मुक्तक-- 'नसीब'
इधर सम्भालते उधर से छूट जाता है, आइना हाथ से फिसल के टूट जाता है, बहुत की कोशिशें सम्भल सकें,हम भी तो कभी, पर ये नसीब तो पल-भर में रूठ जाता है । सहारा ना मिला तो ना सही , उठ बैठे हम , घाव रिसते रहें, ना पा सके कोई मलहम। जमाना ये न समझे, हम गिरे भी राहों में, होंठ भींचे, मुस्कराये पी गये झट सारे गम । कभी रंगती दिखी हमको भी ये तकदीर ऐसे, लगा पतझड़ गयी अब खिल रही बसंत जैसे, चार दिन चाँदनी के फिर अंधेरी रात सी थी, बदा तकदीर में जो अब बदलता भी कैसे ? फिर भी हारे नहीं चलते रहे, चलना ही था, रात लम्बी थी मगर रात को ढ़लना ही था, मिटा तम तो सवेरे सूर्य ज्यों ही जगमगाया, घटा घनघोर छायी सूर्य को छुपना ही था। अंधेरों में ही मापी हमने तो जीवन की राहें, नहीं है भाग्य में तो छोड़ दी यूँ सुख की चाहें, राह कंटक भरी पैरों को ना परवाह इनकी, शूल चुभते रहे भरते नहीं अब दर्दे-आहें । 🙏हार्दिक अभिनंदन🙏 पढ़िए एक और मुक्तक रचना निम्न लिंक पर ● प्रवासी (मुक्तक)