मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता : आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानी
परिचय कहावत है—"मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता।" इसका अर्थ केवल कष्ट सहना नहीं, बल्कि पुराने डर, निराशा और निर्भरता को छोड़कर नए जीवन की शुरुआत करने का साहस भी है। प्रस्तुत कहानी इसी भाव को साकार करती है। वीरा और सरला जैसी दो वृद्ध महिलाओं के माध्यम से यह लघुकथा बताती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, यदि मन में आत्मविश्वास हो और अनुभवों को नयी दिशा देने का साहस हो तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर आत्मनिर्भर बनने की राह निकाली जा सकती है। "कभी-कभी जीवन में आगे बढ़ने के लिए जड़ों को नहीं, केवल सूखी शाखाओं को काटना पड़ता है। यही सोचकर वीरा उस बूढ़े नीम की छँटाई कर रही थी..." कंधे में लटके थैले को खेत की मेंड मे रख साड़ी के पल्लू को कमर में लपेट उसी में दरांती ठूँस बड़े जतन से उस बूढ़े नीम में चढ़कर उसकी अधसूखी टहनियों को काटकर फैंकते हुए वीरा खिन्न मन से अपने में बुदबुदायी, "चल फिर से शुरू करते हैं । हाँ ! शुरू से शुरू करते हैं, एक बार फिर , पहले की तरह"। फिर धीरे-धीरे उसकी बूढ़ी शाखें पकड़ नीचे उतरी। लम्बी साँस लेकर टहनी कटे बूढ़े नीम को देखकर बोली, "उदास म...