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आओ बच्चों ! अबकी बारी होली अलग मनाते हैं

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  आओ बच्चों ! अबकी बारी  होली अलग मनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । ऊँच नीच का भेद भुला हम टोली संग उन्हें भी लें मित्र बनाकर उनसे खेलें रंग गुलाल उन्हें भी दें  छुप-छुप कातर झाँक रहे जो साथ उन्हें भी मिलाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पिचकारी की बौछारों संग सब ओर उमंगें छायी हैं खुशियों के रंगों से रंगी यें प्रेम तरंगे भायी हैं। ढ़ोल मंजीरे की तानों संग  सबको साथ नचाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । आज रंगों में रंगकर बच्चों हो जायें सब एक समान भेदभाव को सहज मिटाता रंगो का यह मंगलगान मन की कड़वाहट को भूलें मिलकर खुशी मनाते हैं जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । गुझिया मठरी चिप्स पकौड़े पीयें साथ मे ठंडाई होली पर्व सिखाता हमको सदा जीतती अच्छाई राग-द्वेष, मद-मत्सर छोड़े नेकी अब अपनाते हैं  जिनके पास नहीं है कुछ भी मीठा उन्हें खिलाते हैं । पढ़िए  एक और रचना इसी ब्लॉग पर ●  बच्चों के मन से

बेरोजगारी : "एक अभिशाप"

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   नवयुवा अपने देश के,     पढे-लिखे ,डिग्रीधारी     सक्षम,समृद्ध, सुशिक्षित      झेल रहे बेरोजगारी।                                                            कर्ज ले,प्राप्त की उच्च शिक्षा,                                अब सेठजी के ताने सुनते।                                परेशान ये मानसिक तनाव से,                                 आत्महत्या के रास्ते ढूँढते।      माँ,बहनों के दु:ख जो सह न सके,  वे अभागे गरीबी मिटाने के वास्ते, परचून की दुकान पर मिर्ची तोलते। तो कुछ सैल्समैन बन गली-गली डोलते।     ...

नारी - अबला नहीं

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आभूषण रूपी बेड़ियाँ पहनकर... अपमान, प्रताड़ना का दण्ड, सहना नियति मान लिया... अबला बनकर निर्भर रहकर, जीना है यह जान लिया.... सदियों से हो रहा ये शोषण, अब विनाश तक पहुँच गया । "नर-पिशाच" का फैला तोरण, पूरे समाज तक पहुँच गया ।। अब वक्त आ गया वर्चस्व करने का, अन्धविश्वाश ,रूढिवादिता ,कुप्रथाओं, से हो रहे विनाश को हरने का । हाँ ! वक्त आ गया अब पुन:  शक्ति रूप धारण करने का । त्याग दो ये बेड़ियाँ तुम, लौहतन अपना बना दो ! थरथराये अब ये दानव... शक्तियां अपनी जगा दो ! लो हिसाब हर शोषण का उखाड़ फेंको अब ये तोरण ! याद आ जाए सभी को, रानी लक्ष्मीबाई का युद्ध-भीषण । उठो नारी ! आत्मजाग्रति लाकर, आत्मशक्तियाँ तुम बढ़ाओ ! आत्मरक्षक  स्वयं बनकर  निर्भय  निज जीवन बनाओ ! शक्ति अपनी तुम जगाओ !          .                   - सुधा देवरानी

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