आओ बच्चों ! अबकी बारी होली अलग मनाते हैं

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  आओ बच्चों ! अबकी बारी  होली अलग मनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । ऊँच नीच का भेद भुला हम टोली संग उन्हें भी लें मित्र बनाकर उनसे खेलें रंग गुलाल उन्हें भी दें  छुप-छुप कातर झाँक रहे जो साथ उन्हें भी मिलाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पिचकारी की बौछारों संग सब ओर उमंगें छायी हैं खुशियों के रंगों से रंगी यें प्रेम तरंगे भायी हैं। ढ़ोल मंजीरे की तानों संग  सबको साथ नचाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । आज रंगों में रंगकर बच्चों हो जायें सब एक समान भेदभाव को सहज मिटाता रंगो का यह मंगलगान मन की कड़वाहट को भूलें मिलकर खुशी मनाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । गुझिया मठरी चिप्स पकौड़े पीयें साथ मे ठंडाई होली पर्व सिखाता हमको सदा जीतती अच्छाई राग-द्वेष, मद-मत्सर छोड़े नेकी अब अपनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पढ़िए  एक और रचना इसी ब्लॉग पर ●  बच्चों के मन से

कटता नहीं बक्त, अब नीड़ भी रिक्त

 

Bied Nest

वो मंजिल को अपनी निकलने लगे हैं,

कदम चार माँ-बाप भी संग चले हैं ।


बीती उमर के अनुभव बताकर

आशीष में हाथ बढ़ने लगे हैं ।


सुबह शाम हर पल फिकर में उन्हीं की

अतीती सफर याद करने लगे ह़ै ।


सफलता से उनकी खुश तो बहुत हैं

मगर दूरियों से मचलने लगे हैं ।


राहें सुगम हों जीवन सफर की

दुआएं सुबह शाम करने लगे हैं ।


मंदिम लगे जब कभी नूर उनका

अर्चन में प्रभु पे बिगड़ने लगे हैं ।


कटता नहीं वक्त,अब नीड़ भी रिक्त

परिंदे जो 'पर' खोल उड़ने लगे हैं ।


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पढ़िए एक और गजल इसी ब्लॉग पर

● सफर ख्वाहिशों का थमा धीरे-धीरे



टिप्पणियाँ

  1. पंछी उड़ ही जाते हैं नीड़ सूना करके
    मुट्ठीभर देकर खुशियाँ यादें दूना करके
    ----
    क्या कहें महसूस कर सकते हैं आपकी विह्वलता, भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी।
    सस्नेह प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. शब्दों के बहुत सुंदर मोती पिरोए हैं,मन की विह्वलता को दर्शाती बहुत सुन्दर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  4. सफलता से उनकी खुश तो बहुत हैं
    मगर दूरियों से मचलने लगे हैं ।

    सुंदर... प्रासंगिक विषय पर लिखी गयी ग़ज़ल...

    जवाब देंहटाएं
  5. माँ बाप के महत्त्व को भूल जाते हैं हम लोग अक्सर ...
    आपने बाखूबी हर पंक्ति में इस को बताने का प्रयास किया है ...

    जवाब देंहटाएं
  6. कटता नहीं वक्त,अब नीड़ भी रिक्त
    परिंदे जो 'पर' खोल उड़ने लगे हैं ।//
    हर घर से पलायन कर रहे घर के चिरागों पर मर्मांतक रचना प्रिय सुधा! मैं इस वेदना को तीन चार सालों से झेल रही सखी! ये खाली नीड़ डराने लगे है! आँखे नम कर गई ये रचना 😞

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