परित्यक्ता नहीं..परित्यक्त | पति की बेवफाई और सास ससुर का साथ - हिन्दी कहानी
परिचय क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिए सब कुछ सहती रहे क्योंकि उसके पास मायके से विदा लेने बाद जाने के लिए कोई और ठिकाना नहीं है ? क्या प्रेम विवाह करने वाली स्त्री अपने ही रिश्तों में सबसे अधिक अकेली हो जाती है ? यह कहानी है सना की जिसे पति की बेवफाई ने तोड़ने की कोशिश की लेकिन उसके सास ससुर ने उसे परित्यक्ता नहीं बल्कि सम्मानित बेटी बनाकर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम कर दी पढ़िए रिश्तों विश्वासघात और स्वाभिमान की हृदयस्पर्शी हिंदी कहानी दिल्ली की हल्की ठंडी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्रॉइंग रूम के फर्श पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, लेकिन सना के मन में जैसे धूप का एक कतरा भी नहीं बचा था। पिछले कुछ महीनों से वह प्रतीक के व्यवहार में बदलाव साफ महसूस कर रही थी। देर रात तक मोबाइल पर मुस्कुराकर बातें करना, उसके आते ही स्क्रीन लॉक कर देना, छोटी-छोटी बातों पर झल्ला उठना—सब कुछ बदलता जा रहा था। "प्रतीक! आज बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग है... तुम भी चलोगे?" सना ने धीमे स्वर में पूछा। प्रतीक ने मोबाइल से नजर उठाए बिना कहा— "मुझसे क्यों पूछ रही हो? अपने काम खुद नहीं कर ...

जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (११ -०१ -२०२०) को "शब्द-सृजन"- ३ (चर्चा अंक - ३५७७) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
-अनीता सैनी
सहृदय धन्यवाद अनीता जी मेरी रचना साझा करने के लिए...
जवाब देंहटाएंसस्नेह आभार...।
उस पल जो बाँध लें, खुद को अपने में
जवाब देंहटाएंइक ज्योत नजर आती मन के अँधेरे में....
हौसला रखकर मन में जो आशा जगाते हैं,
इक नया अध्याय तब जीवन में पाते
बहुत खूब....., लाज़बाब सृजन सुधा जी
आभारी हूँ कामिनी जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका...
हटाएंउम्मीद और विश्वास दीप जलता रहे
जवाब देंहटाएंतम जीवन से मोम-सा पिघलता रहे
---
सुंदर सकारात्मक सृजन सुधा जी।
आभारी हूँ श्वेता जी!बहुत ही सुन्दर पंक्तियों से उत्साहवर्धन हेतु...
हटाएंसहृदय धन्यवाद आपका।
बस यही पल अपना इम्तिहान होता है ....
जवाब देंहटाएंकोई सह जाता है , कोई बैठे रोता है ।
बिखरकर भी जो निखरना चाहते है....
वे ही उस असीम का आशीष पाते हैं ।
बहुत सुंदर और सार्थक रचना सखी
आभारी हूँ सखी उत्साहवर्धन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद आपका...
हटाएंबस यही पल अपना इम्तिहान होता है ....
जवाब देंहटाएंकोई सह जाता है , कोई बैठे रोता है ।
बिखरकर भी जो निखरना चाहते है....
वे ही उस असीम का आशीष पाते हैं ।
सार्थक सामयिक लेखन
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आ.विभा जी!
हटाएंबस यही पल अपना इम्तिहान होता है ....
जवाब देंहटाएंकोई सह जाता है , कोई बैठे रोता है ।
बिखरकर भी जो निखरना चाहते है....
वे ही उस असीम का आशीष पाते हैं ।
सटीक लिखा है । ऐसे समय धीरज की ज़रूरत है ।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एशं आभार आ. संगीता जी!
हटाएं