के बारे में सुनकर गुस्सा आ रहा होगा,  हैं न !  मुझे भी आता है  , क्या करे ? वफादार प्राणी जो होते हैं हम कु...

अधूरी उड़ान

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एक थी परी हौसला और उम्मीदों के मजबूत पंखों से उड़ने को बेताब कर जमाने से बगावत पढ़कर जीते कई खिताब विद्यालय भी था सुदूर पैदल चलती रोज मीलों दूर अकेले भी निर्भय होकर वीरान जंगली,ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी राहों पर खूंखार जंगली जानवर भी जैसे साथी बन गये थे उसके हर विघ्न और बाधाएं जैसे हार गयी थी उससे कदम कदम की सफलता पाकर पंख उसके मजबूत बन गये उड़ान की प्रकिया के लिए पायी डिग्रियां सबूत बन गये एक अनोखा व्यक्तित्व लिए आत्मविश्वास से भरपूर बढ़ रही थी अनवरत आगे कि मंजिल अब नहीं सुदूर तभी अचानक कदम उसके उलझकर जमीं पर लुढ़क गये सम्भलकर देखा उसने हाय! आँखों से आँसू छलक गये आरक्षण रूपी बेड़ियों ने जकड़ लिए थे बढ़ते कदम उड़ान भरने को आतुर पंखों ने फड़फड़ तड़प कर तोड़ा दम।।                चित्र;साभार गूगल से...

जब साधन स्वामी बन बैठा – मोबाइल की लत पर हिंदी कविता कविता

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परिचय  मोबाइल फोन आज हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। संवाद, शिक्षा, काम और मनोरंजन जैसे अनेक कार्य अब उसी के माध्यम से पूरे हो जाते हैं। समस्या मोबाइल के होने में नहीं, बल्कि उसके असीमित और असंयमित उपयोग में है। जब एक साधन धीरे-धीरे हमारा समय, हमारा ध्यान और हमारे रिश्ते नियंत्रित करने लगे, तब वह सुविधा नहीं, आदत बन जाता है। "जब साधन स्वामी बन बैठा" कविता इसी बदलती जीवनशैली का संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करती है। यह कविता केवल मोबाइल की लत की बात नहीं करती, बल्कि उन अनमोल रिश्तों, संवादों, बचपन की सहजता और मानवीय आत्मीयता की ओर भी ध्यान दिलाती है, जो अनजाने में डिजिटल दुनिया की चमक के पीछे छूटते जा रहे हैं। वो तो पुरानी बातें थी जब तन्हाई  से डरते थे । अपना कोई साथ रहे सब ऐसा सोचा करते थे । टीवी, रेडियो, गपशप, बातें,  करते  दिन ढल जाता था । हँस लेते थे जब अपनों संग,  हर कष्ट बड़ा टल जाता था । फिर एक दिन तेरे आने से,   बदला जीने का अंदाज़ । अब अपने हर पल पर यारों इस छोटी स्क्रीन का राज । ऐसी लत लगी तेरी कि सबकुछ पीछे छूट गया । घर आँगन और अपनो...

सुख-दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो....

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जाने क्या मुझसे खता हो गयी ? यूँ लग रहा माँ खफा हो गई... माँ की कृपा बिन जीवन में मेरी देखो तो क्या दुर्दशा हो गयी...... माँ! माफ कर दो, अब मान जाओ इक बार मुझ पर कृपा तो बनाओ कृपा बिन तो मेरी उजड़ी सी दुनिया माँ ! बर्बाद होने से मुझको बचाओ..... माँ! तेरे आँचल के साया तले तो चिलमिलाती लू भी मुझे छू न पायी तेरी ओट रहकर तो तूफान से भी, निडर हो के माँ मैंने नजरें मिलाई..... तेरे साथ बिन मेरा,  मन डर रहा माँ ! तन्हा सा जीवन, भय लग रहा माँ ! दिव्य ज्योति से मन के अंधेरे मिटा दो, शरण में हूँ माँ मैं ,चरण में जगह दो...... ना मैं जोग जानूँ न ही तप मैं जानूँ नियम भी न जानूँ, न संयम मैं जानूँ पाप-पुण्य हैं क्या, धर्म-कर्म कैसे ? सुख -दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो.... गुमराह हूँ मैंं, माँ सही राह ला दो, भंवर में है नैया, पार माँ लगा दो... तुम बिन नहीं मेरा,कोई सहारा माँ मूरख हूँ, अवगुण मेरे तुम भुला दो... खता माफ कर दो,माँ मान जाओ, विश्वास भक्ति का, मेरे मन में जगाओ.... भंवर में है नैया, पार माँ लगा लो... सुख-दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो...   ...

ऐ वसंत! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो ....

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                     चित्र : साभार Shutterstock से ऐ रितुराज वसंत ! तुम तो बहुत खुशनुमा हो न !!! आते ही धरा में रंगीनियां जो बिखेर देते हो ! बिसरकर बीती सारी आपदाएं  खिलती -मुस्कराती है प्रकृति, मन बदल देते हो, सुनो न ! अब की कुछ तो नया कर दो ! ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो। हैं जो दुखियारे, जीते मारे -मारे कुछ उनकी भी सुन लो, कुछ दुख तुम ही हर लो, पतझड़ से झड़ जायें उनके दुख,कोंपल सुख की दे दो ! ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो । तेरे रंगीन नजारे, आँखों को तो भाते हैं । पर  लब ज्यों ही खिलते हैं, आँसू भी टपक जाते हैं, अधरों की रूठी मुस्कानो को हंसने की वजह दे दो ! ऐ वसंत! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो । तेरी ये शीतल बयार, जख्मों को न भाती है भूले बिसरे घावों की,पपड़ी उड़ जाती है, उन घावों पर मलने को, कोई मलहम दे दो ! ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो । तरसते है जो भूखे, दो जून की रोटी को मधुमास आये या जाये, क्या जाने वे तुझको, आने वाले कल की,उम्मीद नयी दे दो ! ऐ वसंत !...

इम्तिहान - "जिन्दगी का "

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उम्मीदें जब टूट कर बिखर जाती है, अरमान दम तोड़ते यूँ ही अंधेरों में । कंटीली राहों पर आगे बढ़े तो कैसे ? शून्य पर सारी आशाएं सिमट जाती हैं । विश्वास भी स्वयं से खो जाता है, निराशा के अंधेरे में मन भटकता है। जायें तो कहाँ  लगे हर छोर बेगाना सा , जिन्दगी भी तब स्वयं से रूठ जाती है। तरसती निगाहें  सहारे की तलाश में , आकर सम्भाले कोई ऐसा अजीज चाहते हैं । कौन वक्त गँवाता है , टूटे को जोड़ने में बेरुखी अपनों की और भी तन्हा कर जाती है । बस यही पल अपना इम्तिहान होता है .... कोई सह जाता है , कोई बैठे रोता है । बिखरकर भी जो निखरना चाहते है.... वे ही उस असीम का आशीष पाते हैं । उस पल जो बाँध लें, खुद को अपने में इक ज्योत नजर आती मन के अँधेरे में.... हौसला रखकर मन में जो आशा जगाते हैं, इक नया अध्याय तब जीवन में पाते हैं ।।                 चित्र : साभार Shutterstock से...

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