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मैं जो गई बाहर ( हिंदी कविता)

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मैं जो गई बाहर, स्त्री मन की अनुभूति  "यह एक भावनात्मक हिंदी कविता है जिसमें स्त्री के मन, घर से दूर जाने और जीवन में आए सूक्ष्म बदलावों को सुंदर रूप से व्यक्त किया गया है।" चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया  मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी  । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया  । घर का आँगन,  आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में,  फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया  मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब  वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. ...

और एक साल बीत गया | समय और जीवन पर भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय समय अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ता रहता है और देखते ही देखते एक और साल हमारी जिंदगी से गुजर जाता है। ‘और एक साल बीत गया’ समय, उम्र, जीवन की भागदौड़ और आत्मचिंतन पर आधारित एक भावपूर्ण हिंदी कविता है। यह रचना हमें जीवन की दौड़ में कुछ पल ठहरकर अपने भीतर झाँकने, जो मिला है उसे सहेजने और संतोष के साथ जीवन जीने का संदेश देती है। प्रदत्त पंक्ति ' और एक साल बीत गया' पर मेरा एक प्रयास  और एक साल बीत गया  दिन मास पल छिन  श्वास तनिक रीत गया  हाँ ! और एक साल बीत गया ! ओस की सी बूँद जैसी उम्र भी टपक पड़ी  अंत से अजान ऐसी बेल ज्यों लटक खड़ी  मन प्रसून पर फिर से आस भ्रमर रीझ गया  और एक साल बीत गया ! साल भर चैन नहीं पाने की होड़ लगी  और, और, और अधिक संचय की दौड़ लगी  भान नहीं पोटली से प्राण तनिक छीज गया और एक साल बीत गया ! जो है सहेज उसे चैन की इक श्वास तो ले जीवन उद्देश्य जान सुख की कुछ आस तो ले    मन जो संतुष्ट किया वो ही जग जीत गया  और एक साल बीत गया ! निष्कर्ष हर बीतता हुआ साल हमें यह याद दिलाता है कि जीवन केवल अधिक पाने और जोड़ने...

अब जागी है तो भोर तेरी | नारी के आत्मसम्मान पर हिंदी कविता

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  विवरण (परिचय) नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज की सबसे मजबूत नींव है। फिर भी कई बार उसके त्याग, भावनाओं और सामर्थ्य को वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी वह हकदार है। यह कविता एक स्त्री की उसी अनकही पीड़ा, आत्मसम्मान और जागरण की कहानी कहती है।                                पोषी जो संतति तूने,  उसमें भी क्यों जज्बात नहीं । अंतरिक्ष तक परचम तेरा, पर घर में औकात नहीं। मान सभी को इतना देती ,तुझको माने ना कोई । पूरे घर की धुरी है तू, फिर भी कुछ अपने हाथ नहीं । एक भिखारी दर पे आ, पल में मजबूरी भाँप गया । खाली लौट गया बोला, " माता कोई बात नहीं"। पंख दिये जिनको तूने, उड़ने की नसीहत देते वे । ममता की घनेरी छाँव दिखी, क्षमता तेरी ज्ञात नहीं । पर तू अपनी कोशिश से, अपना लोहा मनवायेगी । अब जागी है तो भोर तेरी, दिन बाकी है अब रात नहीं। जनमों की उलझन है ये , धर धीरज ही सुलझाना तू । अपना मूल्यांकन हक तेरा, नैतिकता पर आघात नहीं । कविता का भाव यह कविता हर उस स्त्री को समर्पित है जिसने अपने परिवार, बच्चों और समाज ...

गुस्सा क्यों हो सूरज दादा | गर्मी पर कविता

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परिचय :- आज बढ़ती गर्मी, सूखती नदियाँ और तपती धरती हर जीव-जंतु को प्रभावित कर रही हैं। प्रस्तुत कविता “गुस्सा क्यों हो सूरज दादा!” प्रकृति की इसी वेदना को सरल, भावपूर्ण और संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है। यह कविता केवल सूरज से शिकायत नहीं बल्कि धरती, जल और जीवन को बचाने की एक विनम्र पुकार भी है। गुस्सा क्यों हो सूरज दादा ! आग उगलते हद से ज्यादा ! लू की लपटें फेंक रहे हो , आतप अवनी देख रहे हो । छाँव भी डरकर कोने बैठी, रश्मि तपिश दे तनकर ऐंठी । बदरा जाने कहाँ खो गये, पर्णहीन सब वृक्ष हो गये । माँ धरती भी दुःखी रो रही, दया आपकी कहाँ खो गयी ? जल, जलकर बस रेत बची है । अग्निकुंड सी वो भी तची है ! दीन-दुखी को और दुखाते ! नीर नदी का भी क्यों सुखाते ? मेरी मानो सूरज दादा ! मत त्यागो निज नेक इरादा । सूर्य देव हो तुम जगती के ! अर्ध्य देते जल सब भक्ति से । जीव-जगत के हो रखवारे वन्य वनस्पति तुमसे सारे । क्यों गुस्से में लाल हो रहे दीन-हीन के काल हो रहे । इतना भी क्यों गरमाए हो ? दिनचर्या से उकताये हो ? कुछ दिन छुट्टी पर हो आओ ! शीत समन्दर तनिक नहाओ ! करुणाकर ! करुणा अब कर दो ! तप्त अवनि का आतप ...

पा प्रियतम से प्रेम का वर्षण | वसंत ऋतु पर भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय वसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति में नवजीवन और उल्लास का संचार होने लगता है। सूनी डालियों पर नए पत्ते आने लगते हैं, फूल खिल उठते हैं और वातावरण में एक नई-सी ताजगी महसूस होती है। ‘पा प्रियतम से प्रेम का वर्षण’ कविता में वसंत के इसी आगमन के साथ प्रकृति और प्रेम से जुड़ी भावनाओं को शब्द देने का प्रयास किया गया है। शिशिर शरद से गुजर धरा का , व्यथित मलिन सा मुखड़ा । धूल धूसरित वृक्ष केश सब बयां कर रहे दुखड़ा । पीत पर्ण से जीर्ण वसन लख  व्याकुल नभ घबराया । अंजुरि भर-भर स्नेह बिंदु फिर प्रेम से यूँ छलकाया । पा प्रियतम से प्रेम का वर्षण हुआ गुलाबी मुखड़ा । हर्षित मन नव अंकुर फूटे भूली पल में दुखड़ा । सीने से सट क्षितिज के पट धरा गगन से बोली । "नैना तेरे दीप दिवाली, वचन प्रेमरस होली । रंग दे मेरे मन का आँगन, अनगिन कष्ट भुलाऊँ । युग युग तेरे प्रेम के खातिर हद से गुजर मैं जाऊँ" । अधखुले नेत्र अति सुखातिरेक, नभ मंद-मंद मुस्काया । हर्षित दो मन तब हुए एक, बहुरंगी चाप बनाया । अद्भुत छवि लख मुदित सृष्टि, अभिनंदित ऋतुपति आये । करने श्रृंगारित वसुधा को फिर, स्वयं काम-रति धाये । निष्कर्ष वस...

आज प्राण प्रतिष्ठा का दिन है | श्रीराम भक्ति पर कविता

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परिचय 22 जनवरी 2024 का दिन श्रीराम भक्तों के लिए विशेष आस्था और उल्लास का दिन रहा। अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के इस ऐतिहासिक अवसर ने मन को भी राममय कर दिया। उसी भाव और वातावरण से जुड़ी अनुभूतियों को मैंने इस कविता में शब्द देने का प्रयास किया है।                              चित्र साभार 'गूगल' से हर शहर अवध सा सजा हुआ, हर सदन राम मंदिर है बना । हर मन , मन ही मन, राम जपे, हर रोम रोम में राम बसे । देखो तो राममय हवा चली, सबके उर ऐसी भक्ति जगी । जिससे जितना ही बन पाया, वह रत है राम की भक्ति में । कुछ कहते सियासी मुद्दे हैं, पर किसको लगे ये भद्दे हैं ? जगमग फिर पूरा देश हुआ, आज दीप जले हर बस्ती में । खुशियों की ऐसी लहर चली, उत्सुकता सबके हृदय पली । शिशिर अचरज स्तब्ध खड़ी, है जोश भक्ति की शक्ति में । पक्ष विपक्ष गर छोड़ दें हम, सियासत का भ्रम तोड़ दें हम । श्रद्धेय नमन उस साधक को रत अनुष्ठान व्रत भक्ति में । आज प्राण प्रतिष्ठा का दिन है , आस्था भी कहाँ मन्दिर बिन है । पंच शतक की पूर्ण प्रतीक्षा, हैं जयकारे अब ...

प्राणायाम - दिल -दिमाग को स्वस्थ बनाये | प्राणायाम पर कविता

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परिचय आज की व्यस्त जीवनशैली में शरीर के साथ मन को स्वस्थ और संतुलित रखना भी जरूरी है। प्राणायाम और ध्यान इसी ओर ध्यान दिलाते हैं। मन की चंचलता, एकाग्रता और आत्मचिंतन के भावों को समेटती मेरी यह कविता प्राणायाम की उपयोगिता को अपने ढंग से अभिव्यक्त करती है। जिम एरोबिक एक्सरसाइज, तन को स्वस्थ बनाते । हेल्दी-वेल्थी तो कहते सब , मन की सोच ना पाते । हर चौथे दिन बंक मारते, मन नहीं जिम जाने का । हेल्दी वेल्थी छोड़ - छाड़, मन जंक फूड खाने का । हास्य-आसन मे 'हा-हा' करते, मूड नहीं खुश रहता । सब कुछ होकर भी नाखुश से, मन खाली सा रहता । कुछ भी नहीं 'मन' पर मालिक बन, अपना रौब दिखाता । कभी उछलता बच्चों सा बन कभी ये रुग्ण बनाता । गौर करें आओ इस मन पर, मन है बड़ा अलबेला ! कभी हँसाता कभी रुलाता, खेले अद्भुत खेला । चेतन, अवचेतन ,अचेतन, भेद हैं इसके ऐसे । आधिपत्य हो जिसका इनपे, शासक स्व का जैसे । 'स्व-राज' तन-मन पर जिसका, मति एकाग्र कर पाता । हेल्दी-वेल्थी और वाइज बन, जीवन सफल बनाता । समझें तो 'मन' समझ ना आता, करें तो है आसान । एक्सरसाइज करते ही हैं, बाद करें कुछ ध्यान । श्वासों...

गणपति वंदना भगवान गणेश की भक्तिमय कविता

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 परिचय श्रीगणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले उनका स्मरण मन में श्रद्धा और विश्वास भर देता है। इसी भक्तिभाव से मैंने गणपति वंदना के रूप में अपने भाव शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है। जय जय जय गणराज गजानन गौरी सुत , शंकर नंदन । प्रथम पूज्य तुम मंगलकारी करते हम करबद्ध वंदन । मूस सवारी गजमुखधारी मस्तक सोहे रोली चंदन । भावसुमन अर्पित करते हम हर लो प्रभु जग के क्रंदन । सिद्धि विनायक हे गणनायक  विघ्नहरण मंगलकर्ता । एकदंत प्रभु दयावंत तुम करो दया संकटहर्ता । चौदह लोक त्रिभुवन के स्वामी रिद्धि सिद्धि दातार प्रभु  ! बुद्धि प्रदाता, देव एकाक्षर भरो बुद्धि भंडार प्रभु  ! शिव गिरिजा सुत लम्बोदर प्रभु कोटि-कोटि प्रणाम सदा । श्रीपति श्री अवनीश चतुर्भुज  विरजें मन के धाम सदा। निष्कर्ष विघ्नहर्ता गणपति से यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा सब पर बनी रहे और सभी के जीवन में सुख, शांति तथा सद्बुद्धि का प्रकाश बना रहे।

उठे वे तो जबरन गिराने — संघर्ष और आत्मविश्वास की कविता

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परिचय कभी-कभी जीवन में सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब मुश्किल समय में सहारा देने की उम्मीद अपनों से हो और वही लोग रास्ते में बाधाएँ खड़ी करने लगें। उनकी कोशिशें हमें गिराने की हों, फिर भी हम उन परिस्थितियों से निकलकर अपने दमखम और हौसले के साथ मंजिल तक पहुँच जाएँ। विडंबना तब सामने आती है, जब सफलता मिलने पर वही लोग मिल-बाँटकर खुशी मनाने की बात करने लगते हैं। “उठे वे तो जबरन गिराने चले” कविता रिश्तों के इसी बदलते व्यवहार और मनुष्य की दृढ़ता को अभिव्यक्त करती है। यह कविता उस आत्मविश्वास की बात करती है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी टूटता नहीं और अंततः अपने लिए राह बना लेता है। उठे वे तो जबरन गिराने चले  कुछ अपने ही रिश्ते मिटाने चले  अपनों की नजर में गिराकर उन्हें गैरों में अपना बताने चले ।। ना राजा ना रानी, अधूरी कहानी दुखों से वे लाचार थे बेजुबानी करम के भरम में फँसे ऐसे खुद ही कल्पित ही किस्से सुनाने चले  उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। दर-दर की ठोकर से मजबूत होकर चले राह अपनी सभी आस खोकर हर छाँव सर से उनकी गिराकर राहों में काँटे बिछाने चले उठे वे तो जबरन गिराने चले ।। काँ...

वसुधा अम्बर एक हो गये

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दिग-दिग्गज हैं अलसाये से खग मृग भी सब सोये से हैं । थर थर थर है शिशिर काँपती, साग-पात सब रोये से हैं । लता वृक्ष सब मुरझाए से, पात बिछड़ने का झेलें गम । मारी-मारी फिरें तितलियाँ, फूलों का मकरंद गया जम । छुपम-छुपाई खेल रहे रवि, और पवन पुरजोर चल रही । दुबके सोये पता ना चलता, रात कटी कब भोर टल रही । दादुर मोर सभी चुप-चुप हैं, कोयल मैना कहीं खो गये । मौन मिलन आलिंगनबद्ध से वसुधा अम्बर एक हो गये । सकल सृष्टि स्तब्ध खड़ी सी, बाट जोहती ज्यों बसंत का । श्रृंगारित होगी दुल्हन सी, शुभागमन हो रति अनंग का ।

मुस्कराया जब वो पाटल खिलखिलाकर

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शर्द ठिठुरन, ओस, कोहरा सब भुलाकर मुस्कराया जब वो पाटल खिलखिलाकर । शर्म से रवि लाल, छोड़ी शुभ्र चादर, रश्मियां दौड़ी धरा , आलस भगाकर । छोड़ ओढ़न फिर धरावासी जो जागे, शीतवाहक भागते तब दुम-दबाके ।   क्रुद्ध हारे शिशिर ने पाटल को देखा, पूस पतझड़ी प्रवात, जम के फेंका । सिंहर कर भी संत सा वो मुस्कुराया, अंक ले मारुत को वासित भी बनाया। बिखरी पड़ी हर पंखुड़ी थी मुस्कराती, ओस कण में घुल मधुर आसव बनाती । सत्व इसका सृष्टि को था बहुत भाया,  हो प्रफुल्लित 'पुष्प का राजा' बनाया ।

गई शरद आया हेमंत

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गई शरद आया हेमंत , हुआ गुलाबी दिग दिगंत । अलसाई सी लोहित भोर, नीरवता पसरी चहुँ ओर । व्योम उतरता कोहरा बन, धरा संग जैसे आलिंगन । तुहिन कण मोती से बिखरे, पल्लव पुष्प धुले निखरे । उजली छिटकी गुनगुनी धूप, प्रकृति रचती नित नवल रूप । हरियाये सुन्दर सब्ज बाग, पालक बथुआ सरसों के साग । कार्तिक,अगहन व पूस मास, पंछी असंख्य उतरे प्रवास ।  हुलसित सुरभित यह ऋतु हेमंत आगत शिशिर, स्वागत वसंत ।।

बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी

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आगे बढ़ ना सकेंगे जब तक,                  बढ़े ना अपनी हिंदी ।                 भारत की गौरव गरिमा ये,                  राष्ट्र भाल की बिंदी ।                 बढ़ा मान गौरवान्वित करती,                 मन में भरती आशा।                 सकल विश्व में हो सम्मानित,                 बने राष्ट्र की भाषा ।                गंगा सी पावनी है हिन्दी,                सागर सी गुणग्राही ।                हर भाषा बोली के शब्दों को ,                खुद में है समाई ।                सारी भगिनी भाषाओं को,        ...

जिसमें अपना भला है , बस वो होना है

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जब से खुद को खुद सा ही स्वीकार किया हाँ औरों से अलग हूँ, खुद से प्यार किया । अपने होने के कारण को जब जाना । तेरी रचनात्मकता को कुछ पहचाना । जाना मेरे आस-पास चहुँ ओर है तू। दिखे जहाँ कमजोर वही दृढ़ छोर है तू। ना चाहा फिर बल इतना मैं कभी पाऊँ । तेरे होने के एहसास को खो जाऊँ । दुनिया ने जब जब भी नफरत से टेरा । तूने लाड दे आकर आँचल से घेरा । तेरी पनाह में जो सुख मैंने पाया है  । किसके पास मेरा सा ये सरमाया है  । दुनिया ढूँढ़े मंदिर मस्जिद जा जा के, ना देखे,  तू पास मिरे ही आया है । तेरी प्रणाली को लीला सब कहते हैं । शक्ति-प्रदाता ! निर्बल के बल रहते हैं । अब न कभी अपनी कमियों का रोना है । जिसमें अपना भला है, बस वो होना है । कुछ ऐसा विश्वास हृदय में आया है । माया प्रभु की कहाँ समझ कोई पाया है । सरमाया = धन - दौलत, पूँजी 

विचार मंथन

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  चित्र साभार pixabay.com ,से "कुछ नहीं है हम इंसान, मूली हैं ऊपर वाले के खेत की" । सुना तो सोचा क्या सच में हम मूली (पौधे) से हैं ऊपर वाले के  सृष्टि रूपी खेत की ? क्या सचमुच उसके लिए  हम वैसे ही होंगे जैसे हमारे लिए खेत या गमलों में उगे उगाये पौधे ? देखा छोटे से गमले में उगी अनगिनत पौध को ! हर पौधा बढ़ने की  कोशिश में  अपने हिस्से का सम्पूर्ण पाने की लालसा लिए  अपने आकार को संकुचित कर बस ताकता है अपने हिस्से का आसमान । खचाखच भरे गमले के उन  नन्हें पौधों की तकदीर होती माली के हाथ ! माली की मुट्ठी में आये  मिट्टी छोड़ते मुट्ठी भर पौधे  नहीं जानते अपना भविष्य  कि कहाँ लेंगे वे अपनी अगली साँस ? किसे दिया जायेगा नये खाद भरे  गमले का साम्राज्य ? या फिर फेंक दिया जायेगा कहीं कचड़े के ढ़ेर में ! नन्हीं जड़ें एवं कोपलें झुलस जायेंगी यूँ ही तेज धूप से, या दफन कर बनाई  जायेगी कम्पोस्ट ! या उसी जगह यूँ ही  अनदेखे से जीना होगा उन्हें । और मौसम की मर्जी से  पायेंगे धूप, छाँव, हवा और पानी । या एक दूसरे की ओट में कुछ सड़ गल कर सडा़ते रहे...

मन कभी वैरी सा बनके क्यों सताता है

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  मन कभी वैरी सा बन के क्यों सताता है ? दिल दुखी पहले से ही फिर क्यों रुलाता है ? भूलने देता नहीं बीते दुखों को भी आज में बीते को भी क्यों जोड़े जाता है ? हौसला रखने दे, जा, जाने दे बीता कल, आज जो है, बस उसी में जी सकें इस पल । आने वाले कल का भी क्यों भय दिखाता है ? मन कभी वैरी सा बन के क्यों सताता है ? हर लड़ाई पार कर जीवन बढ़े आगे, बुद्धि के बल जीत है, दुर्भाग्य भी भागे । ना-नुकर कर,  क्यों उम्मीदें तोड़ जाता है ? मन कभी वैरी सा बन के क्यों सताता है ? मन तू भी मजबूत हो के साथ देता तो, दृढ़ बन के दुख को आड़े हाथ लेता तो, बेबजह क्यों भावनाओं में डुबाता है ? मन कभी वैरी सा बन के क्यों सताता है ? यंत्र है तन, मन तू यंत्री, रहे नियंत्रित जो पा सके जो चाहे, कुछ भी ना असम्भव हो? फिर निराशा के भँवर में क्यों फँसाता है ? मन कभी वैरी सा बन के क्यों सताता है ?

लघु कविताएं - सैनर्यु

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  धार्मिक परम्पराओं एवं रीति रिवाजों पर बने हायकु सैनर्यु कहलाते हैं । हायकु की तरह ही सत्रह वर्णीय इस लघु कविता में तीन पंक्तियों में क्रमशः पाँच, सात, पाँच वर्णों की त्रिपदी में भावों की अभिव्यक्ति होती है।अतः सैनर्यु भी हायकु की तरह एक लघु कविता है जिसमें लघुता ही इसका गुण है और लघुता ही सीमा भी । प्राकृतिक बिम्ब एवं कीगो (~)  की अनिवार्यता के साथ कुछ सैनर्यु पर मेरा प्रथम प्रयास--   【1】 अक्षय तीज~ मूर्ति निकट खत रखे विद्यार्थी 【2】 ईद का चांद~ बालक मेमने को गोद में भींचे 【3】 कार्तिक साँझ~ पालकी में तुलसी बाराती संग 【4】 कार्तिक साँझ~ कदली पात पर हल्दी अक्षत 【5】 दुर्गा अष्टमी ~ बकरा सिर लेके मूर्तिपूजक 【6】 विवाहोत्सव~ शीश पे घट लिए धार पूजन (धार = पानी का प्राकृतिक स्रोत) एक नजर निम्न लिंक पर भी 👇🙏 वक्त यही अब बोल रहा है

सच बड़ा तन्हा उपेक्षित राह एकाकी चला

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  सच बड़ा तन्हा उपेक्षित, राह एकाकी चला, टेरती शक्की निगाहें, मन में निज संशय पला । झूठ से लड़ता अभी तक, खुद को साबित कर रहा, खुद ही दो हिस्से बँटा अब, मन से अपने लड़ रहा। मन ये पूछे तू भला तो, क्यों न तेरे यार हैं  ? पैरवी तेरी करें जो, कौन कब तैयार हैं  ? क्या मिला सच बनके तुझको, साजिशों में दब रहा, घोर कलयुग में समझ अब, तू कहीं ना फब रहा । क्यों कसैला और कड़वा, चाशनी कुछ घोल ले ! चापलूसी सीख थोड़ी, शब्द मीठे बोल ले ! ना कोई दुनिया में तेरा, अपने बेगाने हुए, खून के रिश्ते भी देखो, ऐसे अनजाने हुए । सच तू सच में सच का अब तो, इतना आदी हो गया देख तो सबकी नजर में, तू फसादी हो गया । हाँ फसादी ही सही पर सच कभी टलता नहीं, जान ले मन ! मेरे आगे झूठ ये  फलता नहीं । मेरे मन ! तेरे सवालों का बड़ा अचरज मुझे ! क्या करूँ इस चापलूसी से बड़ी नफरत मुझे ! पर मेरे मन !  तू ही मुझसे यूँ खफा हो जायेगा । फिर तेरा सच बोल किससे कैसे संबल पायेगा ? वैसे झूठों और फरेबों ने  मुझे मारा नहीं  हूँ परेशां और तन्हा, पर कभी हारा नहीं  । हाँ  मैं सच हूँ सच रहूँगा,  चाहे एकाकी रह...

अपने हिस्से का दर्द

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चित्र साभार pixabay  से... अपनों  की महफिल में हँसते -मुस्कराते  हिल - मिल कर  खुशियाँ मनाते सभी अपने खुशियों से चमकती - दमकती  इन खूबसूरत आँखों के बीच   नजर आती हैं,  कहीं कोई  एक जोड़ी आँखें  सूनी - सूनी पथराई सी । ये सूनी पथराई सी आँखें  कोरों का बाँध बना  आँसुओं का सैलाब थामें जबरन मुस्कराती हुई  ढूँढ़ती हैं कोई  एकांत अंधेरा कोना जहाँ कुछ हल्का कर सके पलकों का बोझ। बोझिल पलकों संग  ये जोड़ी भर आँखें झुकी - झुकी और  सहमी सी बामुश्किल छुपाती हैं  कोरों  के छलकाव से आँसुओं संग बहता दर्द  । हाँ दर्द जिसे नहीं दिखाना चाहती उसके उन अपनों को जिन्हें अपना बनाने और  उनका अपनापन पाने में  लगी हैं उसकी  वर्षों की मेहनत। जानती है अपनों को  अपना दर्द बता कर मिलेगी उसे संवेदना  पर साथ में उठेंगे सवाल भी। और जबाब में उधड़ पड़ेंगी वे सारी गाँठे जिनमें  तुलप-तुलप कर  बाँधे हैं उसने दर्द अपने हिस्से के... हर एक दर्द की  अपनी अलग कहानी किसी की बेरुखी, बेदर्दी तो  किसी...

आओ ! खुद से प्यार करें

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चित्र साभार pixabay.com से चलो स्वयं से इश्क लड़ाएं  कुछ मुस्काएं कुछ शरमाए ! एक गुलाब स्वयं को देकर वेलेंटाइन अपना मनाएं ! आओ खुद से प्यार करें! लव-शब कह इजहार करें! बने-ठने कुछ अपने लिए, दर्पण में आभार करें !! इक छोटी सी डेट पे जाएं , कॉफी संग कोई मेज सजाएं । कुछ कह लें कुछ सुन लें यारा! खुद से खुद की चैट कराएं !! खुदगर्जी नहीं खुद से प्यार यह तो तन मन का अधिकार तन-मन  से ही है ये जीवन कर लें जीवन का सत्कार !! अरमानों के बीच खड़े, दौलत के मायाजाल बड़े। कभी तो निकलें इन सब से, खुद से खुद के लिए लड़ें ! अपनों की परवाह हमें अपनी भी कुछ आज करें छोटी-छोटी फतह सराहें अपने पर कुछ नाज करें मरूथल से बीहड़ जीवन का  मन -आँगन गुल्जार करें ! वेलेंटाइन के अवसर पर आओ ! खुद से प्यार करें।।          

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