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प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज

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  बाग की क्यारी के पीले हो गये हैं हाथ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है  टिपटिप मधुर संगीत सी  भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ●  बसंत की पदचाप

बेटी----माटी सी

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कभी उसका भी वक्त आयेगा ? कभी वह भी कुछ कह पायेगी ? सहमत हो जो तुम चुप सुनते  मन हल्का वह कर पायेगी ? हरदम तुम ही क्यों रूठे रहते हर कमी उसी की होती क्यूँ ? घर आँगन के हर कोने की खामी उसकी ही होती क्यूँ ? गर कुछ अच्छा हो जाता है तो श्रेय तुम्ही को जाता है इज्ज़त है तुम्हारी परमत भी उससे कैसा ये नाता है ? दिन रात की ड्यूटी करके भी करती क्या हो सब कहते हैं वह लाख जतन कर ले कोशिश पग पग पर निंदक रहते हैं  । खुद को साबित करते करते उसकी तो उमर गुजरती है जब तक  विश्वास तुम्हें होता तब तक हर ख्वाहिश मरती है । सूनी पथराई आँखें तब भावशून्य हो जाती हैं फिर वह अपनी ही दुश्मन बन  इतिहास वही दुहराती है । बेटी को वर देती जल्दी दुख सहना ही तो सिखाती है बेटी माटी सी बनकर रहना यही सीख उसे भी देती है ।

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