मैं जो गई बाहर
चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया । घर का आँगन, आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में, फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन, मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. बहुत कुछ बदल गया । हाँ ! नवीन स्फूर्ति आई । पर ये स्फूर्ति भी तो जैसे वसंत की असमय आँधी — जो पुष्पों को महकाती कम, और बिखेरती अधिक है। और स्थिरता - वह तो मानो शरद की निस्तब्ध चाँद...

वाह! बहुत सुन्दर 🙏
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद अंकित जी!
हटाएंBahut umda Ghzal hai. Hindi ghazal ka alag hee awwal sthan hai. Waah Jee!
हटाएंजी,अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आपका।आदरणीय श्रीधर जी!
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।
🌺🌺🙏🙏🌺🌺
हटाएंअत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.श्रीधर जी !
हटाएंवाह!क्या बात है ,सुधा जी ,बेहतरीन !
जवाब देंहटाएंबिखरना नहीं अब निखरना है यारा
कनक सा अगन में तो तपना ही होगा ।
बहुत खूब!
तहेदिल से धन्यवाद शुभा जी!
हटाएंवाह ..... हर हाल में जीवन की जंग से जूझने को प्रेरित करती रचना ।
जवाब देंहटाएंबिखरना नहीं अब निखरना है 'यारा'
कनक सा अगन में तो तपना होगा ।।
लाजवाब ।
तहेदिल से धन्यवाद आ.संगीता जी!
हटाएंप्रिय अनीता जी मेरी रचना चर्चा मंच पर साझा करने हेतु तहेदिल से धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना शुक्रवार 3 दिसंबर २०२१ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
हृदयतल से धन्यवाद प्रिय श्वेता जी मेरी रचना को पाँच लिंको के आनंद मंच पर साझा करने हेतु।
हटाएंबेहतरीन अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आ.भारती जी!
हटाएंलाजवाब सृजन
जवाब देंहटाएंबेहतरीन सृजन
जवाब देंहटाएंबिखरना नहीं अब निखरना है 'यारा'
आभार..
सादर..
हार्दिक धन्यवाद आ.यशोदा जी!
हटाएंबेहतरीन सृजन
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आ.अनीता जी!
हटाएंबिखरने से निखरने को प्रेरित करता सुंदर आशावादी काव्य सुधा जी आपकी लेखनी को सलाम बहुत उम्दा भाव बहुत उम्दा कथन ।
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद आ.कुसुम जी!
हटाएंरो-रो के काटें , खुशी से बिताएं
जवाब देंहटाएंहै जंग जीवन,तो लड़ना ही होगा
वाह क्या बात कही है एक एक पंक्ति बहुत ही शानदार है
जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए हिम्मत को बांधती हुई
बहुत ही ऊर्जावान रचना!
हृदयतल से धन्यवाद प्रिय मनीषा जी!
हटाएंबिखरना नहीं अब निखरना है 'यारा'
जवाब देंहटाएंकनक सा अगन में तो तपना होगा ।।
वाह !! बहुत खूब !!
बेहतरीन भावों से सजी सुन्दर कृति ।
हार्दिक धन्यवाद मीना जी!
हटाएंबहुत बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आ.आलोक जी!
हटाएंबिखरना नहीं अब निखरना है 'यारा'
जवाब देंहटाएंकनक सा अगन में तो तपना होगा ।।.. आशा का संचार करती सुंदर उत्कृष्ट रचना ।बहुत शुभकामनाएं सुधा जी ।
तहेदिल से धन्यवाद जिज्ञासा जी!
हटाएंरो-रो के काटें, खुशी से बिताएं; है जंग जीवन,तो लड़ना ही होगा। क़लम चाहे कम चले मगर जब चले तो ऐसी ही पैनी होनी चाहिए सुधा जी। आपकी इस ग़ज़ल को 'गागर में सागर' कहा जा सकता है।
जवाब देंहटाएंआपकी सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया हमेशा उत्साह द्विगुणित कर देती है जितेन्द्र जी!
हटाएंतहेदिल से धन्यवाद आपका।
जीवन के प्रति सकारात्मक सोच दर्शाती सुंदर रचना, सुधा दी।
जवाब देंहटाएंसहृदय आभार एवं धन्यवाद ज्योति जी!
हटाएंBahut Umda Ghazal. Waah.
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आपका।
हटाएंसादर आभार।
वेहतरीन रचना।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार आपका।
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।