गुरुवार, 21 जुलाई 2022

ज्यों घुमड़ते मेघ नभ में, तृषित धरणी रो रही



Cloudy sky and thirsty earth
चित्र साभार pixabay.com से


 मन विचारों का बवंडर

लेखनी चुप सो रही

ज्यों घुमड़ते मेघ नभ में 

तृषित धरणी रो रही


अति के मारे सबसे हारे

शरण भी किसकी निहारें

रक्त के प्यासों से कैसे

बचके निकलेंगें बेचारे

किसको किसकी है पड़ी

इंसानियत जब खो रही


हद हुई मतान्धता की

शब्द लेते जान हैं

कड़क रही हैं बिजलियाँ

किसपे गिरे क्या भान है

कौन थामें निरंकुशता

धारना जब सो रही


प्रसिद्धि की है लालसा 

सर पे है जुनून हावी

गीत गाता मंच गूँगा

पंगु मैराथन का धावी

लायकी बन के यूँ काहिल

बोझा गरीबी ढ़ो रही ।।






40 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मेघों और वर्षा की बात से ले कर आज के समय जो समाज में हो रहा है उस पर विचार करते हुए जो लिखनीं चली है बड़ी धारदार है । विचारणीय रचना ।

Sudha Devrani ने कहा…

जी, तहेदिल से धन्यवाद आपका रचना के मर्म तक पहुँचने हेतु।
सादर आभार ।

Satish Saxena ने कहा…

विशिष्टता है आपकी रचनाओं में , बधाई !

Meena Bhardwaj ने कहा…

उमड़ते मेघों के साथ सामाजिक परिस्थितियों का आकलन नवगीत को प्रभावी बना रहा है । गहन चिन्तन उभर कर आया है सृजन में । अति सुन्दर ।

Sudha Devrani ने कहा…

दिल से धन्यवाद मीना जी !
सस्नेह आभार ।

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.सतीश जी!

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २२ जुलाई २०२२ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 22 जुलाई 2022 को 'झूला डालें कहाँ आज हम, पेड़ कट गये बाग के' (चर्चा अंक 4498) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

Sudha Devrani ने कहा…

पाँच लिंको के आनंद मंच पर मेरी रचना साझा करने हेतु दिल से धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी !

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद आ. रविन्द्र जी मेरी रचना को चर्चा मंच पर साझा करने हेतु ।
सादर आभार ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (23-07-2022) को चर्चा मंच    "तृषित धरणी रो रही"  (चर्चा अंक 4499)     पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
-- 
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

आलोक सिन्हा ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर

कविता रावत ने कहा…

बरसते मेघों के बहाने आज का ऐसा कच्चा-चिठ्ठा जिसे दिखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है ..........

Jigyasa Singh ने कहा…

अति के मारे सबसे हारे
शरण भी किसकी निहारें
रक्त के प्यासों से कैसे
बचके निकलेंगें बेचारे
किसको किसकी है पड़ी
इंसानियत जब खो रही
बहुत सुंदर सराहनीय रचना ।बधाई ।

Bharti Das ने कहा…

बहुत सुंदर रचना

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता .नमस्ते

विष्णु बैरागी ने कहा…

बहुत सुन्‍दर।

बेनामी ने कहा…

उमड़ते मेघों के साथ वर्तमान स्थिति का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आपने, सुधा दी।

Abhilasha ने कहा…

यथार्थ परक सुंदर रचना

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.शास्त्री जी मेरी रचना को चर्चा मंच पर स्थान देने हेतु ।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.आलोक जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आ.कविता जी!

Sudha Devrani ने कहा…

दिल से धन्यवाद सखी !

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद भारती जी!

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद आपका 🙏🙏

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद आपका ।

Sudha Devrani ने कहा…

हृदयतल से धन्यवाद अभिलाषा जी !

Shalini kaushik ने कहा…

बहुत ही सुंदर

अनीता सैनी ने कहा…

मन विचारों का बवंडर
लेखनी चुप सो रही
ज्यों घुमड़ते मेघ नभ में
तृषित धरणी रो रही... मर्मस्पर्श सृजन।
बहुत ही सुंदर सराहनीय।
सादर

मन की वीणा ने कहा…

शानदार बिंबों से सुसज्जित सुंदर सृजन।
अभिनव व्यंजनाएं सुघड़ लेखनी।
बहुत बहुत सुंदर सुधा जी।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आपका ।

Sudha Devrani ने कहा…

सस्नेह आभार एवं धन्यवाद अनीता जी !

Sudha Devrani ने कहा…

तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.कुसुम जी !

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

किसको किसकी है पड़ी, इंसानियत जब खो रही। इस नग्न सत्य को निर्भीक होकर अभिव्यक्त करना भी आज के समय में (जिसमें हम जी रहे हैं) एक बड़ी बात ही है।

Sudha Devrani ने कहा…

अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.जितेन्द्र जी!

Gajendra Bhatt "हृदयेश" ने कहा…

विचारों का बवण्डर उठा दे- सच में ऐसी ही है रचना!
'गीत गाता मंच गूँगा

पंगु मैराथन का धावी

लायकी बन के यूँ काहिल

बोझा गरीबी ढ़ो रही ।।'- बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति सुधा जी!

Sudha Devrani ने कहा…

सादर आभार एवं धन्यवाद आ.सर!

Kamini Sinha ने कहा…

अति के मारे सबसे हारे

शरण भी किसकी निहारें

रक्त के प्यासों से कैसे

बचके निकलेंगें बेचारे

सही कहा आपने, बेहद मार्मिक सृजन सुधा जी 🙏

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी !

विश्वमोहन ने कहा…

बहुत ही सुंदर!

विश्वविदित हो भाषा

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