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खामोशी जो सब कह गई | अनकही भावनाओं की भावुक हिंदी कहानी

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​प्रस्तावना (Introduction) ​ "शब्दों की एक सीमा होती है, पर संवेदनाएँ असीम हैं।" ​ अक्सर हमें लगता है कि मन की उलझनों को शब्दों के धागे में पिरोकर बाहर निकाल देने से हृदय का बोझ कम हो जाएगा। हम सोचते हैं कि कह देने से मन खाली हो जाएगा। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होता है ?  कभी-कभी शब्द उस गुबार को केवल हवा देते हैं, और पीछे छूट जाती है एक भारी खामोशी । ​यह कहानी है एक ऐसी ही संध्या की, जहाँ डूबते सूरज की लाली और बादलों की विरल परतों के बीच एक स्त्री अपने अंतर्मन की गठरी खोलती है। वह बोलती तो है, पर पाती है कि आँसू फिर भी थम नहीं रहे। यह रचना 'कह देने' और 'महसूस करने' के बीच के उस सूक्ष्म अंतर को उकेरती है, जहाँ अंततः उसे समझ आता है कि पूर्णता शब्दों में नहीं, बल्कि स्वयं की खामोशी और वर्तमान स्थिति को स्वीकार करने में है । संध्या की धुंधलाती बेला वह छत के कोने में खामोश खड़ी थी। उसकी निगाहें दूर क्षितिज में कहीं खोई हुई थीं, मानो अपनी उमड़ती भावनाओं का कोई सिरा खोज रही हो। आकाश पर बादलों की विरल परतें, दिनभर के अनकहे भावों को समेटे धीरे-धीरे तैर रही थीं। डूबते सूरज...

बच्चों को समझाने का सही तरीका – सासू माँ की सीख देने वाली कहानी

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क्या आपका बच्चा भी जिद करता है? जानिए एक छोटी सी कहानी से बड़ा parenting मंत्र…   बच्चों को डांटने के बजाय प्यार और धैर्य से समझाना क्यों जरूरी है? पढ़िए सासू माँ की सीख देती यह प्रेरणादायक हिंदी कहानी। आरव की जिद और निधि की परेशानी माँजी, आरव बहुत जिद्दी है...।  मैंने उसे कितना समझाया, पर वो माना ही नहीं… और आपने तो पल भर में मना लिया। कैसे माँजी? आप कैसे मना लेती हैं उसे? उसे क्या, आप तो सभी बच्चों को मना लेती हैं… आश्चर्य भरी मुस्कान के साथ निधि अपनी सासू माँ से पूछ ही रही थी कि तभी प्रीति (देवरानी) ने किचन से आवाज लगाई— किचन में छोटी सी सीख “दीदी, ज़रा ये दूध पतीली में डाल दीजिए न…  मुझसे गिर जाता है। पैकेट से डालते वक्त दूध उछल कर बाहर गिर जाता है।” सिखाने का तरीका निधि किचन में गई और दूध पतीली में डालते हुए बोली— “अरे ! ऐसे कैसे गिर जाता है तुमसे दूध? देखो, धीरे-धीरे डालो… पतली धार में। अगर एकदम से ज्यादा दूध डालोगी, वो भी खाली पतीले में, तो उछलेगा ही न।” सासू माँ दूर से सब सुनकर मुस्कुरा रही थीं। थोड़ी देर बाद निधि चाय लेकर आई और सासू माँ को देते हुए फिर बोली— “अब ...

जो घर देखा नहीं सो अच्छा | प्रेरणादायक कहानी

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 परिचय  हम अक्सर दूर से दूसरों का जीवन देखकर उसके सुख और वैभव से प्रभावित हो जाते हैं। जो हमारे पास नहीं होता, वही हमें अधिक आकर्षक लगता है। परंतु हर चमकती हुई चीज़ सुख और संतोष का प्रतीक नहीं होती। प्रस्तुत लघुकथा इसी मानवीय प्रवृत्ति और स्वतंत्रता के महत्व को सरल किंतु मार्मिक ढंग से उजागर करती है।  एक चिड़िया ने अपने बच्चों को शहर के पॉश इलाकों में घुमाने का प्रोग्राम बनाया । जो उनके नीड़ से काफी दूर था । चिड़िया और उसके नन्हें बच्चे वहाँ जाने के लिए बहुत उत्साहित थे ।  अगले दिन बड़े तड़के सुबह ही उन्होंने उड़ान भर दी । थोड़ी देर में वे सुन्दर आलीशान भवनों और ऊँची -ऊँची इमारतों को देखकर बहुत ही खुश और आश्चर्यचकित थे, और चूँ-चूँ कर अपनी ही भाषा में अपनी माँ से उत्सुकतावश तरह तरह के सवाल कर रहे थे , माँ चिड़िया भी अपने बच्चों को बड़े लाड़ से उनके सवालों के जबाब में ही जीवन के गुर भी सिखाये जा रही थी ।  वहाँ के बाग बगीचे साफ-सुथरे और फूलों से लदे थे , जिन पर तरह तरह की रंग-बिरंगी तितलियों को मंडराते देखकर नन्हीं चिड़ियों की खुशी का तो ज्यों ठिकाना ही न था । और माँ चिड़िया ...

पुनर्जन्म – एक स्त्री के स्वाभिमान और आत्मविश्वास की प्रेरणादायक हिंदी कहानी

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परिचय कभी-कभी जीवन में पुनर्जन्म का अर्थ नया जीवन पाना नहीं, बल्कि अपने भीतर खो चुके आत्मविश्वास, स्वाभिमान और व्यक्तित्व को फिर से पहचान लेना होता है। “ पुनर्जन्म ” ऐसी ही एक भावनात्मक हिंदी कहानी है, जो यह एहसास कराती है कि सहनशीलता एक गुण है, लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं ।   पूरे पंद्रह दिन बाद जब भुविका ननिहाल से लौटी तो माँ (अनुमेधा) उसे बड़े प्यार से गले लगाकर उलाहना देते हुए बोली, “उतर गया तेरा गुस्सा? नकचढ़ी कहीं की! इतने दिनों से नानी के पास बैठी है, अब कुछ ही दिनों में जॉब के लिए चली जाएगी, माँ का तो ख्याल ही नहीं है! है न?” माँ से अलग होते हुए भुविका अनमने-से मुस्कुराई और फिर बड़े से बैग को घसीटते हुए अपने कमरे तक ले गई। “अरे! इतने बड़े थैले में ये क्या भरकर दिया है तेरी नानी ने?” अनुमेधा हैरानी से पूछते हुए उसके पीछे-पीछे आई तो भुविका बैग की चेन खोलते हुए बोली, “आप खुद ही देख लीजिए।” वह बड़ी उत्सुकता से बैग के अंदर झाँकने लगी, तभी भुविका ने कुछ मेडल, सम्मानपत्र और तस्वीरें निकालकर वहीं बेड पर फैला दिए। “हैं! ये क्या है...? ये... ये सब यहाँ क्यों ले आई भुवि?” हैरानी ...

लो ! मैं तो फिर वहीं आ गयी

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  "क्या होगा इसका ? बस खाना खेलना और सोना । इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जीवन में बेटा !  कम से कम पढ़ाई-लिखाई तो कर ले । आजकल कलम का जमाना है । चल बाकी कुछ काम-काज नहीं भी सीखती तो कलम चलाना तो सीख !  बिना पढ़े -लिखे क्या करेंगी इस दुनिया में, बता ?... पढेगी-लिखेगी तभी तो सीखेगी दुनियादारी" ! घर के बड़े जब देखो तब टोकते इसी तरह । सुन सुन कर पक गयी भावना। आखिर झक मारकर पढ़ने में मन लगाने लगी । और बन गयी एक पढ़ाकू लड़की।अपनी कक्षा में सबसे अब्बल । चार दिन की खुशी ! फिर वही... "अरे ! पढ़ती तो है । बस पढ़ती ही तो है ! अब बन भी जाये कुछ तो माने । नहीं तो सम्भालेगी फिर चौका चूल्हा !... और वो सीखना तो दूर देखा भी ना है इसने । क्या होगा इस छोरी का" ?.. सबको लगता भावना किसी की नहीं सुनती बस अपने में ही मस्त मौला है । पर वो थी ठीक इसके उलट । बहुत ही संवेदनशील, और अन्तर्मुखी। साथ ही  सबकी सुनकर सबके मुताबिक कुछ करने की ठानने वाली । पर ना जताना और ना ही कुछ बताना। फिर ठान ली उसने तो बन गई शिक्षिका ! परन्तु पढ़ते-पढ़ते पढ़ने की ऐसी लत लगी उसे कि बिना पढ़े तो सो भी ना पाती । इधर घर वाले सोच...

बेटियाँ खपती जाती हैं दो दो घरों की फिकर में ।

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  कावेरी ने जब सुना कि बेटी इस बार होली पे आ रही है तो उसकी खुशियों की सीमा न थी । बड़ी उत्सुकता से लग गयी उसकी पसन्द के पकवान बनाने में ।  अड़ोस-पड़ोस की सखियों को बुलाकर उनके साथ मिलकऱ, ढ़ेर सारी गुजिया शक्करपारे और मठरियाँ बनाई । शुद्ध देशी घी में उन्हें तलते हुए वह बेटी कान्ति की बचपन के किस्से सुनाती जा रही थी सबको । पिछले एक साल से कान्ति मायके ना आ सकी तो माँ का मन तड़प रहा था बेटी से मिलने के लिए ।  कावेरी की पड़ोसी सखियाँ भी जानती थी कि कान्ति की सास जबसे बीमार पड़ी, तभी से वह मायके नहीं आ पायी, वरना शादी के बाद से ही कान्ति हर तीज त्यौहार पर मायके जरूर आती थी और बड़ी बेफिक्री से कुछ दिन रहकर वापस ससुराल जाती। वह हमेशा अपनी सासूमाँ की तारीफ करते न थकती । कावेरी भी खुश होती कि समधन अच्छी है इसीलिए उसकी इकलौती बेटी ससुराल में सुख से है । परंतु समधन की बीमारी के कारण जब बेटी का आना जाना कम हुआ तो उसे वह मुसीबत लगने लगी। मन ही मन वह सोचती की बुढ़िया मर ही जाय तो बेटी को उसकी तिमारदारी से छुटकारा मिले । कान्ति आई तो घर में रौनक आ गयी । माँ की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े । व...

बदलाव - 'अपनों के खातिर' | प्रेरणादायक हिंदी कहानी

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 माँ के बदलाव ने बदल दी पूरे परिवार की सोच | प्रेरणादायक हिंदी कहानी परिचय - क्या हम कभी सोचते हैं कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं? यदि माँ हर समय दूसरों के आदेशों में खुद को खो दे, तो बेटी भी वही सहना सीख सकती है। यह कहानी धरा की है, जिसने अपने बच्चों के भविष्य के लिए खुद को बदलने का साहस किया।  धरा का संघर्ष : आज आकाश ने धरा का हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े प्यार से कहा, "इधर आओ धरा ! हमेशा जल्दी में रहती हो, जरा पास में बैठो तो" ! तो उसे अपने कानों पर विश्वास नही हुआ, विस्मित नेत्रों से आकाश को देखते हुए बोली, "क्या ?.. वो...मैं...मैंने ठीक से सुना नहीं " ! "सुना नहीं या सुनकर भी दोबारा सुनना चाहती हो ! मुस्कुराते हुए उसे प्यार से अपने पास खींचकर आकाश बोला तो आश्चर्य से उसकी आँखें फैल गयी !  आकाश को इतने रोमांटिक मूड में वह सालों बाद देख रही थी । उसने खुद को हल्की चूटी काटी कि ये मैं हमेशा की तरह कोई सपना तो नहीं देख रही । उम्ह!...दर्द से कराह उठी वो ! फिर संयत होकर इधर उधर देखकर बोली , "जी ! आप ठीक तो हैं ? कहिए क्या बात है ? उसके ऐसे व्यवहा...

असर

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माँजी खाना खा लीजिए न ! ऐसे खाने पर क्यों गुस्सा उतारना ? चलिए न माँजी ! फिर आपकी दवाओं का समय हो रहा है , तबियत बिगड़ जायेगी ! चलिए खाना खा लीजिए न ! कितनी देर से सीमा ऐसे ही अपनी सासू माँ को मना रही थी, पर सासू माँ आज  मुँह फुलाए बैठी थी , आखिर उनके लाडले पोते बंटी को उसके पापा से डाँट जो पड़ गयी थी । बंटी आजकल अपनी दादी के इसी प्यार का गलत फायदा उठा रहा था , कोई भी गलती करता और डाँट पड़े तो दादी से शिकायत ! वह जानता था कि दादी सबको डाँट-डपट कर उसे बचा लेंगी , नतीजतन वह बहुत ही लापरवाह होता जा रहा था । उसका सामान पूरे घर भर में बिखरा रहता । जूते - चप्पल भी वह कभी सही तरीके से सही जगह न रखता । उसका कमरा भी हमेशा अस्त-व्यस्त रहता, किताबें और कपड़े पूरे कमरे में तितर-बितर फैले रहते । सीमा (उसकी माँ) उसके कमरे में बिखरे सामानों को समेटते - समेटते थक जाती और जब भी कभी उसे इस बारे में डाँटती या कुछ भी कहती तो वह साथ-साथ जुबान लड़ाता । माँ को तो जैसे कुछ समझता ही नहीं था । तंग आकर सीमा ने आज उसके पापा से शिकायत कर दी । पापा की डाँट पड़ी तो घड़ियाली आँसू बहा आया दादी से लिपटकर । बस फिर दादी शुर...

सार-सार को गहि रहै

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  साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।  "बच्चों इस दोहे मे कबीर दास जी कहते हैं कि, इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है न, जो सार्थक को बचा ले और निरर्थक को उड़ा दे " । "गलत ! बिल्कुल गलत"  !..... मोटी और कर्कश आवाज में कहे ये शब्द सुनकर सरला और उसके पास ट्यूशन पढ़ने आये बच्चे चौंककर इधर-उधर देखने लगे । आस-पास किसी को न देखकर सरला के दिल की धड़कन बढ़ गयी उसने सोचा ये आवाज तो बरामदे की तरफ से आयी और वहाँ तो एक खाट पर पक्षाघात की चपेट में आये उसके बीमार पति लेटे हैं।  तो ! तो ये बोलने लगे?    भावातिरेक से सरला की आँखों से आँसू टपक पड़े।   दीवार का सहारा लेकर खड़ी हुई और बरामदे की तरफ बढ़ी।    बूढ़ी सिकुड़ी आँखें आशा से चमकती हुई कुछ फैल गयी। काँपते हाथों से पति के ऊपर से चादर हटाई। उखड़ी श्वास को वश में कर, जी ! कहकर उनकी आँखों में झाँका। जो निर्निमेष सीढ़ी के नीचे बने छोटे से स्टोर की ओर ताक रही थी । ओह ! ये तो !..  निराशा से शरीर की रही सही हिम्मत भी ज्यों ढ़ेर हो गयी।  ...

वितृष्णा - "ये कैसा प्रेम था" ?

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  आज खाना बनाते हुए बार-बार आँखें छलछला रही थी नेहा की। महीने भर से दुखी मन को बामुश्किल ढाँढ़स बँधाती नेहा का दुख जैसे आज फिर से हरा हो गया था जब उसे रमेश (पति) ने बताया कि राघव जी आ रहे हैं तो वही पुरानी यादें सिया के साथ बिताये वो पल और फिर वह भयावह हादसा सब दिमाग में ऐसे घूमने लगे,जैसे अभी-अभी की बात हो ।  दुख भी लाजमी था, सिया सिर्फ सखी ही नहीं बहन सी थी उसके लिए ।  पाँच साल पहले उसके पति का तबादला जब दिल्ली हुआ और नेहा बच्चों सहित यहाँ आई तो कितना अकेलापन महसूस कर रही थी । रमेश तो घर में सामान शिप्ट कर अपने नये ऑफिस और ड्यूटी में व्यस्त हो गये। नेहा अकेले क्या-क्या करे, बच्चों को सम्भाले, कि लाया हुआ सामान सैट करे या फिर मार्केट से राशन-पानी लाकर खाने-पीने की व्यवस्था करे ।  अपने फ्लैट में पहुँचकर वह सोच -सोचकर परेशान थी कि दिल्ली जैसे शहर में पानी भी खरीदकर लाना पड़ेगा और अभी तो ये भी नहीं मालूम कि यहाँ से  मार्केट है कितनी दूर ? तभी डोरबेल की आवाज सुन ये सोचकर दरवाजा खोला कि शायद रमेश आ गये हों छुट्टी लेकर। देखा तो सामने शरबत एवं चाय नाश्ता लेकर कोई अनजा...

पराया धन - बेटी या बेटा

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                  चित्र, साभार pixabay से "अनुज सुन ! वो...पापा...पापा को हार्टअटैक आया है। भाई !  हम बहुत परेशान हैं माँ का रो - रोकर बुरा हाल है , ...हैलो ! हैलो ! अनुज तू सुन तो रहा है न" ?  सिसकते हुए अनु ने पूछा तो उधर से निधि (अनुज की पत्नी) बोली, "दीदी मैं सुन रही हूँ अनुज तो बाथरूम में हैं मैं बताती हूँ उन्हें"। "निधि तुम दोनों आ जाओ न । ऐसे वक्त में हमें तुम्हारी बहुत जरूरत है। प्लीज निधि ! अनुज को फोन करने को कहना ! ओके" ! कहकर अनु जल्दी से फोन रख दवाइयों का लिफाफा लेकर भागी। अनु कभी माँ को संभालती तो कभी दवाइयाँ वगैरह के लिए भागदौड़ करती फिर भी बार-बार मोबाइल स्क्रीन चैक करती कि कहीं अनुज की कॉल मिस न हो जाय ।  सुबह से शाम ढ़ल गयी पर अनुज का फोन नहीं आया तो अनु को लगा कि शायद सीधे आ रहे होंगे दोनों । इसलिए कॉल नहीं किया होगा। पापा की हालत जानकर परेशान हो गये होंगे बेचारे । माँ ने पूछा तो बता दिया कि निधि को बताया है शायद निकल पड़े होंगे इसीलिए फोन नहीं कर पाये होंगे। और माँ भी बेटे की बाट जोहने लगी।  ऑपरेशन सफल रहा...

बिटिया का घर बसायें संयम से

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चित्र,साभारShutterstock.com से . "क्या हुआ माँ जी ! आप यहाँ बगीचे में....? और कुछ परेशान लग रही हैं" ? शीला ने सासूमाँ (सरला) को घर के बगीचे में चिंतित खड़ी देखा तो पूछा।  तभी पीछे से सरला का बेटा सुरेश आकर बोला, "माँ !  आप  निक्की को लेकर वही कल वाली बात पर परेशान हैं न ? माँ आप अपने जमाने की बात कर रहे हो, आज जमाना बदल चुका है । आज बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं । और पूरे दस दिन से वहीं तो है न निक्की।और कितना रहना, अब एक चक्कर तो अपने घर आना ही चाहिए न। आखिर हमारा भी तो हक है उसपे " । "बस !  तू चुप कर ! बड़ा आया हक जताने वाला... अरे ! अगर वो खुद ही मना कर रही है तो कोई  काम होगा न वहाँ पर...।  कैसे सब छोड़ -छाड़ दौड़ती रहेगी तुम्हारे कहने पर वो " सरला ने डपटते हुए कहा। "वही तो माँ ! काम होगा ! और काम करने के लिए बस हमारी निक्की ही है ? और कोई नहीं उस घर में? नौकरानी नहीं वो बहू है उस घर की।अरे ! उसको भी हक है अपनी मर्जी से जीने का"। सुरेश चिढ़कर बोला।  "हाँ ! हक है ।  किसने कहा कि नहीं है उसका हक ?  हो सकता है उसकी खुद की मर्जी न हो अभी यहाँ आने ...

रक्षाबंधन | भाई-बहन के प्रेम और आपसी रक्षा की भावपूर्ण कहानी

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परिचय  रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर बहन द्वारा बाँधा गया रक्षा-सूत्र ही नहीं, बल्कि भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे का साथ निभाने का सुंदर संकल्प है। क्या सचमुच रक्षा का दायित्व केवल भाई का होता है? आइए, शौर्य और उसकी दीदी की इस प्यारी-सी कहानी के माध्यम से जानते हैं कि बहन भी किस तरह बचपन से ही अपने भाई की रक्षा करती रहती है। रक्षाबंधन के दिन हमेशा की तरह आरती की थाल में दो राखियाँ देख शौर्य ने इस बार माँ से पूछा,  "मम्मी! सबके घर में सिर्फ़ बहन ही भाई को राखी बाँधती है और हमने फिल्मों में भी यही देखा है न। फिर आप ही क्यों मुझसे भी दीदी को राखी बँधवाती हो" ?  तो माँ बोली,  "बेटा जानते हो न ये रक्षा बंधन है और इसका मतलब"... "हाँ हाँ जानता हूँ रक्षा करने का प्रॉमिस है रक्षा बंधन का मतलब ,  पर दीदी इतनी सुकड़ी सी... ये भला मेरी रक्षा कैसे करेगी ? मम्मी ! रक्षा तो मैं इसकी करुँगा बड़े होकर। पड़ौस वाले भैय्या की तरह एकदम बॉडी बिल्डर बनकर...।  इसीलिए मम्मी! अब से सिर्फ दीदी ही मुझे राखी बाँधेगी मैं उसे नही" ।    माँ की बात बीच में ही काटकर शौर्य...

सच्चा दोस्त

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"मम्मा ! आज मैं बाहर खेलने नहीं जाउँगा, क्या मैं टीवी देख लूँ" ? "नहीं बेटा ! ये समय बाहर खेलने का है और देखो ! तुम्हारा बैस्ट फ्रेंड सौरव भी तुम्हारा इंतजार कर रहा है , जाओ बाहर खेल आओ" ! "नहीं मम्मा! मुझे सौरव के साथ नहीं खेलना, अब वो मेरा बैस्ट फ्रेंड नहीं है,  क्योंकि उसने मुझे क्लास में टीचर से डाँट खिलाई । क्या कोई बैस्ट फ्रेंड ऐसा करता है ? बोलो न मम्मा" !...? "हम्म्म! बात तो सही है, पर उसने तुम्हें डाँट क्यों खिलाई" ?   माँ ने मामला समझने की कोशिश में पूछा तो विक्की बोला ; "मम्मा ! एक नहीं दो दो बार डाँट खिलाई उसने मुझे, अब मैं आपको क्या-क्या बताऊँ" विक्की रुँआसा हो गया...। "सब बता दो मैं सुन रही हूँ" कहकर माँ ने उसका सिर सहलाया तो विक्की बहुत बढ़ा चढ़ा कर बोला; "आज मैंने एक नया फ्रेंड बनाया , हम दोनों क्लास में बहुत धीमे से बातें कर रहे थे, मैम को तो पता भी नहीं चलता मम्मा पर इसने मैम को बता दिया और फिर हमें मैम ने डाँटा और अलग-अलग भी बिठा दिया...बहुत गंदा है सौरव" ....। "वैसे क्लास में बात करना कोई अच्छी...

अधजली मोमबत्तियां

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 सुबह के नौ या दस बजे होंगे ,पूरी सोसायटी में दीपोत्सव की चहल पहल है ।  पटाखों पर लगे प्रतिबंध के बावजूद भी जगह जगह बिखरे बम-पटाखों के अवशेष साक्ष्य हैं इस बात के कि कितने जोर-शोर से मनाई गयी यहाँ दीपावली । आज सफाई कर्मी भी घर-घर से दीपावली बख्शीश लेते हुए पूरी लगन से ऐसे सफाई में लगे हैं मानो पटाखों के सबूत मिटा रहे हों... स्कूल की छुट्टी के कारण सोसायटी के बच्चे पार्क में धमा-चौकड़ी मचा रहे हैं । कुछ बच्चे ढ़िस्क्यांऊ-ढ़िस्क्यांऊ करते हुये खिलौना गन से पटाखे छुड़ा रहे हैं ,तो कुछ अपने-अपने मन पसंद खेलों में व्यस्त हैं ।  एक ऐसी टोली भी है यहाँ बच्चों की,जो अब अपने को बच्चा नहीं मानते; बारह - तेरह साल के ये बच्चे हर वक्त अपने को बड़ा साबित करने के लिए बेताब रहते हैं । ये सभी बैंच के इर्द-गिर्द अपने अनोखे अंदाज में खड़े होकर बीती रात पटाखों के साथ की गयी कारस्तानियां बारी -बारी से बयां कर रहे हैं ।  जब रोहन ने हाथ का इशारा करते हुए पूरे जोश में बताया कि उसका रॉकेट सामने वाली बिल्डिंग की छत से टकराते - टकराते बचा तो उसके इशारे के साथ ही सबकी नजरें सामने वाली छत तक जाकर वापस...

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