जल संरक्षण पर कविता | पानी का करो संचय | मनहरण घनाक्षरी
कुछ घाव समय के साथ भर जाते हैं, पर कुछ ऐसे होते हैं जो हर दिन भीतर ही भीतर रिसते रहते हैं। जब घर की चौखट पर ही भय, अपमान और हिंसा अपना डेरा जमा लें, तब सबसे अधिक घायल वे मासूम मन होते हैं, जो अपने प्रियजनों को टूटते हुए देखते हैं। प्रस्तुत लघुकथा ऐसे ही एक बेटे की मूक वेदना और एक माँ की विवश चुप्पी की कहानी है।
"माँ! क्या आप पापा की ऐसी हरकत के बाद भी उन्हें उतना ही मानती हो?"
अपने और माँ के शरीर पर जगह-जगह पड़े चोट के निशान और सूजन की ओर इशारा करते हुए बेटे ने पूछा।
माँ की आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। वह बेटे के उन घावों को सहलाती रही, जो उसे बचाने की कोशिश में पिता की मार से लगे थे। उसके काँपते होंठ बहुत कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द जैसे भीतर ही दम तोड़ चुके थे।
बेटा कुछ पल माँ को देखता रहा, फिर धीमे स्वर में बोला—
"माँ! मैं अब बड़ा हो गया हूँ। आपकी चुप्पी का दर्द भी समझता हूँ और मेरी असहायता भी। जिस घर में माँ की इज़्ज़त सुरक्षित न हो, वहाँ बेटे का बचपन भी ज़िंदा नहीं रहता। आपके पति-परमेश्वर की इन हरकतों के विरोध में यदि कभी मेरी जुबान या हाथ उठ गए, तो शायद मैं आपकी नज़रों में ही अपराधी बन जाऊँ। इसलिए... मैं जा रहा हूँ।"
बेटा मुड़ा और दरवाज़े की ओर बढ़ गया।
माँ ने उसे रोकने के लिए हाथ तो बढ़ाया, पर वर्षों से सहमी हुई उसकी आवाज़ आज भी गले की दहलीज़ पार न कर सकी।
कभी-कभी एक घर को तोड़ने के लिए दीवारें गिराना नहीं पड़ता, केवल सम्मान और विश्वास का टूट जाना ही पर्याप्त होता है। रिश्ते प्रेम से जीवित रहते हैं, भय से नहीं। यह लघुकथा हमें सोचने का अवसर देती है कि मौन रहकर सहा गया अन्याय केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य को घायल कर देता है।
✨धन्यवाद🙏
पढ़िए एक और लघुकथा
● मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता हैं न !
मारपीट को सहन करना और एक हद्द के बाद भी सहन करना है गुनाह है.
जवाब देंहटाएंबहुत मार्मिक लघू कथा.
पधारें- तुम हो तो हूँ
हृदयस्पर्शी सृजन सुधा जी ।
जवाब देंहटाएंसमय और परिस्थितियों के साथ साथ घरेलू हिंसा के पहलू को उजागर करती बेहतरीन और हृदयस्पर्शी लघुकथा। बहुत बधाई प्रिय सखी।
जवाब देंहटाएं😢
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर भावपूर्ण हृदयस्पर्शी लघु कथा
जवाब देंहटाएं