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सफर ख्वाहिशों का थमा धीरे -धीरे

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 यह एक भावपूर्ण प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो जीवन में आने वाले बदलाव, आशा, विश्वास और आत्मबोध की यात्रा को दर्शाती है। “धीरे-धीरे” की लय में रची गई यह कविता मन के भीतर चल रहे द्वंद्व, उम्मीद और सच्चाई के उजागर होने की प्रक्रिया को बेहद संवेदनशीलता से व्यक्त करती है। जीवन में धैर्य और विश्वास बनाए रखना जरूरी है... मौसम बदलने लगा धीरे-धीरे, जगा, आँख मलने लगा धीरे-धीरे । जमाना जो आगे बहुत दूर निकला, रुका , साथ चलने लगा धीरे - धीरे। हुआ चाँद रोशन खिली सी निशा है, कि बादल जो छँटने लगा धीरे-धीरे । खुशी मंजिलों की मनाएँ या मानें, सफर ख्वाहिशों का थमा धीरे -धीरे। अवचेतन में आशा का दीपक जला तो,  मुकद्दर बदलने लगा धीरे-धीरे । हवा मन - मुआफिक सी बहने लगी है, मन में विश्वास ऐसा जगा धीरे -धीरे । अनावृत हुआ सच भले देर से ही, लगा टूटने अब भरम धीरे-धीरे । पढ़िए एक और रचना इसी ब्लॉग पर   जिसमें अपना भला है, बस वो होना है #हिंदीकविता #प्रेरणादायककविता #जीवनयात्रा #नईकविता #स्त्रीमन

लो ! मैं तो फिर वहीं आ गयी

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  "क्या होगा इसका ? बस खाना खेलना और सोना । इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जीवन में बेटा !  कम से कम पढ़ाई-लिखाई तो कर ले । आजकल कलम का जमाना है । चल बाकी कुछ काम-काज नहीं भी सीखती तो कलम चलाना तो सीख !  बिना पढ़े -लिखे क्या करेंगी इस दुनिया में, बता ?... पढेगी-लिखेगी तभी तो सीखेगी दुनियादारी" ! घर के बड़े जब देखो तब टोकते इसी तरह । सुन सुन कर पक गयी भावना। आखिर झक मारकर पढ़ने में मन लगाने लगी । और बन गयी एक पढ़ाकू लड़की।अपनी कक्षा में सबसे अब्बल । चार दिन की खुशी ! फिर वही... "अरे ! पढ़ती तो है । बस पढ़ती ही तो है ! अब बन भी जाये कुछ तो माने । नहीं तो सम्भालेगी फिर चौका चूल्हा !... और वो सीखना तो दूर देखा भी ना है इसने । क्या होगा इस छोरी का" ?.. सबको लगता भावना किसी की नहीं सुनती बस अपने में ही मस्त मौला है । पर वो थी ठीक इसके उलट । बहुत ही संवेदनशील, और अन्तर्मुखी। साथ ही  सबकी सुनकर सबके मुताबिक कुछ करने की ठानने वाली । पर ना जताना और ना ही कुछ बताना। फिर ठान ली उसने तो बन गई शिक्षिका ! परन्तु पढ़ते-पढ़ते पढ़ने की ऐसी लत लगी उसे कि बिना पढ़े तो सो भी ना पाती । इधर घर वाले सोच...

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