मैं जो गई बाहर ( हिंदी कविता)

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मैं जो गई बाहर, स्त्री मन की अनुभूति  "यह एक भावनात्मक हिंदी कविता है जिसमें स्त्री के मन, घर से दूर जाने और जीवन में आए सूक्ष्म बदलावों को सुंदर रूप से व्यक्त किया गया है।" चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया  मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी  । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया  । घर का आँगन,  आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में,  फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया  मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब  वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. ...

व्रती रह पूजन करते

कुण्डलिया छंद



Godprayer
चित्र : साभार pixabay से......



{1}

 बदली में छुपते फिरे, सावन मास मयंक।

दर्शन को मचले धरा, गगन समेटे अंक ।

गगन समेटे अंक , बहुत  ही लाड-लड़ाये।

भादो बरसे मेघ, कौन अब तुम्हें छुपाये।

कहे धरा मुस्काय, शरद में मत छुप जाना।

व्रती निहारे चाँद, प्रेमरस तुम बरसाना ।।


                         {2}

नवराते में गूँजते, माँ के भजन संगीत ।

जयकारे करते सभी,  माँ से जिनको प्रीत।

माँ से जिनको प्रीत, व्रती रह पूजन करते।

पा माँ का आशीष, कष्ट जीवन के हरते।

कहे सुधा करजोरि, करो माँ के जगराते।

हो जीवन भयमुक्त, सफल जिनके नवराते।


व्रती -- उपवासी



पढिए, माता की भक्ति पर एक और रचना निम्न लिंक पर

● विधना की लिखी तकदीर बदलते हो तुम

टिप्पणियाँ

  1. वाह ! नवरात्रि व्रत को सार्थक करती सुंदर भावभरी कुंडलियाँ, नवरात्रि के पवन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई सुधा जी 💐💐

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    1. तहेदिल से धन्यवाद जिज्ञासा जी!
      आपको भी नवरात्रि पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

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  2. नवरात्रि की बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, सुधा दी।

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    1. हार्दिक धन्यवाद ज्योति जी!
      नवरात्रि की अनंत शुभकामनाएं आपको।

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  3. उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद आदरणीय कैलाश जी!
      ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  4. उत्तर
    1. आपको भी नवरात्रि पर्व की अनंत शुभकामनाएं आ. प्रवीण जी!
      सादर आभार।

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  5. तहेदिल से धन्यवाद आ.यशोदा जी मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु।
    सादर आभार।

    जवाब देंहटाएं
  6. तहेदिल से धन्यवाद आ.आलोक जी !
    नवरात्रि पर्व की अनंत शुभकामनाएं आपको।

    जवाब देंहटाएं
  7. बदली में छुपते फिरे, सावन मास मयंक।
    दर्शन को मचले धरा, गगन समेटे अंक ।
    गगन समेटे अंक , बहुत ही लाड-लड़ाये।
    भादो बरसे मेघ, कौन अब तुम्हें छुपाये।
    कहे धरा मुस्काय, शरद में मत छुप जाना।
    व्रती निहारे चाँद, प्रेमरस तुम बरसा

    बहुत ही सुंदर प्रस्तुति ✨✨😍

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    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार प्रिय मनीषा जी!

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  8. नवरात्रि पर बहुत ही सुंदर शब्द भाव।

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  9. नवराते में गूँजते, माँ के भजन संगीत ।
    जयकारे करते सभी, माँ से जिनको प्रीत।
    नवरात्रि का संदेश देती सुंदर पंक्तियां!--ब्रजेंद्रनाथ

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    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आदरणीय!
      ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

      हटाएं

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