भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक
परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक— व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव, दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर । क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान, राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (३१-०५-२०२०) को शब्द-सृजन-२३ 'मानवता,इंसानीयत' (चर्चा अंक-३७१८) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
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अनीता सैनी
हार्दिक धन्यवाद अनीता जी मेरी रचना साझा करने हेतु।
हटाएंबहुत सुंदर सृजन सखी,सच मानव अगर अपनी दुर्बल भावनाओं पर जीत हासिल कर लें तो विश्व स्वर्ग बन जाए ।
जवाब देंहटाएंसुंदर भाव सार्थक चिंतन।
तहेदिल से धन्यवाद कुसुम जी! उत्साहवर्धन हेतु...
हटाएंसस्नेह आभार।
बहुत सुन्दर सृजन सुधा जी ! रचना में आपने मानव मन की कमजोरियों के साथ-साथ उनको दूर करने का मार्गदर्शन भी किया है । सकारात्मक चिन्तन युक्त रचना ।
जवाब देंहटाएंमन,बुद्धि,मानवता,ज्ञान और आत्मज्ञान पर सटीक एवं सार्थक अभिव्यक्ति। जीवन की दुरूहता को समझने के लिए भारतीय मनीषा में परिष्कृष्त ज्ञान का अक्षय भंडार है जिसे परिमार्जित करने की सतत प्रक्रिया अनवरत चलती रहे।
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